
हिंदी के युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित 'केदारनाथ सिंह कविता सम्मान' (हिंदी भाषा श्रेणी) दिए जाने की घोषणा हुई है। यह सम्मान उनकी कविताओं में मौजूद मानवीय संवेदना, पड़ोस, रिश्तों और भारतीय समाज के आंतरिक जीवन की गहरी पड़ताल के लिए दिया जा रहा है। कन्नड़ भाषा श्रेणी में यह सम्मान कवि राजेंद्र प्रसाद को मिलेगा।
समिति ने विभिन्न भारतीय भाषाओं की कृतियों पर विचार-विमर्श के बाद हिंदी श्रेणी में अदनान कफ़ील दरवेश और कन्नड़ श्रेणी में राजेंद्र प्रसाद के नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लगाई। चयन का आधार रचनाकारों की समग्र साहित्यिक उपस्थिति, समकालीन कविता में योगदान और उनकी काव्य-दृष्टि का प्रभाव रहा। अदनान कफ़ील दरवेश की कविता 'क़िबला प्रस्तुत है:
माँ कभी मस्जिद नहीं गई
कम से कम जब से मैं जानता हूँ माँ को
हालाँकि नमाज़ पढ़ने औरतें मस्जिदें नहीं जाया करतीं हमारे यहाँ
क्यूंकि मस्जिद ख़ुदा का घर है और सिर्फ़ मर्दों की इबादतगाह
लेकिन औरतें मिन्नतें-मुरादें मांगने और ताखा भरने मस्जिदें जा सकती थीं
लेकिन माँ कभी नहीं गई
शायद उसके पास मन्नत माँगने के लिए भी समय न रहा हो
या उसकी कोई मन्नत रही ही नहीं कभी
ये कह पाना मेरे लिए बड़ा मुश्किल है
यूँ तो माँ नइहर भी कम ही जा पाती
लेकिन रोज़ देखा है मैंने माँ को
पौ फटने के बाद से ही देर रात तक
उस अँधेरे-करियाये रसोईघर में काम करते हुए
सब कुछ करीने से सईंतते-सम्हारते-लीपते-बुहारते हुए
जहाँ उजाला भी जाने से ख़ासा कतराता था
माँ का रोज़ रसोईघर में काम करना
ठीक वैसा ही था जैसे सूरज का रोज़ निकलना
शायद किसी दिन थका-माँदा सूरज न भी निकलता
फिर भी माँ रसोईघर में सुबह-सुबह ही हाज़िरी लगाती.
रोज़ धुएँ के बीच अँगीठी-सी दिन-रात जलती थी माँ
जिसपर पकती थीं गरम रोटियाँ और हमें निवाला नसीब होता
माँ की दुनिया में चिड़ियाँ, पहाड़, नदियाँ
अख़बार और छुट्टियाँ बिलकुल नहीं थे
उसकी दुनिया में चौका-बेलन, सूप, खरल, ओखरी और जाँता थे
जूठन से बजबजाती बाल्टी थी
जली उँगलियाँ थीं, फटी बिवाई थी
उसकी दुनिया में फूल और इत्र की ख़ुश्बू लगभग नदारद थे
बल्कि उसके पास कभी न सूखने वाला टप्-टप् चूता पसीना था
उसकी तेज़ गंध थी
जिससे मैं माँ को अक्सर पहचानता.
ख़ाली वक़्तों में माँ चावल बीनती
और गीत गुनगुनाती-
"..लेले अईहS बालम बजरिया से चुनरी”
और हम, "कुच्छु चाहीं, कुच्छु चाहीं…" रटते रहते
और माँ डिब्बे टटोलती
कभी खोवा, कभी गुड़, कभी मलीदा
कभी मेथऊरा, कभी तिलवा और कभी जनेरे की दरी लाकर देती.
एक दिन चावल बीनते-बीनते माँ की आँखें पथरा गयीं
ज़मीन पर देर तक काम करते-करते उसके पाँव में गठिया हो गया
माँ फिर भी एक टाँग पर खटती रही
बहनों की रोज़ बढ़ती उम्र से हलकान
दिन में पाँच बार सिर पटकती ख़ुदा के सामने.
माँ के लिए दुनिया में क्यों नहीं लिखा गया अब तक कोई मर्सिया, कोई नौहा ?
मेरी माँ का ख़ुदा इतना निर्दयी क्यूँ है ?
माँ के श्रम की क़ीमत कब मिलेगी आख़िर इस दुनिया में ?
मेरी माँ की उम्र क्या कोई सरकार, किसी मुल्क का आईन वापिस कर सकता है ?
मेरी माँ के खोये स्वप्न क्या कोई उसकी आँख में
ठीक उसी जगह फिर रख सकता है जहाँ वे थे ?
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब समकालीन हिंदी कविता में नये स्वर और नई संवेदनाओं की चर्चा तेज़ है। सम्मान समिति के अनुसार अदनान की कविताएं कठिन समय में भी संवाद, भाईचारे और मानवीय समझ की संभावनाओं को जीवित रखती हैं। यही उनकी रचनात्मक पहचान को अलग बनाता है।
अदनान कफ़ील दरवेश का जन्म 30 जुलाई 1994 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के गड़वार गांव में हुआ। शुरुआती शिक्षा बलिया में पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आए। पिछले कुछ बरसों के दौरान उन्होंने समकालीन हिंदी कविता में अपनी अलग पहचान बनाई है।
उनकी कविताओं में गांव और शहर के बीच बदलती ज़िंदगी, साधारण लोगों के अनुभव, पड़ोसी संबंध, सामाजिक असुरक्षा और मानवीय रिश्तों की गर्माहट बार-बार दिखाई देती है। आलोचकों का मानना है कि वे रोज़मर्रा की भाषा में गहरे सामाजिक प्रश्न उठाते हैं, इसलिए उनकी कविताएँ पाठकों से सीधे संवाद करती हैं।
अदनान कफ़ील दरवेश की कविता की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वे बड़े राजनीतिक या वैचारिक विमर्शों को भी आम आदमी की ज़िंदगी के छोटे अनुभवों के माध्यम से सामने लाते हैं।
उनकी रचनाओं में अक्सर ऐसे पात्र मिलते हैं जो किसी भी भारतीय मोहल्ले या गांव में दिखाई दे सकते हैं। वे पड़ोस, परिवार, दोस्ती और साझा जीवन के अनुभवों को इस तरह लिखते हैं कि पाठक उन्हें अपना अनुभव महसूस करता है।
यही कारण है कि उन्हें समकालीन हिंदी कविता की नई पीढ़ी के महत्वपूर्ण कवियों में गिना जाता है।
सम्मान समिति की ओर से जारी वक्तव्य में निर्णायक मंडल ने कहा कि अदनान कफ़ील दरवेश की कविताएं "मौजूदा कठिन समय में एक भारतीय नागरिक के आंतरिक जीवन का आईना" प्रस्तुत करती हैं।
जूरी का मानना है कि उनकी रचनाएं केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे समाज में संवाद और समझ के दायरे को विस्तृत करती हैं। उनकी कविता पाठक को यह महसूस कराती है कि अलग-अलग अनुभवों के बावजूद साझा जीवन संभव है।
निर्णायकों ने विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि अदनान की कविताओं में प्रतिरोध का स्वर भी है, लेकिन वह आक्रोश से अधिक मानवीय भरोसे के माध्यम से सामने आता है।
वर्ष 2026 के केदारनाथ सिंह कविता सम्मान के लिए चयन प्रक्रिया प्रतिष्ठित साहित्यकारों की निर्णायक समिति ने पूरी की।
समिति के संयोजक प्रो. ए. अरविंदाक्षन ने पुरस्कारों की आधिकारिक घोषणा की। चयन प्रक्रिया में विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य को ध्यान में रखते हुए विचार-विमर्श किया गया। समिति ने हिंदी श्रेणी में अदनान कफ़ील दरवेश और कन्नड़ श्रेणी में राजेंद्र प्रसाद के नाम पर सहमति जताई।
सम्मान समिति के अनुसार चयन का आधार कवि की समग्र रचनात्मक उपस्थिति, समकालीन कविता में योगदान और साहित्यिक प्रभाव रहा।
अदनान कफ़ील दरवेश का नाम राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार व्यापक चर्चा में तब आया जब उन्हें वर्ष 2018 में उनकी चर्चित कविता 'क़िबला' के लिए प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला।
यह पुरस्कार हिंदी की युवा कविता के सबसे महत्वपूर्ण सम्मानों में माना जाता है। 'क़िबला' को उस समय नई पीढ़ी की प्रतिनिधि कविता के रूप में सराहा गया था।
इसके बाद उनकी रचनाएं लगातार प्रमुख साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं और उन्होंने अपने लेखन के ज़रिए एक स्थायी पाठक वर्ग बनाया।
यह सम्मान हिंदी के महान कवि स्वर्गीय केदारनाथ सिंह की स्मृति में 'साखी' पत्रिका व सम्मान समिति की ओर से दिया जाता है।
केदारनाथ सिंह आधुनिक हिंदी कविता के उन प्रमुख कवियों में रहे, जिन्होंने भाषा को आम जनजीवन से जोड़ा। उनकी कविता में गांव, शहर, प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों की गहरी उपस्थिति दिखाई देती है।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले रचनाकारों को यह सम्मान देकर नई पीढ़ी की कविता को प्रोत्साहन दिया जाता है।
अदनान कफ़ील दरवेश की कई चर्चित काव्य रचनाएं राजकमल प्रकाशन समूह के माध्यम से पाठकों तक पहुंची हैं।
राजकमल हिंदी के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थानों में से एक गिना जाता है। इस समूह ने लंबे समय से स्थापित साहित्यकारों के साथ-साथ नए रचनाकारों को भी मंच दिया है।
सम्मान की घोषणा के बाद राजकमल प्रकाशन ने भी अपने आधिकारिक मंचों पर अदनान को बधाई दी और उनकी उपलब्धि को समकालीन हिंदी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण बताया।
पिछले कुछ वर्षों में हिंदी कविता में ऐसे युवा रचनाकार उभरे हैं जो पहचान, स्मृति, रोज़मर्रा की ज़िंदगी और सामाजिक रिश्तों पर नए ढंग से लिख रहे हैं। अदनान कफ़ील दरवेश इसी पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षरों में शामिल हैं।
उनकी कविताएं पाठकों को बड़े नारों से अधिक छोटे अनुभवों की ताकत का एहसास कराती हैं। शायद यही वजह है कि केदारनाथ सिंह कविता सम्मान की जूरी ने उन्हें ऐसे कवि के रूप में चुना, जो कठिन समय में भी संवाद, भरोसे और साझा नागरिकता की संभावना को अपनी कविता में जीवित रखता है।
वर्ष 2026 के केदारनाथ सिंह कविता सम्मान के लिए चयन प्रक्रिया पांच सदस्यीय निर्णायक मंडल ने पूरी की। समिति के संयोजक प्रो. ए. अरविंदाक्षन थे। उनके साथ हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री गगन गिल, कन्नड़ के प्रख्यात कवि-नाटककार एच. एस. शिवप्रकाश और तमिल के चर्चित कथाकार इमयम (Imayam) निर्णायक मंडल में शामिल थे।