13 अगस्त 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

लागत कम, मुनाफा ज्यादा: जानिए सामुदायिक खेती क्यों बन रही है किसानों की नई ताकत

क्या आपने कभी सोचा है कि किसान जब मिलकर खेती करेंगे तो क्या होगा? सामुदायिक खेती के इस अनोखे सफर में फसलें बेहतर होंगी और गांवों की आत्मनिर्भरता और सामाजिक बंधन भी मजबूत होंगे। जानिए कैसे...
2 min read
Google source verification

भारत

image

Adarsh Thakur

Aug 13, 2026

Community Farming

सामुदायिक खेती के लाभ। (फोटोः एआई)

गांवों में सामूहिक खेती यानी सामुदायिक खेती धीरे-धीरे उभर रही है। जब किसान मिलकर खेती की चुनौतियों का सामना करते हैं, तो मिट्टी की सेहत, फसल की गुणवत्ता और गांव की आत्मनिर्भरता में वास्तव में बदलाव आता है। आइए इस लेख में विस्तार से समझते हैं, सामुदायिक खेती के बारे में।

सामुदायिक खेती क्या है?

सामुदायिक खेती वह होती है, जिसमें किसान एक साथ मिलकर खेती की गतिविधियां साझा संसाधनों, तकनीकों और बाजार तक पहुंच के जरिए करते हैं। इससे लागत कम होती है, खेती का जोखिम बांटा जाता है और छोटे किसानों की आवाज मजबूत होती है। उदाहरण के तौर पर, नदिया जिले में खरीफ धान के लिए सामुदायिक पौध उत्पादन पहल में किसानों ने मिलकर नर्सरी स्थापित की, जिससे पौधों की गुणवत्ता बेहतर हुई, लागत घटी और सामूहिक सहभागिता बढ़ी।

मिजोरम में भी सामुदायिक खेती का प्रभाव दिखा है। वहां किसानों ने मशीनरी साझा की, सिंचाई और फसल प्रणाली को बेहतर बनाया। इससे खेती की लागत में बचत हुई, लाभ-लागत अनुपात बेहतर हुआ और रोजगार सृजन में वृद्धि हुई।

ग्रामीण आजीविका और मिट्टी की सेहत में सुधार

मणिपुर के चुड़ाचंदपुर जिले में एक संयुक्त फार्मिंग मॉडल अपनाया गया, जिसमें फसल, पशुपालन, मत्स्य पालन और वर्मी कम्पोस्टिंग को एक साथ जोड़ा गया। इससे किसानों की आजीविका में सुधार हुआ और अन्य गांवों में भी इस मॉडल को अपनाने की प्रेरणा मिली।

कश्मीर घाटी में सीमांत किसानों ने समन्वित खेती प्रणाली अपनाई। पॉलीहाउस, ऑफ-सीजन सब्जी उत्पादन और नर्सरी जैसी तकनीकों से खेती की विविधता और आय में वृद्धि हुई।

सरकार और संस्थानों की भूमिका

सरकार ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (एनएमएनएफ) शुरू किया है। इस मिशन के तहत अगले दो वर्षों में 15,000 समूहों और 1 करोड़ किसानों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है, साथ ही 7.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।

इसके अलावा, “खेत बचाओ अभियान–2026” के तहत सीमांत गांवों में मिट्टी संरक्षण और टिकाऊ कृषि का संदेश पहुंचाया गया। बिहार के मोतिहारी में 62 किसानों ने इस अभियान में भाग लिया और महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में भी कई गांवों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए।

सामुदायिक खेती का असर

इन पहलों से गांवों में खेती का तरीका बदल रहा है। सामूहिक प्रयास से किसान लागत बचा रहे हैं, मिट्टी की सेहत बेहतर हो रही है, और खेती की विविधता से आय में सुधार हो रहा है। सीमांत और आदिवासी इलाकों में यह बदलाव और भी महत्वपूर्ण है, जहां संसाधन सीमित होते हैं। इन क्षेत्रों में सामुदायिक खेती ने नई राह दिखाई है।

किसान क्या कर सकते हैं?

जब किसान मिलकर खेती करते हैं, तो वे अपनी आजीविका सुधारते हैं और गांव की आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता को भी मजबूत करते हैं। सरकार और कृषि संस्थानों को चाहिए कि वे इन मॉडलों को और अधिक गांवों तक पहुंचाएं, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने में मदद करें और स्थानीय संसाधनों के आधार पर खेती को और टिकाऊ बनाएं।