
water Crisis : कैसे एक किसान ने बदल दी जिले की तस्वीर, PC- AI
एक समय था जब मध्य प्रदेश का देवास जिला पानी के गंभीर संकट के लिए जाना जाता था। हालात इतने खराब हो गए थे कि शहर की प्यास बुझाने के लिए रेलवे से पानी की ट्रेनें मंगानी पड़ती थीं। खेत सूख रहे थे, भूजल लगातार नीचे जा रहा था और किसान एक फसल के भरोसे जीवन गुजार रहे थे। लेकिन आज वही देवास देश में जल संरक्षण के सफल मॉडल के रूप में जाना जाता है।
यह बदलाव किसी बड़ी नदी परियोजना या अरबों रुपये की योजना से नहीं आया, बल्कि किसानों, वैज्ञानिकों और प्रशासन के साझा प्रयासों से संभव हुआ। देवास की यह कहानी बताती है कि यदि वर्षा जल को सही तरीके से संजोया जाए तो जल संकट को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
2000 के दशक की शुरुआत में देवास की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। जिले में औसतन 1,066 मिलीमीटर वर्षा होती थी, लेकिन बारिश का अधिकांश पानी बहकर निकल जाता था। भूजल स्तर कई क्षेत्रों में 600 फीट तक नीचे पहुंच गया था। कुएं और हैंडपंप सूखने लगे थे और किसानों के सामने सिंचाई का संकट खड़ा हो गया था।
स्थिति इतनी गंभीर हुई कि देवास शहर में पेयजल की आपूर्ति के लिए दूसरे शहरों से पानी ट्रेन के जरिए लाना पड़ा। यह घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बनी और प्रशासन को नए समाधान तलाशने के लिए मजबूर कर दिया।
वर्ष 2006 में हरनवाड़ा गांव के किसान रघुनाथ सिंह तोमर ने तत्कालीन जिलाधिकारी उमाकांत उमराव को एक अनुभव बताया। उन्होंने अपने खेत में एक छोटा तालाब बनाकर वर्षा जल संग्रहित किया था। इस तालाब में जमा पानी से वे लगभग 15 एकड़ भूमि की सिंचाई कर पा रहे थे।
यह विचार प्रशासन को पसंद आया और यहीं से ‘भगीरथ कृषक अभियान’ की शुरुआत हुई। किसानों को अपने खेतों में छोटे-छोटे तालाब बनाने के लिए प्रेरित किया गया। धीरे-धीरे यह पहल पूरे जिले में फैल गई और देखते ही देखते यह एक जनआंदोलन बन गया।
भगीरथ कृषक अभियान के तहत किसानों ने अपने खेतों में तालाब बनाकर वर्षा जल संग्रह करना शुरू किया। कुछ वर्षों में ही इसका असर दिखाई देने लगा।
आज देवास जिले में 10,000 से अधिक खेत-तालाब बनाए जा चुके हैं। इन तालाबों ने न केवल वर्षा जल को रोकने में मदद की, बल्कि भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) को भी बढ़ावा दिया।
इसका परिणाम यह हुआ कि जिले में सिंचित क्षेत्र, जो 2000 के दशक के मध्य में लगभग 1 लाख हेक्टेयर था, बढ़कर 4 लाख हेक्टेयर से अधिक हो गया। जहां पहले किसान केवल एक फसल लेते थे, वहीं अब कई क्षेत्रों में दो और तीन फसलें भी ली जा रही हैं।
देवास के कई क्षेत्रों में अब संतरे के बाग भी दिखाई देते हैं, जो कभी पानी की कमी के कारण संभव नहीं माने जाते थे।
देवास मॉडल सिर्फ खेत-तालाबों तक सीमित नहीं था। इसका दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ था रूफ वाटर हार्वेस्टिंग यानी छतों से वर्षा जल संग्रह। भूजल विशेषज्ञ सुनील चतुर्वेदी ने 1998 में एक सरल और कम लागत वाली तकनीक विकसित की। इसमें घरों की छत पर गिरने वाले वर्षा जल को पीवीसी पाइप के माध्यम से सीधे कुएं, बावड़ी या हैंडपंप से जुड़े रिचार्ज ढांचे तक पहुंचाया जाता था।
इससे दो बड़े फायदे हुए:
वर्ष 1999 में देवास में देश का पहला भूजल संवर्धन मिशन शुरू किया गया, जिसने बाद में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की।
कई योजनाएं केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह जाती हैं, लेकिन देवास मॉडल की सफलता का कारण था लोगों की भागीदारी। इस अभियान में -
देवास की कहानी केवल इतिहास नहीं है, बल्कि आज के जल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका भी है।
Updated on:
14 Aug 2026 02:41 pm
Published on:
14 Aug 2026 02:41 pm
