
गांधी जी की भूख हड़तालें केवल विरोध का माध्यम नहीं थीं, बल्कि नैतिक राजनीति की मिसाल थीं। महात्मा गांधी की भूख हड़तालों की कहानी हमें याद दिलाती है कि संघर्ष का नैतिक पक्ष किस प्रकार राजनीति और समाज को बदल सकता है। गांधी जी ने भूख हड़ताल को सत्याग्रह का एक अहिंसक हथियार बनाया। इस सत्याग्रह ने न केवल तत्कालीन सत्ता को झुकाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए नैतिक राजनीति की राह भी खोली। गांधी जी ने दिखाया कि जब सत्ता नैतिक दबाव में आती है, तो बदलाव संभव होता है। जब राजनीतिक संवाद में नैतिकता और जनहित की कमी महसूस होती है, तब गांधी जी की भूख हड़तालें याद आती हैं।
साल 1918 में अहमदाबाद के मिल मजदूरों को प्लेग बोनस के रूप में अतिरिक्त वेतन मिल रहा था, लेकिन मालिकों ने जनवरी में यह बोनस अचानक बंद कर दिया। मजदूरों ने विरोध स्वरूप हड़ताल शुरू की। गांधी जी ने इस आंदोलन का समर्थन करते हुए पहली बार भूख हड़ताल की। उन्होंने वचन दिया कि जब तक मजदूरों को पर्याप्त वेतन नहीं मिल जाता, तब तक वे कुछ नहीं खाएंगे। इस नैतिक दबाव के चलते कंपनी मालिकों ने 35% बोनस देने का निर्णय लिया और काम के घंटे भी कम किए गए। यह सत्याग्रह गांधी जी का दूसरा सफल आंदोलन था और पहली भूख हड़ताल का प्रतीक बन गया।
अगस्त 1932 में ब्रिटिश सरकार ने कम्युनल अवॉर्ड की घोषणा की, जिसमें अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित किए गए थे। गांधी जी ने इस विभाजनकारी कदम को अस्वीकार करते हुए यरवड़ा जेल में 20 सितंबर से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। यह अनशन 24 सितंबर को पूना पैक्ट के हस्ताक्षर के बाद समाप्त हुआ, जिसमें अनुसूचित जातियों के लिए सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी।
विभाजन के बाद कलकत्ता में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। गांधी जी ने 1 सितंबर 1947 की रात 8:15 बजे उपवास शुरू किया और 4 सितंबर की रात 9:15 बजे मीठे नींबू पानी से इसे समाप्त किया। इस दौरान हिंसा में कमी आई और स्थानीय नेताओं ने शांति बनाए रखने का वचन दिया।
जनवरी 1948 में दिल्ली में बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा के बीच गांधी जी ने 13 से 18 जनवरी तक 123 घंटे का उपवास रखा। उन्होंने मुसलमानों के पुनर्वास, मस्जिदों की वापसी और सभी समुदायों के बीच मेल-मिलाप की शर्तों पर जोर दिया। अंततः सात बिंदुओं वाले लिखित आश्वासन मिलने पर उन्होंने उपवास तोड़ा।
इन भूख हड़तालों ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को बदलने के साथ-साथ नैतिक राजनीति की परंपरा को भी मजबूत किया। 1918 की भूख हड़ताल ने मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई में अहिंसा की शक्ति दिखाई। 1932 का उपवास सामाजिक विभाजन के खिलाफ एकजुटता का संदेश था। 1947 और 1948 के उपवासों ने विभाजन और हिंसा के दौर में शांति और सहिष्णुता का मार्ग प्रशस्त किया।
गांधी जी की भूख हड़तालें आज भी राजनीतिक नैतिकता का प्रतीक हैं। हाल के वर्षों में सोनम वांगचुक जैसे कार्यकर्ताओं ने भूख हड़ताल को नैतिक दबाव के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे सरकारों को जवाबदेह होना पड़ा। यह दिखाता है कि भूख हड़ताल आज भी जनमत को प्रभावित करने और सत्ता को नैतिक रूप से चुनौती देने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है।