
भारत की पहचान लंबे समय से दुनिया के सबसे युवा देशों में होती रही है। यही युवा आबादी भारत के लिए 'जनसांख्यिकीय लाभांश' यानी Demographic Dividend की सबसे बड़ी उम्मीद मानी जाती है। लेकिन तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है।
भारत में भी परिवार छोटे हो रहे हैं और प्रजनन दर लगातार घट रही है। 2024 में भारत की कुल प्रजनन दर यानी एक महिला के जीवनकाल में औसतन बच्चों की संख्या करीब 1.9 आ गई, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है।
इसका मतलब यह नहीं कि भारत की आबादी तुरंत घटने लगेगी। आबादी पर पिछले दशकों की युवा आयु-संरचना का असर अभी कई वर्षों तक रहेगा। लेकिन धीरे-धीरे भारत के सामने एक नई चुनौती आएगी। कम बच्चे, ज्यादा बुजुर्ग और काम करने वाली आबादी पर बढ़ता बोझ।
भारत में अभी भी हर साल करोड़ों बच्चे पैदा होते हैं। संयुक्त राष्ट्र के World Population Prospects 2024 के आंकड़ों के आधार पर 2024 में भारत में करीब 2.32 करोड़ जन्म हुए। 2025 के लिए यह संख्या लगभग 2.31 करोड़ आंकी गई है। लेकिन यहां असली कहानी संख्या नहीं, दिशा है।
भारत में 2019 में लगभग 2.41 करोड़ जन्म हुए थे, जो 2024 में करीब 2.32 करोड़ रह गए। यानी आबादी बढ़ने के बावजूद हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है।
सरकार के SRS आंकड़ों में भी जन्मदर में गिरावट दिखाई देती है। 2023 में भारत की सकल जन्मदर 18.4 प्रति 1,000 आबादी थी, जो 2022 से 0.7 अंक कम थी। इसका सीधा मतलब है भारत में बच्चे पैदा हो रहे हैं, लेकिन पिछली पीढ़ी की तुलना में कम।
भारत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां एक ही समय में दो अलग-अलग जनसांख्यिकीय भारत दिखाई देते हैं। एक तरफ बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड जैसे राज्यों में आबादी अपेक्षाकृत युवा है और प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। दूसरी तरफ दक्षिण भारत के कई राज्यों में प्रजनन दर काफी नीचे जा चुकी है।
2024 के अनुमानों के अनुसार बिहार का TFR करीब 2.9 था, जबकि दिल्ली में यह करीब 1.2 रहा। राष्ट्रीय स्तर पर TFR लगभग 1.9 था।
दक्षिण भारत के कई राज्य भी प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे हैं। इसका परिणाम यह होगा कि आने वाले वर्षों में इन राज्यों में बच्चों की हिस्सेदारी कम और बुजुर्गों की हिस्सेदारी ज्यादा होगी। यही कारण है कि भारत को सिर्फ एक राष्ट्रीय औसत से समझना गलत होगा।
दक्षिण भारत में शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की शिक्षा और रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा परिवार नियोजन की पहुंच पहले बढ़ी। इससे विवाह और बच्चे पैदा करने की उम्र में बदलाव आया और परिवार छोटे हुए। इसके विपरीत उत्तर भारत के कई राज्यों में जनसांख्यिकीय संक्रमण बाद में शुरू हुआ। इसलिए वहां अभी युवा आबादी का अनुपात ज्यादा है।
UNFPA के अनुसार दक्षिणी राज्यों और हिमाचल प्रदेश तथा पंजाब जैसे कुछ राज्यों में बुजुर्ग आबादी का हिस्सा राष्ट्रीय औसत से पहले ही ज्यादा है। वहीं बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे उच्च प्रजनन दर वाले राज्यों में बुजुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ेगी, लेकिन 2036 तक यह राष्ट्रीय औसत से नीचे रहने का अनुमान है। इसका एक बड़ा आर्थिक असर भी है।
युवा आबादी वाले राज्यों को रोजगार चाहिए, जबकि बूढ़े होते राज्यों को स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की ज्यादा जरूरत होगी। यानी आने वाले समय में भारत में रोजगार और बुजुर्गों की देखभाल- दोनों की जरूरत एक साथ बढ़ सकती है।
सरकार के Technical Group on Population Projections के अनुसार 2011 में भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के करीब 10 करोड़ लोग थे। 2036 तक यह संख्या बढ़कर करीब 23 करोड़ होने का अनुमान है। यानी सिर्फ 25 वर्षों में बुजुर्ग आबादी दोगुने से ज्यादा हो सकती है।
उनकी कुल आबादी में हिस्सेदारी भी 2011 के 8.4% से बढ़कर 2036 में 14.9% होने का अनुमान है। इसी अवधि में 15 साल से कम उम्र की आबादी का हिस्सा 30.9% से घटकर 20.1% रह सकता है।
इस बदलाव को एक लाइन में समझिए : 2011 का भारत ज्यादा बच्चों वाला था, 2036 का भारत ज्यादा कामकाजी और बुजुर्ग आबादी वाला होगा।
2047 में भारत अचानक 'बूढ़ा देश' नहीं बन जाएगा। यह बात साफ समझना जरूरी है। UN के अनुमानों के मुताबिक 2035 में भारत की आबादी में 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र वालों की हिस्सेदारी करीब 9.8% हो सकती है। 2050 तक यह लगभग 13.8% के आसपास पहुंचने का अनुमान है।
लेकिन 60+ उम्र के हिसाब से तस्वीर ज्यादा तेज है। UNFPA के 2023 India Ageing Report के अनुसार 2022 में भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र के करीब 14.9 करोड़ लोग थे, जो 2050 तक बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ हो सकते हैं। उनकी हिस्सेदारी 10.5% से बढ़कर करीब 20.8% हो सकती है।
इसलिए 2047 का भारत अभी भी दुनिया के कई विकसित देशों से युवा होगा, लेकिन आज के भारत जैसा युवा नहीं रहेगा।
2060 तक उम्र की संरचना में बदलाव और स्पष्ट होगा। UN World Population Prospects 2024 अब 2100 तक उम्रवार आबादी के अनुमान उपलब्ध कराता है। इसका व्यापक संकेत यही है कि भारत में आने वाले दशकों में बच्चों की हिस्सेदारी घटेगी और बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी। यानी 2060 के भारत में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होगा कि 'हमारे पास कितने लोग हैं?'
बल्कि सवाल होगा- 'उनमें से कितने काम कर रहे हैं और कितनों को काम करने वाली आबादी पर निर्भर रहना पड़ेगा?' यही जनसांख्यिकीय बदलाव अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगा।
Demographic Dividend हमेशा के लिए नहीं रहता। जब जन्मदर गिरती है तो शुरुआत में इसका फायदा मिलता है। बच्चों की संख्या कम होने से परिवार और सरकार शिक्षा व स्वास्थ्य पर प्रति बच्चे ज्यादा खर्च कर सकते हैं। कुछ वर्षों बाद यही बच्चे बड़ी कामकाजी आबादी बनते हैं।
लेकिन इसके बाद जब नई पीढ़ियां छोटी होने लगती हैं और बुजुर्गों की संख्या बढ़ती है तो कामकाजी आबादी का अनुपात स्थिर होने लगता है और फिर घट सकता है।
UNFPA ने चेताया है कि भारत में demographic dividend की खिड़की हमेशा खुली नहीं रहेगी। भारत की median age 2036 तक करीब 36 वर्ष तक पहुंचने का अनुमान दिया गया है।
इसलिए भारत के पास अगले एक-दो दशक बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर इस दौरान पर्याप्त रोजगार, कौशल, शिक्षा और महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ी, तो युवा आबादी आर्थिक ताकत बन सकती है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो बड़ी युवा आबादी बेरोजगारी और कम उत्पादकता का बोझ भी बन सकती है।
यहीं से सबसे बड़ा आर्थिक सवाल शुरू होता है। बुजुर्ग आबादी बढ़ने का अर्थ है-
UNFPA के अनुसार 2050 तक भारत में 60+ आबादी करीब 34.7 करोड़ हो सकती है। 80 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी भी 2022 से 2050 के बीच करीब 279% बढ़ने का अनुमान है।
और बुजुर्गों में आर्थिक असुरक्षा भी बड़ी चुनौती है। UNFPA के अनुसार 40% से अधिक बुजुर्ग सबसे गरीब wealth quintile में हैं और लगभग 18.7% के पास कोई आय नहीं है। यानी समस्या सिर्फ 'बुजुर्ग कितने होंगे?' नहीं है। सवाल है- 'उनकी आय और इलाज का खर्च कौन उठाएगा?'
हां, और इसकी शुरुआत अभी करनी होगी। भारत के पास जापान या यूरोप की तरह बूढ़ी आबादी वाली अर्थव्यवस्था बनने से पहले तैयारी करने का मौका है।
स्वास्थ्य व्यवस्था बदलनी होगी : सिर्फ नए अस्पताल बनाने से काम नहीं चलेगा। जेरियाट्रिक यानी बुजुर्गों के लिए विशेष स्वास्थ्य सेवाएं, घर पर देखभाल, पुनर्वास और दीर्घकालिक देखभाल की व्यवस्था बढ़ानी होगी।
पेंशन का दायरा मजबूत करना होगा : हर बुजुर्ग को सरकारी पेंशन नहीं मिलती। इसलिए सामाजिक सुरक्षा का कवरेज बढ़ाना जरूरी होगा।
बुजुर्गों को सिर्फ निर्भर आबादी न मानें : जो लोग 60-70 की उम्र में काम करना चाहते हैं, उनके लिए लचीले रोजगार और पुनःकौशल की व्यवस्था की जा सकती है।
बुजुर्ग महिलाओं की स्थिति ज्यादा संवेदनशील हो सकती है क्योंकि उनकी जीवन प्रत्याशा ज्यादा है और विधवा होकर अकेले रहने की संभावना भी बढ़ती है। UNFPA ने इसे भारत की ageing challenge का महत्वपूर्ण हिस्सा माना है।
आज जो 20-30 साल का युवा है, वही 2047-60 के भारत का बुजुर्ग होगा। इसलिए पेंशन, बचत, स्वास्थ्य बीमा और दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा को सिर्फ सरकारी योजना नहीं, व्यक्तिगत वित्तीय योजना का हिस्सा बनाना होगा।
असली सवाल आबादी घटने का नहीं, आबादी की उम्र का है : भारत के लिए आने वाली चुनौती यह नहीं है कि कल से बच्चे पैदा होना बंद हो जाएंगे। भारत की आबादी अभी कई दशकों तक बढ़ सकती है। UN के मुताबिक भारत उन देशों में है जिनकी आबादी 2054 तक बढ़ती रहने की संभावना है। लेकिन उसी दौरान आबादी की उम्र बदलती जाएगी।
कम बच्चे → बड़ी कामकाजी आबादी → फिर बढ़ती बुजुर्ग आबादी
यही demographic transition है। भारत के पास अभी एक अनोखा मौका है। देश के पास बड़ी युवा आबादी है और साथ ही ageing की चुनौती अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है। अगर अगले 15-20 वर्षों में रोजगार, कौशल, महिलाओं की भागीदारी, स्वास्थ्य, पेंशन और बचत पर निवेश किया गया तो भारत demographic dividend को आर्थिक ताकत में बदल सकता है।
लेकिन अगर तैयारी टलती रही तो 2047 का सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि भारत कितना अमीर है, बल्कि यह भी होगा- 'इतनी बड़ी बुजुर्ग आबादी की देखभाल करने के लिए हमारे पास कितने कामकाजी लोग और कितना पैसा बचेगा?' यही कारण है कि भारत को आज से ही 'युवा भारत' के साथ-साथ 'Ageing India' की भी तैयारी करनी होगी।