
सांकेतिक इमेज (सोर्स-ChatGpt)
भारत में हाइड्रोपावर (जलविद्युत) में निवेश की संभावनाओं को समझना आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। यह न केवल एक स्वच्छ ऊर्जा विकल्प है, बल्कि ग्रिड की स्थिरता और ऊर्जा भंडारण (स्टोरेज) के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आइए जानते हैं कि इस क्षेत्र में निवेश के लिए क्या अवसर हैं? किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और आम निवेशक या नीति-निर्माता इसे कैसे समझ सकते हैं?
सरकार ने हाल ही में बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स (25 मेगावाट से अधिक) को गैर-सौर अक्षय ऊर्जा (Non-solar Renewable Energy) के अंतर्गत शामिल कर लिया है। इसके साथ ही, हाइड्रो पर्चेज ऑब्लिगेशन (HPO) को अलग से स्थापित किया गया है, जिससे बिजली वितरण कंपनियों को हाइड्रो से बिजली खरीदने का दायित्व बढ़ेगा। टैरिफ नीति में भी बदलाव किए गए हैं।
इसके तहत प्रोजेक्ट की आयु को 40 वर्ष तक बढ़ाना, ऋण चुकौती अवधि को 18 वर्ष करना और 2% वार्षिक टैरिफ वृद्धि की अनुमति देना शामिल है। इन कदमों से हाइड्रो प्रोजेक्ट्स की आर्थिक व्यवहार्यता बेहतर हो सकती है। इसके अतिरिक्त, सरकार ने पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने के लिए दिशा निर्देश जारी किए हैं। इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS) शुल्क में छूट दी है और DPR (Detailed Project Report) की स्वीकृति के समय को कम किया है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के अनुसार, भारत में बड़े हाइड्रो की उपयोग योग्य क्षमता लगभग 1,33,410 मेगावाट है, जिसमें से अब तक लगभग 42,105 मेगावाट ही विकसित किया गया है। अर्थात अभी भी बहुत बड़ा हिस्सा शेष है।
छोटे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स (SHPs) की बात करें तो, फरवरी 2026 तक इनकी क्षमता लगभग 5,171 मेगावाट थी, जो 2016 में 4,273 मेगावाट थी। यह वृद्धि धीमी रही है, और SHPs का कुल अक्षय ऊर्जा उत्पादन में हिस्सा मात्र 1% है। हाल ही में पंप्ड स्टोरेज और बड़े हाइड्रो में तेजी आई है। नवंबर 2025 तक, बड़े हाइड्रो की स्थापित क्षमता 50,415 मेगावाट और छोटे हाइड्रो की 5,159 मेगावाट थी। साल 2024–25 में लगभग 800 मेगावाट की नई क्षमता जुड़ी, जबकि 2025–26 में नवंबर तक 2,620 मेगावाट का अतिरिक्त विकास हुआ।
हाइड्रोपावर ग्रिड स्थिरता, पीक लोड प्रबंधन और ऊर्जा भंडारण के लिए महत्वपूर्ण है। यह विशेष रूप से सौर और पवन जैसे अस्थिर ऊर्जा स्रोतों के साथ तालमेल में कार्य करता है। CEA की योजना के अनुसार, 2031–32 तक कुल हाइड्रो क्षमता 88 गीगावाट तक पहुंचने की संभावना है, जिसमें 26 गीगावाट पंप्ड स्टोरेज से आएगा। इसके लिए अनुमानित निवेश लगभग 3.2 ट्रिलियन रुपये है।
हाइड्रो प्रोजेक्ट्स में अक्सर देरी और लागत वृद्धि होती है। इसके पीछे भू-तकनीकी जोखिम, पर्यावरणीय स्वीकृति, भूमि अधिग्रहण और सामाजिक विरोध जैसे कारण हैं। उदाहरण के लिए, संसद की ऊर्जा समिति ने 24 देरी वाले प्रोजेक्ट्स की पहचान की है, जिनमें लागत वृद्धि 472% तक रही है। छोटे प्रोजेक्ट्स में वित्तीय व्यवहार्यता और भुगतान जोखिम बड़ी बाधा है। इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक आपदाओं, बीमा लागत और पारिस्थितिकीय प्रभावों के कारण निवेश जोखिम बढ़ जाता है।
हाइड्रो को 'ग्रीन एनर्जी' के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन निजी निवेश अभी भी सीमित है। इसका मुख्य कारण सामाजिक-पर्यावरणीय विरोध और राजनीतिक जोखिम हैं। सरकार ने नियमों को सरल किया है, लेकिन स्थानीय समुदायों की सहमति और पारदर्शिता की कमी निवेश को रोक रही है।
हाइड्रोपावर में निवेश की संभावनाएं स्पष्ट हैं। विशेष रूप से पंप्ड स्टोरेज और बड़े हाइड्रो में। नीति समर्थन, दीर्घकालिक टैरिफ मॉडल और वित्तीय सहायता इसे आकर्षक बना रहे हैं। इसकी सफलता के लिए कुछ बातें आवश्यक है।
निवेशक, नीति निर्माता और स्थानीय हितधारकों के बीच सहयोग से हाइड्रोपावर न केवल ऊर्जा सुरक्षा में योगदान दे सकता है, बल्कि ग्रामीण विकास, रोजगार और जल-प्रबंधन में भी सहायक सिद्ध हो सकता है।
Updated on:
22 Aug 2026 07:55 pm
Published on:
22 Aug 2026 07:55 pm
