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धान की फसल पर मंडरा रहा मानसून की बेरुखी और कीटों का साया, जानें देखभाल के प्रभावी उपाय

क्या आप जानते हैं कि मौसम की बेरुखी आपकी धान की फसल को कितना कमजोर कर सकती है? जानिए कैसे एक छोटी सी समझदारी आपकी मेहनत और फसल को बचा सकती है?
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भारत

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Vinay Shakya

Aug 13, 2026

protect rice crop

सांकेतिक इमेज (फोटो सोर्स- Chatgpt)

धान की फसल पर मौसम की बेरुखी का असर सीधे किसान की जेब और मेहनत पर पड़ता है। मानसून में अनियमित वर्षा, उमस और तापमान में उतार-चढ़ाव से फसल कमजोर होती है। इसके साथ ही कीट और रोगों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे समय में धान की देखभाल के लिए समझदारी से कदम उठाना आवश्यक है।

मौसम में बदलाव और धान पर असर

मौसम और तापमान में लगातार बदलाव के कारण धान सहित खरीफ फसलों में कीट और रोगों का प्रकोप बढ़ने की संभावना रहती है। कृषि निदेशालय ने इस पर विशेष अलर्ट जारी किया है। किसानों को सलाह दी है कि वे किसी भी समस्या की स्थिति में नजदीकी कृषि रक्षा इकाई या तकनीकी सहायक से संपर्क करें और विभागीय सलाह के अनुसार ही कदम उठाएं।

धान की नर्सरी में मौसम का असर

धान की नर्सरी मौसम के प्रति सबसे संवेदनशील चरण होती है। अचानक वर्षा के बाद उमस और तेज धूप मिलकर फफूंदी, जड़ गलन, बीज सड़न और पत्तियों के झुलसने जैसी समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं। इसलिए नर्सरी डालने के बाद प्रतिदिन निगरानी आवश्यक है। साथ ही, बीज उपचार, जल निकासी और पौधों की घनी बुवाई से बचाव जैसे उपाय अपनाने चाहिए।

धान की फसल पर कीटों का बढ़ता खतरा

मौसम में असंतुलन के कारण हिस्पा कीट का प्रकोप बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह कीट पत्तियों पर सफेद या हल्की पीली धारियां छोड़ता है, जिससे पत्तियां कमजोर हो जाती हैं। प्रारंभिक अवस्था में पहचान कर समय पर नियंत्रण आवश्यक है, क्योंकि बाद में नुकसान बढ़ सकता है। किसान सप्ताह में कम से कम दो बार फसल का निरीक्षण करें और कीटनाशक का छिड़काव समय पर करें।

कीट नियंत्रण के व्यावहारिक उपाय

  • हिस्पा कीट से बचाव के लिए नाइट्रोजन उर्वरक का अत्यधिक उपयोग न करें।
  • खरपतवार नियंत्रण रखें, फसल चक्रीकरण अपनाएं और प्रभावित टहनियों को काटकर नष्ट करें।
  • कीटनाशक के रूप में क्विनालफॉस 25% ईसी का 800 मिलीलीटर प्रति एकड़ छिड़काव प्रभावी माना गया है।

समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाएं

धान में कई कीट जैसे- तना बेधक, आर्मी वर्म, पत्ती लपेटक आदि मौसम और नमी के अनुकूल बढ़ते हैं। IPM के तहत नाइट्रोजन का संतुलित उपयोग, ट्राइकोडर्मा जैव नियंत्रण, मृत मध्य भाग को काटकर नष्ट करना, खरपतवार हटाना और प्रकाश पाश का उपयोग जैसे उपाय शामिल हैं। आवश्यकता पड़ने पर कार्बोफ्यूरान, क्लोरोपाइरीफॉस या मैलाथियान जैसे कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है।

रोगों से बचाव झुलसा और ब्लास्ट

मौसम की बेरुखी से धान में जीवाणु झुलसा और ब्लास्ट रोग का खतरा बढ़ जाता है। खेत की नियमित निगरानी आवश्यक है। झुलसा के लक्षण दिखने पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट का छिड़काव करें। ब्लास्ट के लिए एजोक्सीस्ट्रोबिन और डिफेनोकोनाजोल या हेक्साकोनाजोल जैसे कवक नाशकों का उपयोग प्रभावी होता है।

मौसम के अनुसार सिंचाई और जल निकासी

वर्षा या उमस बढ़ने पर खेत में जलभराव से बचने के लिए जल निकासी व्यवस्था बनाए रखें। वहीं, सूखे या गर्मी के समय में सिंचाई का समय और मात्रा फसल की अवस्था के अनुसार निर्धारित करें। उदाहरण के लिए, नर्सरी में पानी जमा न होने दें और रोपाई के बाद खेत में उचित जल निकासी सुनिश्चित करें।

बदलते मौसम में धान की देखभाल

समस्यासमाधान
अनियमित वर्षा और उमसजल निकासी बनाए रखें, सिंचाई समय पर करें
कीट (हिस्पा, आर्मी वर्म आदि)नियमित निरीक्षण, IPM अपनाएं, कीटनाशक समय पर छिड़कें
रोग (झुलसा, ब्लास्ट)लक्षण दिखते ही कवकनाशक छिड़काव करें
नर्सरी में रोगबीज उपचार, घनी बुवाई से बचें, प्रतिदिन निगरानी करें

मौसम परिवर्तन से धान की फसल पर कई तरह का दबाव बनता है। इसमे कीटों का प्रभाव, रोग और जलभराव या सूखा जैसे कारण शामिल हैं। थोड़ी समझदारी और समय पर कदम उठाकर इन चुनौतियों से बचा जा सकता है। किसानों को अपनी फसल को प्रतिदिन देखना चाहिए। अगर किसी कीट या अन्य कोई प्रभाव दिखे तो नजरअंदाज न करें। नर्सरी से लेकर कटाई तक हर चरण में मौसम और फसल की स्थिति के अनुसार निर्णय लें। इससे लागत में बचत होगी, उत्पादन बेहतर होगा और मुनाफा बढ़ेगा।