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तकनीक और नीति के तालमेल से बदलेगी खेती की तस्वीर

बदलते मौसम के बीच एआइ, ड्रोन, सैटेलाइट और डिजिटल तकनीक भारतीय खेती को अधिक स्मार्ट और जलवायु-सहिष्णु बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं।
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जयपुर

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Opinion Desk

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डॉ. अनुभा जैन वरिष्ठ पत्रकार

Aug 13, 2026

farming

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पीढिय़ों से भारतीय कृषि का आधार नियमित और अनुमानित मानसून रहा है। लेकिन आज किसानों को बढ़ते तापमान, लू, अनियमित वर्षा, बाढ़, लंबे सूखे और घटते भूजल स्तर जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ये परिस्थितियां फसल उत्पादन, किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में कृषि का लक्ष्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीली, अनुकूलनशील और टिकाऊ प्रणाली विकसित करना है। इसी परिप्रेक्ष्य में एआइ, सेटेलाइट फोटो, ड्रोन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और डिजिटल सलाहकारी प्लेटफॉर्म कृषि में बदलाव की नई दिशा तय कर रहे हैं। कृषि अब प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि पूर्वानुमान आधारित बन रही है। हालांकि, तकनीक का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब किसान उसे प्रभावी ढंग से अपनाने और उपयोग करने में सक्षम होंगे। आधुनिक कृषि में प्रतिदिन भारी मात्रा में डेटा उत्पन्न हो रहा है। चुनौती यह है कि उपग्रहों, सेंसर्स और जलवायु मॉडलों से प्राप्त जटिल जानकारी को किसानों के लिए सरल और उपयोगी सलाह में कैसे बदला जाए।

भारतीय विज्ञान संस्थान के एआइ एवं रोबोटिक्स प्रौद्योगिकी पार्क में विकसित एआइ आधारित हीट-स्ट्रेस पूर्वानुमान प्रणाली, किसानों को पहले से चेतावनी देकर फसलों को अत्यधिक गर्मी से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद कर सकती है। वहीं माइक्रोसॉफ्ट और एग्रीकल्चरल डवलपमेंट ट्रस्ट, बारामती जैसी पहलों तथा खेतीबडी जैसे एग्रीटेक प्लेटफॉर्म किसानों को डिजिटल फार्म रेकॉर्ड, उपग्रह आधारित विश्लेषण और एआइ संचालित कृषि सलाह उपलब्ध करा रहे हैं। ड्रोन, रिमोट सेंसिंग और आइओटी सेंसर फसलों, मिट्टी की नमी, जल उपलब्धता, पोषक तत्वों की कमी और कीट प्रकोप की वास्तविक समय में निगरानी कर रहे हैं। एआइ विश्लेषण के साथ इन तकनीकों का संयोजन पानी, उर्वरक और अन्य संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकता है, जिससे लागत घटेगी और उत्पादकता बढ़ेगी।
जलवायु-सहिष्णु फसल की किस्में और अनुकूल कृषि पद्धतियां भी किसानों को बदलते मौसम के अनुरूप ढलने में मदद कर सकती हैं। इन समाधानों को कृषि विस्तार सेवाओं और डिजिटल सलाहकारी प्लेटफॉर्मों के माध्यम से शीघ्रता से किसानों तक पहुंचाना आवश्यक है। भारतीय कृषि की एक बड़ी समस्या यह है कि जल-संकट वाले क्षेत्रों में भी धान और गन्ने जैसी अत्यधिक पानी मांगने वाली फसलों पर निर्भरता बनी हुई है। बदलते जलवायु परिदृश्य में यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं माना जा सकता। ऐसे में बागवानी, दलहन, तिलहन, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों की ओर विविधीकरण किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ जल संसाधनों पर दबाव भी कम कर सकता है। हाइड्रोपोनिक्स और सर्कुलर एग्रीकल्चर जैसे मॉडल भी भविष्य की कृषि का हिस्सा बन सकते हैं।

डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी पहलें यदि एआइ आधारित जोखिम विश्लेषण से जुड़ें तो संभावित नुकसान की पहले पहचान कर किसानों को समय रहते सहायता प्रदान की जा सकती है। नाबार्ड और कृषि अवसंरचना कोष डिजिटल अवसंरचना, ग्रामीण ड्रोन सेवाओं तथा जलवायु-अनुकूल कृषि निवेश को गति दे सकते हैं। जलवायु परिवर्तन की चुनौती वैश्विक है, आवश्यकता इन संसाधनों को प्रभावी विस्तार तंत्र, वित्तीय समर्थन, निष्पक्ष बाजार और किसान-केंद्रित नीतियों के माध्यम से खेतों तक पहुंचाने की है। भारत के खेतों का भविष्य तकनीक, नीति और किसानों के अनुभवजन्य ज्ञान के प्रभावी समन्वय पर निर्भर करेगा। यदि यह समन्वय सफल रहा, तो भारत न केवल अपनी खाद्य सुरक्षा सुदृढ़ करेगा, बल्कि जलवायु स्मार्ट कृषि का वैश्विक मॉडल भी बन सकता है।