
IVF in India: 1986 में जब मुंबई के KEM Hospital में हर्षा का जन्म हुआ, तब IVF भारत के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। एक ऐसा बच्चा, जिसकी शुरुआत मां के शरीर के बाहर स्पर्म और एग मिलन से हुई थी, उस समय इसे विज्ञान की असाधारण उपलब्धि माना गया। लेकिन उस बच्ची के जन्म के बाद भारत की IVF कहानी खत्म नहीं हुई, बल्कि पूरी स्टोरी यहीं से शुरू हुई।
आज IVF सिर्फ बड़े शहरों के कुछ अस्पतालों तक सीमित तकनीक नहीं है। Fertility clinics, ICSI, embryo freezing, donor sperm और egg, fertility preservation जैसी तकनीकें धीरे-धीरे भारतीय रिप्रोडक्टिव हेल्थकेयर का हिस्सा बन चुकी हैं। सवाल है, आखिर 1986 के उस एक बच्चे से आज के बड़े फर्टिलिटी सेक्टर तक भारत कैसे पहुंचा?
भारत में IVF का वैज्ञानिक रूप से डॉक्यूमेंटेड ब्रेकथ्रो केईएम अस्पताल और ICMR के Institute for Research in Reproduction के सहयोगी प्रोजेक्ट से आया। ICMR के इतिहास रिकॉर्ड में हर्षा को भारत के वैज्ञानिक रूप से स्थापित टेस्ट-ट्यूब बेबी के रूप में दर्ज किया गया है। शुरुआती दौर में IVF बेहद सीमित सुविधाओं और विशेषज्ञता वाला उपचार था। लेकिन जैसे-जैसे रिप्रोडक्टिव मेडिसिन की तकनीकें बेहतर हुईं। इनफर्टिलिटी ट्रीटमेंट के विकल्प भी बढ़ने लगे।
1990 के दशक में सहायक प्रजनन (assisted reproduction) भारत में सिर्फ सरकारी रिसर्च प्रोजेक्ट नहीं रहा। प्राइवेट फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट्स और क्लिनिक्स तेजी से इस क्षेत्र में आने लगे। एक शैक्षणिक अध्ययन के मुताबिक 1990 के दशक के अंत तक मीडिया ने IVF और infertility treatment को बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंचाना शुरू कर दिया था। इससे IVF को लेकर जागरुकता और मांग दोनों बढ़े। यानी IVF के फैलने की कहानी में विज्ञान के साथ मीडिया और निजी हेल्थ केयर सेक्टर की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।
IVF में egg और sperm को लेबोरेट्री में फर्टलाइज करने की कोशिश की जाती है। लेकिन कुछ पुरुषों में sperm की संख्या या उसकी क्षमता इतनी कम होती है कि सामान्य IVF से फर्टिलाइजेशन मुश्किल हो सकता है। यहीं ICSI यानी इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन जैसी तकनीक महत्वपूर्ण बनी। इसमें एक स्पर्ट और को सीधे एग के अंदर inject किया जाता है।
इस बदलाव ने मेल इंफर्टिलिटी के कई मामलों में assisted reproduction के विकल्प बढ़ाए। भारत में भी धीरे-धीरे ऐसी advanced ART techniques fertility centres तक पहुंचने लगीं। इसका मतलब यह था कि IVF अब सिर्फ 'महिला को गर्भधारण कराने की तकनीक' नहीं रह गया था। यह मेल इंफर्टिलिटी समेत कई रिप्रोडक्टिव प्रॉब्लम्स के ट्रीटमेंट का हिस्सा बन रहा था।
2014 में प्रकाशित नेशनल एआरटी रजिस्ट्री ऑफ इंडिया के एक विश्लेषण के मुताबिक भारत में IVF-ICSI साइकल्स की संख्या 2000 में लगभग 5,500 से बढ़कर 2006 में करीब 21,500 हो गई थी। उस समय 2011 के लिए लगभग 1.10 लाख साइकल्स का प्रोजेक्शन दिया गया था। यह आंकड़ा आज की तस्वीर नहीं है, लेकिन इससे उस दौर की growth की दिशा साफ दिखाई देती है।
2019 तक भारत में लगभग 1,500 एआरटी सेंटर्स होने का अनुमान IFFS Surveillance data के आधार पर प्रकाशित एक रिव्यू में दिया गया। उसी review के अनुसार 2010 में यह संख्या लगभग 500 थी। हालांकि यहां सावधानी जरूरी है, भारत में IVF centres की गिनती अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग रजिस्ट्रीज और डेफिनेशन्स से की गई है। इसलिए इन आंकड़ों को सीधे आज के रजिस्टर्ड क्लिनिक्स से तुलना नहीं करना चाहिए।
भारत में इनफर्टिलिटी की प्रीवलेंस अलग-अलग अध्ययनों और पॉपुलेशन्स में काफी बदलती है। यूरोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया की गाइडलाइन में भारत के लिए 3.9% से 16.8% तक का रेंज बताया गया है। लेकिन इंफर्टिलिटी केवल एक मेडिकल इश्यू नहीं है।
भारतीय समाज में लंबे समय से विवाह के बाद बच्चे को परिवार की अनिवार्य अपेक्षा माना जाता रहा है। ऐसे में इनफर्टिलिटी का दबाव सिर्फ व्यक्ति या कपल तक सीमित नहीं रहता। परिवार, रिश्तेदार और सामाजिक धारणाएं भी इसमें शामिल हो जाती हैं। यही वजह है कि IVF ने भारत में केवल मेडिकल टेक्नोलॉजी के रूप में जगह नहीं बनाई। उसने उन कपल्स के लिए एक नया रास्ता बनाया, जिनके लिए प्राकृतिक कंसेप्शन मुश्किल या असंभव हो रहा था।