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आजादी की रात तिरंगा किसने देश को सौंपा था? कहानी उस महिला की जिसे इतिहास ने पीछे छोड़ दिया

Hansa Mehta 15 August 1947: आजादी की रात तिरंगा राष्ट्र को सौंपने वाली हंसा मेहता की कहानी इतिहास के अनसुने पाठ को सामने लाती है। एक ऐसा अध्याय जिसमें भारत की महिलाओं की भूमिका दर्ज है। 14 अगस्त 1947 को उन्होंने संविधान सभा में महिलाओं की ओर से राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तुत किया था।
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 13, 2026

Hansa Mehta 15 August 1947

Hansa Mehta 15 August 1947: क्या आप जानते हैं कौन थीं हंसा मेहता? (AI Creative)

Hansa Mehta 15 August 1947: भारत की आजादी की कहानी सुनते ही हमारे सामने 14-15 अगस्त 1947 की आधी रात, संविधान सभा और जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक संबोधन आ जाता है। लेकिन उसी ऐतिहासिक रात एक ऐसा दृश्य भी हुआ, जिसकी चर्चा स्वतंत्रता दिवस की सामान्य कहानियों में बहुत कम होती है। भारत का राष्ट्रीय ध्वज संविधान सभा में एक महिला ने राष्ट्र को सौंपा था और ये महिला थीं हंसा मेहता।

14 अगस्त 1947 को संविधान सभा की ऐतिहासिक बैठक में राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी हंसा मेहता ने निभाई। संसद के डिजिटल अभिलेख में दर्ज मूल कार्यवाही के अनुसार, उन्होंने यह ध्वज भारत की महिलाओं की ओर से सभा को प्रस्तुत किया था।

आजादी से कुछ घंटे पहले हुआ था यह ऐतिहासिक क्षण

15 अगस्त की आधी रात को भारत के स्वतंत्र राष्ट्र बनने से पहले संविधान सभा की बैठक 14 अगस्त को शुरू हो चुकी थी। उसी बैठक में सत्ता संभालने की प्रक्रिया, माउंटबेटन के गवर्नर-जनरल बनने और राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रम हुए। जब राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तुत करने की बारी आई तो हंसा मेहता ने कहा कि उन्हें भारत की महिलाओं की ओर से यह ध्वज राष्ट्र को प्रस्तुत करने का गौरव मिला है।

उन्होंने यह भी बताया कि इस समारोह से जुड़ने की इच्छा रखने वाली करीब सौ प्रमुख महिलाओं की सूची उनके पास थी और इसके अलावा भी देश की बहुत-सी महिलाएं इस ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बनना चाहती थीं। यानी आजादी के उस निर्णायक क्षण में तिरंगा सिर्फ एक राजनीतिक प्रतीक नहीं था। उसे देश की महिलाओं की भागीदारी और बलिदान से भी जोड़ा गया था।

हंसा मेहता कौन थीं?

हंसा मेहता केवल संविधान सभा की सदस्य नहीं थीं। वह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी प्रमुख महिला नेताओं में थीं और बाद में भारत के संविधान निर्माण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन 15 अगस्त की कहानी में उनका नाम अक्सर नेहरू, गांधी, सरदार पटेल और माउंटबेटन जैसे बड़े नामों के पीछे दब जाता है।

सबसे दिलचस्प पहलू आखिर बड़े नामों के पीछे क्यों छिपा रह गया ये चेहरा?

जिस राष्ट्रीय ध्वज को आज हर भारतीय गर्व से देखता है, उसकी आजादी की रात की औपचारिक प्रस्तुति में एक महिला की आवाज दर्ज है। यह सिर्फ तिरंगे की कहानी नहीं थी। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया था। संसद के रिकॉर्ड में दर्ज प्रस्ताव के अनुसार ध्वज में केसरिया, सफेद और हरे रंग की तीन क्षैतिज पट्टियां थीं और बीच में अशोक की सिंह राजधानी के चक्र से प्रेरित नीला चक्र रखा गया था।

14 अगस्त की बैठक में हंसा मेहता ने जिस ध्वज को प्रस्तुत किया, वह उस नए भारत की पहचान बनने जा रहा था। उनके शब्दों में यह ध्वज स्वतंत्रता का प्रतीक था और देशवासियों को स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए काम करने की प्रेरणा देता था। इसलिए यह क्षण महज औपचारिकता नहीं था। यह उस भारत की कल्पना का हिस्सा था जिसमें स्वतंत्रता सिर्फ सत्ता बदलने का नाम नहीं, बल्कि एक नए राष्ट्र के निर्माण की जिम्मेदारी भी थी।

आधी रात के जश्न के पीछे महिलाओं की आवाज

स्वतंत्रता की रात संविधान सभा में मौजूद नेताओं ने नए भारत के निर्माण की शपथ ली। अगले दिन, 15 अगस्त को संविधान सभा की सुबह की बैठक में भारत की स्वतंत्रता के अवसर पर दुनिया भर से शुभकामना संदेश पढ़े गए। संसद के मूल दस्तावेज में उस दिन की कार्यवाही भी सुरक्षित है। लेकिन 14 अगस्त की वह तस्वीर खास है, क्योंकि उसमें एक महिला भारत की महिलाओं की ओर से तिरंगा प्रस्तुत करती दिखाई देती है। आज जब हम स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण देखते हैं, तो शायद ही कभी यह सवाल करते हैं कि आजादी के शुरुआती राष्ट्रीय समारोह में महिलाओं की भूमिका क्या थी? हंसा मेहता की कहानी इस सवाल का जवाब देती है।

इतिहास का वह पन्ना जिसे फिर पढ़ने की जरूरत है

15 अगस्त की कहानी सिर्फ यह नहीं कि अंग्रेज भारत से चले गए और देश स्वतंत्र हो गया। उस कहानी में ऐसे सैकड़ों छोटे-बड़े क्षण हैं, जिनमें अलग-अलग वर्गों, क्षेत्रों और महिलाओं ने नए भारत की नींव रखी। हंसा मेहता का 14 अगस्त 1947 का वह क्षण इन्हीं में से एक है। आजादी की रात तिरंगा सिर्फ फहराया नहीं गया था, उसे महिलाओं की ओर से राष्ट्र को सौंपा भी गया था।

शायद यही वजह है कि 15 अगस्त का इतिहास जब अगली बार पढ़ें, तो लाल किले और आधी रात के भाषण के साथ उस महिला का नाम भी याद रखें, जिसने आजाद भारत के पहले राष्ट्रीय प्रतीकों में से एक को देश के सामने प्रस्तुत किया था।