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महिलाओं को बुढ़ापे से बचाता है एस्ट्रोजन हॉर्मोन, मेनोपॉज के बाद क्यों पड़ जाती है एस्ट्रोजन थेरेपी की जरूरत?

Estrogen therapy after menopause: एक उम्र के बाद महिलाओं की संपूर्ण सेहत के लिए रक्षाकवच माना जाने वाला एस्ट्रोजन हार्मोन कम होने लगता है। खासतौर पर मेनोपॉज के बाद इसके न बन पाने से कई महिलाओं में कई तरह के बढ़ते जोखिम को देखते हुए डॉक्टर्स उन्हें एस्ट्रोजन थेरेपी की सलाह देते हैं। अब नई स्टडी में भी खुलासा हुआ है कि महिलाओं में इससे डिमेंशिया और अल्जाइमर का खतरा कम करने के संकेत मिले हैं…
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 13, 2026

Estrogen Therapy Treatment after menopause

Estrogen Therapy Treatment after menopause: मेनोपॉज के बाद बढ़ने वाले शारीरिक जोखिम को कम करने में मदद करती है एस्ट्रोजन थेरेपी, नई स्टडी में भी हुआ चौंकाने वाला खुलासा (AI Creative)

Estrogen therapy after menopause: महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम होता है। इसका असर केवल प्रजनन स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क और याददाश्त पर भी पड़ सकता है। अब एक नई स्टडी में सामने आया है कि जीवन के बाद के वर्षों में एस्ट्रोजन-आधारित हार्मोन थेरेपी लेने वाली महिलाओं में डिमेंशिया और अल्जाइमर से जुड़े कुछ संकेत कम पाए गए। हालांकि शोधकर्ताओं ने साफ कहा है कि इससे यह साबित नहीं होता कि हार्मोन थेरेपी डिमेंशिया को रोकती है।

यह शोध 12 अगस्त 2026 को मेडिकल जर्नल न्यूरोलॉजी में प्रकाशित हुआ। शोधकर्ताओं ने दो बड़े डेटा सेट में कुल 21,462 महिलाओं के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया। इनमें से 1,953 महिलाएं हार्मोन थेरेपी ले रही थीं, जबकि 19,509 ने ऐसी थेरेपी नहीं ली थी। अध्ययन में शामिल हार्मोन थेरेपी लेने वाली महिलाओं ने औसतन 70 वर्ष की उम्र के बाद इसका इस्तेमाल शुरू किया था।

अल्जाइमर के संकेत भी कम मिले

शोध का एक अहम हिस्सा उन महिलाओं से जुड़ा था, जिनकी मृत्यु के बाद उनके मस्तिष्क की जांच की गई। इसमें वैज्ञानिकों ने अल्जाइमर रोग से जुड़े तीन प्रमुख संकेतों, एमिलॉयड-बीटा प्लाक, टाउ टेंगल्स और न्यूरिटिक प्लाक को देखा।

जिन महिलाओं ने एस्ट्रोजन-आधारित हार्मोन थेरेपी ली थी, उनमें अल्जाइमर के मस्तिष्कीय संकेत अपेक्षाकृत कम पाए गए। ऑटोप्सी वाले समूह में 18 प्रतिशत हार्मोन थेरेपी उपयोगकर्ताओं के मस्तिष्क में अल्जाइमर के ये संकेत नहीं मिले, जबकि बिना थेरेपी वाली महिलाओं में यह आंकड़ा 10 प्रतिशत था।

इसके उलट, हार्मोन थेरेपी लेने वाली 40 प्रतिशत महिलाओं में अल्जाइमर के तीनों प्रमुख संकेत पाए गए, जबकि बिना थेरेपी वाली महिलाओं में यह आंकड़ा 51 प्रतिशत था। उम्र, शिक्षा, आनुवंशिक कारकों और उच्च रक्तचाप जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि हार्मोन थेरेपी लेने वाली महिलाओं में ऑटोप्सी के दौरान अल्जाइमर से जुड़े संकेत मिलने की संभावना 35 प्रतिशत कम थी।

डिमेंशिया की क्लिनिकल डायग्नोसिस का खतरा भी कम

शोधकर्ताओं ने जीवित महिलाओं में किए गए बायोमार्कर परीक्षणों को भी देखा। इनमें हार्मोन थेरेपी लेने वाली महिलाओं में रक्त और रीढ़ की हड्डी के द्रव में ऐसे एमिलॉयड संकेत मिले, जो मस्तिष्क में एमिलॉयड के कम जमाव की ओर इशारा करते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि हार्मोन थेरेपी लेने वाली महिलाओं में क्लिनिकल डिमेंशिया की पहचान होने की संभावना 39 प्रतिशत कम थी। इसके साथ ही याददाश्त की समस्या और रोजमर्रा की कार्यक्षमता में गिरावट का जोखिम भी कम देखा गया।

लेकिन यह बड़ा अंतर भी समझें

इस स्टडी को पढ़ते समय सबसे जरूरी बात यही है कि कम जोखिम का संबंध मिलना और किसी उपचार से बीमारी का रुकना एक ही बात नहीं है। शोधकर्ताओं ने खुद कहा है कि अध्ययन यह साबित नहीं करता कि हार्मोन थेरेपी डिमेंशिया को रोकती है। यह एक ऐसा अध्ययन है जिसमें, पहले से उपलब्ध स्वास्थ्य रिकॉर्ड और जैविक संकेतों के आधार पर संबंध देखा गया है। इसलिए इसके आधार पर महिलाओं को डिमेंशिया से बचने के लिए एस्ट्रोजन थेरेपी शुरू करने की सलाह नहीं दी जा सकती।

आज की चिकित्सा पद्धति से क्यों अलग है यह स्टडी?

इस शोध की एक और महत्वपूर्ण सीमा है। अध्ययन में हार्मोन थेरेपी लेने वाली महिलाओं ने इसे औसतन 70 वर्ष की उम्र के बाद शुरू किया था। जबकि वर्तमान चिकित्सा पद्धति में रजोनिवृत्ति के आसपास, यानी आमतौर पर 40 के दशक के अंत से 50 के दशक की शुरुआत में, हार्मोन थेरेपी पर विचार किया जाता है और इसके इस्तेमाल का निर्णय महिला की उम्र, लक्षणों और स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए किया जाता है। इसलिए आज की महिलाओं में कम उम्र में शुरू की जाने वाली हार्मोन थेरेपी का मस्तिष्क पर बिल्कुल यही असर होगा, यह इस अध्ययन से नहीं कहा जा सकता।

यह जानना भी जरूरी

महत्वपूर्ण तथ्य यह जानना भी है कि इस शोध में केवल एस्ट्रोजन-आधारित थेरेपी लेने वाली महिलाओं को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने एस्ट्रोजन के साथ प्रोजेस्टिन वाली संयुक्त थेरेपी को अलग रखा, क्योंकि पहले के शोधों में संयुक्त हार्मोन थेरेपी और डिमेंशिया के जोखिम के बीच अलग तरह के संबंध सामने आए हैं। वर्तमान चिकित्सा पद्धति में अकेले एस्ट्रोजन का इस्तेमाल भी सभी महिलाओं के लिए नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए, गर्भाशय निकाले जाने की स्थिति में एस्ट्रोजन-ओनली थेरेपी का इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि अन्य महिलाओं में गर्भाशय की अंदरूनी परत के कैंसर के जोखिम को देखते हुए उपचार का तरीका अलग हो सकता है।

तो क्या एस्ट्रोजन मस्तिष्क के लिए फायदेमंद हो सकता है?

यह सवाल अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। नई स्टडी यह संकेत जरूर देती है कि बाद की उम्र में एस्ट्रोजन-आधारित हार्मोन थेरेपी और बेहतर मस्तिष्क स्वास्थ्य के बीच संबंध हो सकता है। लेकिन यह तय करने के लिए और शोध की जरूरत है कि यह संबंध वास्तव में हार्मोन के कारण है या इसके पीछे अन्य स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े कारण भी भूमिका निभाते हैं।

स्टडी की लेखिका और स्टैनफोर्ड मेडिसिन की शोधकर्ता जेनिफर ब्रूनो ने भी कहा कि इन निष्कर्षों के आधार पर महिलाओं को मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए हार्मोन थेरेपी लेने की सिफारिश करने से पहले और शोध जरूरी है।

नई स्टडी ने महिलाओं में एस्ट्रोजन-ओनली हार्मोन थेरेपी, अल्जाइमर से जुड़े मस्तिष्कीय संकेत और डिमेंशिया के बीच एक दिलचस्प संबंध सामने रखा है। थेरेपी लेने वाली महिलाओं में डिमेंशिया की क्लिनिकल पहचान की संभावना 39 प्रतिशत कम और ऑटोप्सी में अल्जाइमर संबंधी संकेत मिलने की संभावना 35 प्रतिशत कम देखी गई।

लेकिन इसे इलाज या बचाव का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। खासकर इसलिए क्योंकि अध्ययन में थेरेपी शुरू करने वाली महिलाओं की औसत उम्र करीब 70 वर्ष थी, जो आज की सामान्य हार्मोन थेरेपी पद्धति से अलग है।

इसलिए संदेश साफ है कि, एस्ट्रोजन थेरेपी को डिमेंशिया की रोकथाम का इलाज मानकर खुद से शुरू न करें। इसके फायदे और जोखिम महिला की उम्र, रजोनिवृत्ति की स्थिति और स्वास्थ्य इतिहास के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं।

जानिए एस्ट्रोजन थेरेपी क्या है? किसे पड़ती है जरूरत

एस्ट्रोजन थेरेपी एक तरह का हार्मोन उपचार है, जिसमें शरीर में कम हो चुके एस्ट्रोजन हार्मोन की भरपाई की जाती है। महिलाओं में एस्ट्रोजन मुख्य रूप से अंडाशय बनाते हैं। उम्र बढ़ने और रजोनिवृत्ति के दौरान इसका स्तर तेजी से कम होने लगता है। इसी वजह से कई महिलाओं में गर्मी के तेज दौरे, रात में पसीना, नींद की परेशानी और योनि में सूखापन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

एस्ट्रोजन की कमी क्यों होती है?

महिलाओं में सामान्यतः 45 से 55 वर्ष की उम्र के बीच रजोनिवृत्ति आती है। इस दौरान अंडाशय धीरे-धीरे कम एस्ट्रोजन बनाने लगते हैं। कुछ महिलाओं में अंडाशय की कार्यक्षमता इससे काफी पहले कम हो जाती है। इसे समय से पहले रजोनिवृत्ति या अंडाशय की समय से पहले कम होती कार्यक्षमता से जोड़ा जा सकता है।
एस्ट्रोजन केवल प्रजनन तंत्र से जुड़ा हार्मोन नहीं है। यह हड्डियों, रक्त वाहिकाओं, मस्तिष्क, त्वचा और योनि के ऊतकों सहित शरीर के कई हिस्सों पर असर डालता है। इसलिए इसकी कमी का प्रभाव कई तरह से दिखाई दे सकता है।

किन महिलाओं को और कब एस्ट्रोजन थेरेपी की जरूरत पड़ सकती है?

हर महिला को इसकी जरूरत नहीं होती। डॉक्टर आमतौर पर तब इस पर विचार करते हैं जब रजोनिवृत्ति के लक्षण इतने ज्यादा हों कि रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे।

  1. तेज गर्मी और रात में पसीना

रजोनिवृत्ति के दौरान अचानक शरीर में गर्मी महसूस होना और रात में अत्यधिक पसीना आना आम समस्या है। इसे नियंत्रित करने के लिए हार्मोन थेरेपी प्रभावी उपचारों में शामिल हो सकती है।

  1. योनि में सूखापन और जलन

एस्ट्रोजन की कमी से योनि के ऊतकों में बदलाव हो सकता है। इससे सूखापन, जलन, बार-बार पेशाब आने की समस्या या संभोग के दौरान दर्द हो सकता है। ऐसी स्थिति में कई बार स्थानीय एस्ट्रोजन यानी क्रीम, टैबलेट या रिंग जैसे रूपों में उपचार दिया जाता है।

  1. कम उम्र में रजोनिवृत्ति

यदि किसी महिला में सामान्य उम्र से बहुत पहले एस्ट्रोजन का स्तर कम हो जाता है, तो लंबे समय तक हार्मोन की कमी से हड्डियों और अन्य स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर हार्मोन थेरेपी पर विचार कर सकते हैं।

  1. हड्डियों की सुरक्षा

एस्ट्रोजन हड्डियों के घनत्व को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रजोनिवृत्ति के बाद इसकी कमी से हड्डियों के कमजोर होने का खतरा बढ़ सकता है। कुछ महिलाओं में हार्मोन थेरेपी इस जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।

एस्ट्रोजन अकेला या दूसरे हार्मोन के साथ?

यह इस बात पर निर्भर करता है कि महिला का गर्भाशय मौजूद है या नहीं। यदि गर्भाशय मौजूद है, तो केवल एस्ट्रोजन देने से गर्भाशय की अंदरूनी परत अत्यधिक मोटी होने और आगे चलकर कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए आमतौर पर एस्ट्रोजन के साथ प्रोजेस्टोजन दिया जाता है। यदि गर्भाशय निकाला जा चुका है, तो कुछ महिलाओं में केवल एस्ट्रोजन थेरेपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि किसी दूसरी महिला की हार्मोन थेरेपी देखकर खुद वही दवा शुरू करना सुरक्षित नहीं है।

इसके फायदे क्या हैं?

जरूरत पड़ने पर जब महिला को ये थेरेपी दी जाती है तो इसके फायदे उसे जरूर मिलते हैं-

  • गर्मी के तेज दौरों और रात में पसीने को कम कर सकती है।
  • योनि में सूखापन और उससे जुड़ी परेशानी को कम कर सकती है।
  • रजोनिवृत्ति के आसपास हड्डियों के कमजोर होने के जोखिम को कम कर सकती है।
  • कुछ महिलाओं में नींद और जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला सकती है।

क्या इसके नुकसान भी हैं?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हां। हार्मोन थेरेपी हर महिला के लिए उपयुक्त नहीं होती। कुछ महिलाओं में इससे रक्त के थक्के, स्ट्रोक और कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम जैसे गंभीर दुष्प्रभावों की संभावना बढ़ सकती है। जोखिम इस बात पर भी निर्भर करता है कि महिला की उम्र क्या है, थेरेपी कब शुरू की गई, कौन-सा हार्मोन दिया जा रहा है, कितनी मात्रा में दिया जा रहा है और कितने समय तक लिया जा रहा है।

इसलिए डॉक्टर आमतौर पर सबसे कम प्रभावी मात्रा को सबसे कम जरूरी अवधि तक इस्तेमाल करने और समय-समय पर उपचार की समीक्षा करने पर जोर देते हैं। कई स्टडीज में सामने आया है कि इसके लगातार और लंबे समय तक सेवन से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

डिमेंशिया वाली नई स्टडी का क्या मतलब है?

दरअसल नई स्टडी की चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि, उसमें एस्ट्रोजन-आधारित हार्मोन थेरेपी लेने वाली महिलाओं में डिमेंशिया और अल्जाइमर से जुड़े कुछ संकेत कम पाए गए हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि एस्ट्रोजन थेरेपी अब डिमेंशिया से बचने की दवा बन गई है। यह अध्ययन मुख्य रूप से एक संबंध दिखाता है, इससे यह साबित नहीं होता कि एस्ट्रोजन लेने से डिमेंशिया जरूर कम होगा।

हालांकि एस्ट्रोजन थेरेपी सिर्फ डिमेंशिया या याददाश्त बेहतर करने के लिए सामान्य रूप से नहीं दी जाती। नई स्टडी में भी डिमेंशिया का जोखिम कम होने का संबंध मिला है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि एस्ट्रोजन थेरेपी डिमेंशिया को रोकती है। और हर महिला के लिए हार्मोन थेरेपी सुरक्षित या जरूरी नहीं होती। किस उम्र में शुरू करनी है, कितनी मात्रा में और एस्ट्रोजन अकेला देना है या किसी दूसरे हार्मोन के साथ यह महिला की मेडिकल हिस्ट्री पर निर्भर करता है।