
IVF first test tube baby of India: भारत में IVF की कहानी सिर्फ एक बच्चे के जन्म की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब दुनिया में पहली बार इंसान को शरीर के बाहर fertilize करके गर्भ में विकसित करने की कोशिश सफल हुई थी और भारत ने भी उसी साल इस असाधारण वैज्ञानिक दौड़ में अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी थी। लेकिन भारत की कहानी में एक ऐसा विवाद जुड़ गया, जिसने दशकों तक यह सवाल जिंदा रखा, देश का पहला टेस्ट-ट्यूब बेबी आखिर किसे माना जाए?
25 जुलाई 1978 को ब्रिटेन में Louise Brown का जन्म हुआ। वह दुनिया की पहली IVF baby थीं। इस उपलब्धि ने इनफर्टिलिटी ट्रीटमेंट की दिशा बदल दी। लेकिन महज कुछ महीनों के भीतर भारत से भी एक ऐसी खबर आई, जो आज रिप्रोडक्टिव मेडिसिन के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कोलकाता के डॉक्टर सुभाष मुखर्जी (Mukhopadhyay) और उनके सहयोगियों ने 3 अक्टूबर 1978 को एक बच्ची के जन्म की घोषणा की। बच्ची का नाम सार्वजनिक रूप से लंबे समय तक सामने नहीं आया और उसे बाद में कनुप्रिया या दुर्गा के नाम से जाना गया।
उपलब्ध शोध के अनुसार यह दुनिया का दूसरा और भारत का पहला IVF जन्म था। हालांकि उस समय इसे आधिकारिक वैज्ञानिक मान्यता नहीं मिली। यहीं से भारतीय IVF इतिहास का सबसे बड़ा विवाद शुरू हुआ।
मुखर्जी की टीम ने केवल IVF ही नहीं किया था। उनके काम में ovarian stimulation और embryo cryopreservation जैसी तकनीकें भी शामिल थीं। शोध में यह उल्लेख मिलता है कि उन्होंने embryo को freeze करके बाद में thaw कर uterus में transfer करने की तकनीक का इस्तेमाल किया था।
आज embryo freezing IVF का जाना-पहचाना हिस्सा है, लेकिन 1978 में यह तकनीक बेहद शुरुआती अवस्था में थी। समस्या यह थी कि Mukerji अपने काम को उस समय उस स्तर पर peer-reviewed scientific literature में प्रकाशित नहीं कर पाए, जिससे उनकी उपलब्धि को व्यापक वैज्ञानिक समुदाय में स्वीकार्यता मिल सके।
पश्चिम बंगाल सरकार ने उनके दावे की जांच के लिए समिति भी बनाई, जिसने उनके दावे को स्वीकार नहीं किया। वैज्ञानिक उपलब्धि और उसकी documentation के बीच यही अंतर आगे चलकर भारत के IVF इतिहास का सबसे बड़ा विवाद बना।
इस बीच भारतीय चिकित्सा शोध संस्थानों ने IVF पर व्यवस्थित काम जारी रखा। ICMR ने 1982 में infertility treatment के क्षेत्र में एक project को समर्थन दिया, जिसमें T.C. Anand Kumar और Indira Hinduja से जुड़ी टीम ने काम किया। इसका परिणाम 6 अगस्त 1986 को मुंबई में Harsha के जन्म के रूप में सामने आया। इसे भारत का पहला “scientifically documented” IVF baby माना गया।
1978 की Durga/Kanupriya को कई ऐतिहासिक और वैज्ञानिक स्रोत भारत की पहली IVF baby मानते हैं, जबकि 1986 की Harsha को भारत की पहली scientifically documented IVF baby कहा गया। ध्यान देना होगा कि दोनों दावों को अक ही अर्थ में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
इस कहानी का सबसे मानवीय हिस्सा है कि जिस वैज्ञानिक ने इतनी बड़ी उपलब्धि का दावा किया, वह अपने जीवन में सम्मान नहीं पा सके। Mukerji को पेशेवर आलोचना और प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ा।
बाद में उन्हें ऐसे स्थानों पर ट्रांसफर किया गया जहां उनका रिप्रोडक्टिव रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम जारी रखना मुश्किल हो गया। 1981 में उन्होंने अपनी ही जान ले ली।
कई साल बाद डॉ. T.C. Anand Kumar ने Mukerji के पुराने काम को लेकर स्टडी करना शुरू किया। उनके योगदान को सामने लाने की कोशिश की। 1997 में उन्होंने प्रकाशित लेख के माध्यम से Mukerji को भारत के पहले test-tube baby के पीछे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक के रूप में पहचान देने की मांग की।
इसके बाद धीरे-धीरे भारतीय वैज्ञानिक समुदाय में Mukerji की भूमिका को मान्यता मिलने लगी। ICMR ने बाद के वर्षों में उनके योगदान को अपनी ART guidelines और memorial activities के माध्यम से भी याद किया।
आज IVF लाखों परिवारों की उम्मीद से जुड़ी तकनीक बन चुका है। लेकिन इसकी भारतीय यात्रा हमें बताती है कि विज्ञान केवल प्रयोगशाला में सफलता हासिल करने का नाम नहीं है। कहना होगा कि वैज्ञानिक प्रमाण, peer review, संस्थागत समर्थन और सही समय पर रिकगनिशन, ये भी विज्ञान के इतिहास को तय करते हैं।
1978 में भारत के पास तकनीकी प्रतिभा थी, लेकिन वैज्ञानिक और संस्थागत व्यवस्था उस उपलब्धि को संभाल नहीं सकी। 1986 में ICMR के संस्थागत समर्थन के साथ वही क्षेत्र ज्यादा व्यवस्थित रूप में सामने आया।
और यही patrika.com इस सीरीज का महत्वपूर्ण सवाल भी है कि जिस IVF को कभी “असंभव” माना गया था, वह आज भारत में परिवार बनाने का विकल्प बन चुका है। लेकिन क्या तकनीक की रफ्तार के साथ हमारा कानून, समाज और नैतिक सोच भी उतनी ही तेजी से बदली है? यहीं से कहानी का अगला अध्याय शुरू होता है, चमत्कार से कारोबार तक, आखिर IVF भारत में इतनी तेजी से कैसे फैला? पढ़िए सीरीज के अगले हिस्से में