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15 अगस्त को पूरा देश जश्न मना रहा था, लेकिन गांधी ने क्यों चुना था उपवास और प्रार्थना का रास्ता?

Gandhi on 15 August 1947: पूरा भारत आजादी के जश्न में डूबा था, लेकिन 15 अगस्त 1947 को जश्न और समारोह से दूर जननायक महात्मा गांधी कलकत्ता (आज के कोलकाता) में थे, वे उपवास पर थे और प्रार्थन कर रहे थे, लेकिन ऐसा क्यों? क्या कहता है इतिहास?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 13, 2026

Gandhi on 15 August 1947

Gandhi on 15 August 1947: आजादी के जश्न से क्यों दूर रहे जननायक महात्मा गांधी? (AI Creative)

Gandhi on 15 August 1947: भारत में 15 अगस्त का नाम आते ही आंखों के सामने तिरंगा आता है, लाल किला और उसमें होने वाले प्रधानमंत्री के संबोधन के साथ ही परेड याद आती है। आजादी के नारे और जश्न की तस्वीर सी जेहन में उभर जाती है। लेकिन 15 अगस्त 1947 की एक तस्वीर ऐसी भी थी, जो इस पूरे जश्न से बिल्कुल अलग थी। देश आजाद हुआ था, लेकिन महात्मा गांधी उस ऐतिहासिक दिन दिल्ली में नहीं थे।

वे कलकत्ता में थे, उस शहर में, जो विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा की आग से जूझ रहा था। यही वजह है कि गांधी के लिए आजादी का पहला दिन उत्सव से ज्यादा शांति की परीक्षा बन गया था।

जब देश आजादी की तैयारी कर रहा था, गांधी कलकत्ता पहुंच चुके थे

गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक गांधी अगस्त 1947 के शुरुआती दिनों में लगातार उन इलाकों की यात्रा कर रहे थे, जहां सांप्रदायिक तनाव और हिंसा का असर था।

6 अगस्त को वे लाहौर से पटना के रास्ते कलकत्ता के लिए रवाना हुए। 8 अगस्त को पटना की प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा कि 15 अगस्त का दिन उपवास, चरखा और प्रार्थना के साथ बिताया जाना चाहिए। यह बात बेहद महत्वपूर्ण थी। जिस दिन देश राजनीतिक स्वतंत्रता का जश्न मनाने वाला था, गांधी उस दिन लोगों को भीतर झांकने और शांति की प्रार्थना करने की बात कह रहे थे।

कलकत्ता में गांधी के सामने थी आजादी की दूसरी तस्वीर

9 अगस्त को गांधी कलकत्ता पहुंचे। अगले कुछ दिनों में उन्होंने वहां के हिंदू और मुस्लिम नेताओं से बातचीत शुरू की। 11 अगस्त को मुस्लिम नेता एच.एस. सुहरावर्दी के अनुरोध पर गांधी ने कलकत्ता में रुकने और उनके साथ मिलकर शांति के लिए काम करने का फैसला किया। 12 अगस्त को उन्होंने घोषणा की कि दोनों तब तक साथ काम करेंगे, जब तक अशांत इलाकों में शांति स्थापित नहीं हो जाती।

13 अगस्त को गांधी दंगाग्रस्त इलाके के हैदरी मेंशन में रहने पहुंचे। वहां पहुंचते ही उन्हें नाराज हिंदुओं के प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। सोचिए, एक तरफ दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण की तैयारियां थीं और दूसरी तरफ गांधी ऐसे इलाके में मौजूद थे जहां लोग एक-दूसरे के खिलाफ खड़े थे।

15 अगस्त आया, लेकिन गांधी ने जश्न नहीं चुना

फिर वह दिन आया जिसका भारत दशकों से इंतजार कर रहा था। 15 अगस्त 1947। भारत स्वतंत्र हुआ। दिल्ली में ऐतिहासिक समारोह हुए। जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत के भविष्य का संदेश दिया। लेकिन गांधी ने अपना दिन अलग तरह से बिताया।

भारत सरकार के गांधी स्मृति रिकॉर्ड के मुताबिक उन्होंने 15 अगस्त को उपवास, चरखा और प्रार्थना करते हुए बिताया। यह सिर्फ किसी कार्यक्रम में शामिल न होने का फैसला नहीं था। गांधी के लिए उस समय देश की आजादी का अर्थ केवल ब्रिटिश सत्ता का अंत नहीं था। उनके सामने एक और बड़ा सवाल था, क्या आजाद भारत अपने ही लोगों के बीच नफरत और हिंसा को खत्म कर पाएगा?

आजादी मिली, लेकिन देश बंट गया था

1947 की स्वतंत्रता विभाजन की त्रासदी के साथ आई थी। भारत और पाकिस्तान दो अलग राष्ट्र बने और पंजाब तथा बंगाल में सीमाओं के साथ भारी हिंसा और विस्थापन हुआ। कलकत्ता भी इस तनाव से अछूता नहीं था। इसीलिए गांधी ने राजधानी के समारोहों से दूरी बनाकर उस जगह को चुना, जहां उन्हें लगा कि उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

गांधी स्मृति के रिकॉर्ड में उनके अगस्त के कार्यक्रमों से साफ दिखता है कि उनका ध्यान लगातार हिंदू-मुस्लिम शांति पर था। 18 अगस्त को उन्होंने मुस्लिमों को ईद की बधाई भी दी और इसके बाद भी कलकत्ता में शांति स्थापित करने के प्रयास जारी रखे।

एक साल बाद नहीं, उसी समय गांधी की भूमिका कितनी अलग थी?

15 अगस्त के बाद भी कलकत्ता में गांधी का काम खत्म नहीं हुआ। 1 सितंबर 1947 को वहां फिर हिंसा से परेशान होकर गांधी ने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया। गांधी स्मृति के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने यह उपवास तब तक जारी रखने की बात कही जब तक कलकत्ता में सामान्य स्थिति वापस नहीं आती।

यही वह संदर्भ है जो बताता है कि 15 अगस्त को गांधी का उपवास और प्रार्थना का फैसला क्यों जरूरी था। देश की राजनीतिक आजादी हासिल हो चुकी थी, लेकिन गांधी के लिए सच्ची आजादी का मतलब लोगों के भीतर से डर और नफरत खत्म होना भी था।

इसलिए गांधी की 15 अगस्त वाली तस्वीर अलग है और हम हर साल स्वतंत्रता दिवस पर गांधी को स्वतंत्रता आंदोलन के महान नेता के रूप में याद करते हैं। लेकिन 15 अगस्त 1947 की उनकी भूमिका हमें एक अलग गांधी दिखाती है। वह गांधी, जो सत्ता हस्तांतरण के सबसे बड़े समारोह से दूर था। वह गांधी, जो लाल किले के जश्न के बजाय दंगाग्रस्त कलकत्ता में था। और वह गांधी, जिसने आजादी के पहले दिन उपवास, चरखा और प्रार्थना को चुना।

शायद इसीलिए 15 अगस्त 1947 की गांधी के उपवास और प्रार्थना की यह कहानी सिर्फ इतिहास का एक प्रसंग नहीं है। यह हमें याद दिलाती है कि देश आजाद होना एक ऐतिहासिक घटना थी, लेकिन उस आजादी को इंसानी रिश्तों में बदलना उससे कहीं बड़ी चुनौती थी।