
कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी, इरविन की वैज्ञानिक डोरोटा स्कोवरोन्स्का-क्रावज़िक के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय रिसर्च टीम ने दुनिया की सबसे लंबी उम्र वाले कशेरुकी जीव ग्रीनलैंड शार्क की आंखों से जुड़ा एक अहम वैज्ञानिक संकेत खोजा है। नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, करीब 400 साल तक जीवित रहने वाली यह शार्क अपनी रेटिना को उम्र बढ़ने से होने वाले सामान्य नुकसान से काफी हद तक बचाए रखती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज भविष्य में मैक्युलर डिजनरेशन, ग्लूकोमा जैसी उम्र से जुड़ी आंखों की बीमारियों पर नई रिसर्च और संभावित उपचार विकसित करने में मददगार साबित हो सकती है।
आर्कटिक महासागर की बर्फीली और बेहद कम रोशनी वाली गहराइयों में रहने वाली ग्रीनलैंड शार्क लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए रहस्य रही है। इसकी आंखों पर अक्सर परजीवी चिपके दिखाई देते हैं। इसी वजह से पहले माना जाता था कि यह लगभग अंधी होती होगी।
नए अध्ययन ने इस धारणा को बदल दिया। वैज्ञानिकों ने वीडियो विश्लेषण में देखा कि शार्क अपनी पुतलियों को रोशनी की दिशा में घुमाती है। इससे संकेत मिला कि उसकी दृष्टि काम कर रही है। यहीं से आंखों की गहराई से जांच शुरू हुई।
सन 2020 से 2024 के बीच ग्रीनलैंड के डिस्को द्वीप के पास वैज्ञानिकों ने विशेष लंबी लाइनों की मदद से ग्रीनलैंड शार्क के नमूने जुटाए।
400 साल तक जीवन
आर्कटिक में निवास
नीली रोशनी पहचान
सक्रिय रोडोप्सिन
स्वस्थ रेटिना
कोशिका मृत्यु नहीं
डीएनए मरम्मत संकेत
कम रोशनी अनुकूलन
दृष्टि बनी रही
परजीवी के बावजूद कार्यशील
मैक्युलर डिजनरेशन
ग्लूकोमा रिसर्च
दृष्टि सुरक्षा
बुढ़ापा अध्ययन
नई उपचार संभावनाएं
कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन
बेसल विश्वविद्यालय (स्विट्ज़रलैंड)
कोपेनहेगन विश्वविद्यालय
इंडियाना यूनिवर्सिटी साउथ बेंड
वर्जीनिया इंस्टीट्यूट ऑफ मरीन साइंस
नोट: शार्क की आंखों को विशेष घोल में सुरक्षित रखकर बाद में प्रयोगशाला में उनकी सूक्ष्म जांच की गई।
यूसी इरविन की पीएचडी छात्रा एमिली टॉम ने बताया कि चूहे की छोटी आंखों पर काम करने वाली प्रयोगशाला के लिए बेसबॉल जितनी बड़ी शार्क की आंख का अध्ययन करना बिल्कुल नया अनुभव था।
रिसर्चर्स ने जब रेटिना की कोशिकाओं की जांच की तो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई।
कोशिकाओं के मरने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले।
रेटिना का ढांचा स्वस्थ दिखाई दिया।
उम्र के बावजूद ऊतक सक्रिय बने रहे।
आमतौर पर इंसानों सहित अधिकतर कशेरुकी जीवों में बढ़ती उम्र के साथ रेटिना में गिरावट दिखाई देती है, लेकिन इस शार्क में ऐसा नहीं मिला।
ग्रीनलैंड शार्क की आंखों में रोडोप्सिन नाम का प्रोटीन सक्रिय मिला। यही प्रोटीन कम रोशनी में देखने की क्षमता देता है।
रिसर्च के अनुसार यह प्रोटीन विशेष रूप से नीली रोशनी को पहचानने के लिए अनुकूल है, क्योंकि आर्कटिक की गहराइयों तक सबसे अधिक यही प्रकाश पहुंचता है। इसका मतलब है कि शार्क की पूरी दृश्य प्रणाली उसके प्राकृतिक वातावरण के हिसाब से विकसित हुई है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि शार्क की लंबी उम्र के पीछे केवल धीमा जीवन चक्र नहीं, बल्कि डीएनए रिपेयर सिस्टम भी बड़ी भूमिका निभा सकता है।
—कोशिकाओं की मरम्मत लंबे समय तक होती रहती है।
—रेटिना की कार्यक्षमता बनी रहती है।
—उम्र से जुड़ा क्षरण धीमा पड़ जाता है।
हालांकि वैज्ञानिक अभी यह नहीं कह रहे कि पूरा कारण यही है, लेकिन इसे सबसे मजबूत संभावित तंत्र माना जा रहा है।
अगर वैज्ञानिक समझ पाए कि ग्रीनलैंड शार्क सदियों तक अपनी आंखों को कैसे सुरक्षित रखती है, तो इससे कई गंभीर बीमारियों पर नई रिसर्च आगे बढ़ सकती है।
इनमें शामिल हैं—
मैक्युलर डिजनरेशन
ग्लूकोमा
उम्र से जुड़ी दृष्टि हानि
रेटिना की क्षति
यह खोज भविष्य में ऐसी दवाओं या उपचारों के विकास में मदद कर सकती है जो इंसानी आंखों को लंबे समय तक स्वस्थ रखें।
मुख्य शोधकर्ता डोरोटा स्कोवरोन्स्का-क्रावज़िक के अनुसार, सबसे रोमांचक बात यह थी कि शार्क वास्तव में प्रकाश का पीछा करती दिखाई दी।
उनके शब्दों में, विकास के दौरान प्रकृति किसी ऐसे अंग को लंबे समय तक नहीं बचाती जिसकी ज़रूरत न हो। यही सोच इस पूरी रिसर्च की शुरुआत बनी।
एमिली टॉम ने भी कहा कि शार्क की दृष्टि पर दुनिया में बहुत कम अध्ययन हुए हैं और ऐसी लंबी उम्र वाली प्रजातियां हमें बुढ़ापे को समझने का अनोखा अवसर देती हैं।
हालांकि यह अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन कई प्रश्न अभी खुले हैं—
क्या डीएनए मरम्मत वास्तव में मुख्य कारण है?
क्या यही तंत्र शरीर के दूसरे अंगों में भी काम करता है?
क्या इंसानों में ऐसे जैविक तंत्र विकसित किए जा सकते हैं?
इन सवालों के जवाब भविष्य की रिसर्च से मिलेंगे।
हां। पहले के वैज्ञानिक अध्ययनों में रेडियोकार्बन विश्लेषण से अनुमान लगाया गया था कि कुछ ग्रीनलैंड शार्क लगभग 400 वर्ष तक जीवित रह सकती हैं। इसी वजह से इसे दुनिया का सबसे लंबी उम्र वाला ज्ञात कशेरुकी जीव माना जाता है।अब नई रिसर्च ने इसकी आंखों के स्वास्थ्य को भी इस असाधारण दीर्घायु से जोड़ते हुए एक नया वैज्ञानिक अध्याय खोल दिया है।