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हिंदू दुकानदारों के एकजुट होने की ऐतिहासिक घटना: 14 अगस्त 1946 को किरण शंकर रॉय ने ऐसा क्यों किया था?

14 अगस्त 1946 को बंगाल में हुआ एक ऐसा ऐतिहासिक विरोध आज भी हमें सिखाता है कि आर्थिक एकता साम्प्रदायिक विभाजन को कैसे चुनौती दे सकती है!
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 14, 2026

hindu protest 1946

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT

आज 14 अगस्त की तारीख भारतीय इतिहास में कई मायनों में महत्वपूर्ण रही है। इस बार हम आपको 14 अगस्त 1946 के एक ऐतिहासिक घटनाक्रम से रूबरू कराते हैं, जब किरण शंकर रॉय ने हिंदू दुकानदारों को एकजुट होने का आह्वान किया था। यह घटना अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे समझने के लिए उस राजनीतिक और सामाजिक तूफान को जानना जरूरी है, जो उस समय ठीक दो दिन बाद बंगाल में आने वाला था।

एक ऐतिहासिक अपील

14 अगस्त 1946 को, बंगाल विधान सभा में कांग्रेस पार्टी के नेता किरण शंकर रॉय ने हिंदू दुकानदारों से अपील की कि वे अपनी दुकानें बंद न करें और सामान्य रूप से कारोबार जारी रखें। यह अपील मुस्लिम लीग द्वारा 16 अगस्त 1946 को घोषित "डायरेक्ट एक्शन डे" (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) की पृष्ठभूमि में आई थी।

बंगाल के तत्कालीन गवर्नर फ्रेडरिक बरोज ने मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी के अनुरोध पर 16 अगस्त को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया था। कांग्रेस ने इस निर्णय का कड़ा विरोध किया और इसे "साम्प्रदायिक राजनीति" करार दिया। कांग्रेस का तर्क था कि अवकाश की स्थिति में उसके समर्थक हिंदू दुकानदारों के पास दुकानें बंद रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा, जिससे वे अनजाने में मुस्लिम लीग की हड़ताल को सफल बनाने में सहयोग दे बैठेंगे। इसी तर्क के आधार पर रॉय ने 14 अगस्त को हिंदू दुकानदारों से आह्वान किया कि वे दो दिन बाद होने वाली हड़ताल के विरोध में अपने प्रतिष्ठान खुले रखें।

16 अगस्त 1946: वह दिन जब कलकत्ता में खून बहा

रॉय की अपील के ठीक दो दिन बाद, 16 अगस्त 1946 को मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने अलग मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान की मांग को लेकर आम हड़ताल और सामूहिक विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया। यह दिन आगे चलकर "डायरेक्ट एक्शन डे" के नाम से जाना गया।

लेकिन यह विरोध जल्द ही एक भीषण साम्प्रदायिक त्रासदी में बदल गया। कलकत्ता में 16 से 19 अगस्त तक चली हिंसा में अनुमानतः 4,000 से लेकर कुछ आकलनों के अनुसार 5,000 से अधिक लोग मारे गए और हजारों लोग घायल हुए। इतिहास में इसे "द ग्रेट कलकत्ता किलिंग" (महान कलकत्ता नरसंहार) के नाम से जाना जाता है - यह भारत विभाजन की ओर बढ़ते घटनाक्रम का एक निर्णायक और सबसे रक्तरंजित अध्याय था।

संदर्भ क्यों मायने रखता है

रॉय का 14 अगस्त का आह्वान इतिहास में इसलिए दर्ज है क्योंकि यह उस भयावह घटनाक्रम से ठीक पहले आया, जिसने बंगाल और आगे चलकर पूरे उपमहाद्वीप की राजनीति को झकझोर दिया। इसे केवल एक "आर्थिक एकजुटता" की प्रेरक कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा - यह उस तीव्र सांप्रदायिक तनाव का हिस्सा था, जिसने अंततः हज़ारों लोगों की जान ले ली और बंगाल के विभाजन की पृष्ठभूमि तैयार की।

यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि उस दौर की राजनीति में कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों के अपने-अपने तर्क और राजनीतिक हित थे। इतिहासकार आज भी इस घटनाक्रम की अलग-अलग व्याख्या करते हैं, और इसे किसी एक पक्ष के नज़रिए से देखना ऐतिहासिक जटिलता को सरल बना देता है।

14 अगस्त 1946 को किरण शंकर रॉय का हिंदू दुकानदारों से हड़ताल का विरोध करने का आह्वान एक वास्तविक ऐतिहासिक घटना है, जो बंगाल विधान सभा में कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा थी। लेकिन इसे समझने के लिए यह जानना अनिवार्य है कि यह अपील किस पृष्ठभूमि में आई - ठीक दो दिन बाद, 16 अगस्त को, कलकत्ता ने अपने इतिहास की सबसे भीषण साम्प्रदायिक हिंसा में से एक देखी। इतिहास के इस अध्याय को उसकी पूरी जटिलता और संदर्भ के साथ देखना ही उससे सही सबक सीखने का रास्ता है।