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क्या 2027 में मायावती कर पाएंगी वापसी? BSP का वोट, जाटव समीकरण और त्रिकोणीय मुकाबले का पूरा गणित

Mayawati BSP Politics : जानिए बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती की राजनीति में वापसी की राह कितनी मुश्किल है और उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में उनकी उपस्थिति विपक्ष के लिए क्यों महत्वपूर्ण है।
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Aug 23, 2026
Mayawati BSP Politics
Mayawati BSP Politics : क्या मायवती कर पाएंगी अपने कोर वोटर की वापसी, PC- Chatgpt

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी बहुजन समाज पार्टी यानी BSP ऐसी ताकत थी, जिसके बिना चुनावी गणित पूरा करना मुश्किल माना जाता था। 2007 में मायावती ने अकेले दम पर बहुमत हासिल किया था। BSP को 206 सीटें और करीब 30.43% वोट मिले थे। लेकिन इसके बाद पार्टी का राजनीतिक आधार लगातार सिकुड़ता गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में BSP सिर्फ एक सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर 12.88% रह गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी यूपी की 80 में से एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसका वोट शेयर करीब 9.39% रह गया।

अब 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मायावती के सामने सवाल सिर्फ सत्ता में वापसी का नहीं है। असली सवाल है-क्या BSP फिर इतनी ताकत हासिल कर सकती है कि BJP और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला त्रिकोणीय हो जाए? यही वजह है कि मायावती की वापसी विपक्ष के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

BSP का वोट प्रतिशत क्यों महत्वपूर्ण है?

BSP के कमजोर होने का मतलब सिर्फ एक पार्टी का कमजोर होना नहीं है। इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश के पूरे चुनावी समीकरण पर पड़ता है। 2017 में BSP को 22.23% वोट और 19 सीटें मिली थीं। 2022 में वोट शेयर घटकर 12.88% और सीट सिर्फ एक रह गई। 2024 लोकसभा चुनाव में यह और घटकर 9.39% हो गया।

चुनाव BSP का वोट शेयर सीटें

  • 2007 विधानसभा 30.43% 206
  • 2017 विधानसभा 22.23% 19
  • 2022 विधानसभा 12.88% 1
  • 2024 लोकसभा 9.39% 0

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 9-13% वोट भी उत्तर प्रदेश जैसे करीबी मुकाबलों वाले राज्य में बहुत बड़ा वोट बैंक है। अगर यह वोट किसी एक पार्टी के साथ चला जाए तो कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। अगर यह वोट अलग-अलग दलों के बीच बंटा रहे तो उसका प्रभाव अलग होगा।

जाटव वोट ही BSP की असली ताकत क्यों है?

मायावती की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी अब भी जाटव वोट है। उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 21% है और जाटव समुदाय BSP का पारंपरिक कोर वोट माना जाता है। लेकिन 2024 में यह आधार भी पहले जैसा एकजुट नहीं रहा।

Lokniti-CSDS के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक 2024 लोकसभा चुनाव में करीब 44% जाटव वोट BSP के साथ गया, जबकि 2019 में BSP को जाटव वोट का लगभग 75% समर्थन मिला था। इसी विश्लेषण में NDA को 2024 में करीब 24% जाटव वोट मिलने का अनुमान दिया गया।

यानी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि BSP के पास अभी भी जाटव समर्थन है, लेकिन उसका एक बड़ा हिस्सा दूसरी पार्टियों की ओर जा चुका है। यही मायावती की वापसी का पहला रास्ता है, अपने पुराने कोर वोट को फिर से मजबूत करना।

गैर-जाटव दलित वोट भी उतना ही जरूरी

सिर्फ जाटव वोट वापस लाना BSP के लिए पर्याप्त नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में पासी, वाल्मीकि, कोरी और दूसरी दलित जातियां भी महत्वपूर्ण हैं। पिछले कुछ चुनावों में BJP ने गैर-जाटव दलित समूहों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है।

2024 में यह समीकरण बदला। Lokniti-CSDS के विश्लेषण के मुताबिक NDA का गैर-जाटव दलित वोट 2019 के लगभग 48% से घटकर 2024 में करीब 29% रह गया। इसका फायदा INDIA गठबंधन को मिला।

  • यानी दलित वोट अब पूरी तरह एकतरफा नहीं है।
  • BSP के सामने चुनौती है कि वह जाटव + गैर-जाटव दलित दोनों के बीच फिर से अपना प्रभाव बनाए।
  • त्रिकोणीय मुकाबले में BSP इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
  • यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।

मान लीजिए किसी विधानसभा सीट पर मुकाबला है-

BJP – 38%
SP – 36%
BSP – 12%

यहां BSP चुनाव नहीं जीतती, लेकिन उसके 12% वोट परिणाम तय करने की स्थिति में हो सकते हैं। अगर BSP का बड़ा हिस्सा SP के साथ चला जाए तो SP जीत सकती है। अगर वही वोट BJP की ओर खिसक जाए तो BJP को फायदा हो सकता है। और अगर BSP अपना वोट बैंक अपने पास रखती है तो मुकाबला तीन तरफा हो सकता है। इसलिए BSP की ताकत सिर्फ कितनी सीटें जीतीं से नहीं मापी जा सकती। कई सीटों पर सवाल यह होगा-

BSP ने कितने वोट लिए और उन वोटों ने किसे हराया या जिताया? : 2024 में BSP कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसने 9.39% वोट हासिल किए। इसका अर्थ है कि पार्टी पूरी तरह चुनावी मैदान से बाहर नहीं हुई है।

लेकिन मायावती के लिए वापसी इतनी मुश्किल क्यों है? : सबसे बड़ी समस्या है लगातार कमजोर होता संगठन और वोट ट्रांसफर की क्षमता। 2007 की BSP सिर्फ मायावती का चेहरा नहीं थी। उसके पीछे कांशीराम की बनाई कैडर आधारित राजनीतिक मशीनरी और ‘बहुजन’ सामाजिक गठबंधन था। आज BSP को फिर बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करना होगा। दूसरी समस्या है नए दलित नेतृत्व का उभरना।

चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता दलित राजनीति में अलग जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ BJP गैर-जाटव दलितों के बीच अपना आधार बनाए रखने की कोशिश कर रही है और SP ने PDA के जरिए दलितों को अपने साथ जोड़ने का अभियान तेज किया है।

इसका मतलब है कि 2027 में मायावती को सिर्फ BJP से नहीं, बल्कि दलित वोट के भीतर कई दावेदारों से मुकाबला करना होगा।

क्या मायावती फिर 2007 वाला फॉर्मूला दोहरा सकती हैं?

मायावती खुद 2027 के लिए 2007 की तरह ‘सर्वजन’ सोशल इंजीनियरिंग की ओर संकेत कर रही हैं। 2026 में उन्होंने कई बार ब्राह्मणों तक पहुंच बनाने की कोशिश की है और 2007 के दलित-ब्राह्मण गठबंधन को दोहराने की बात की है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा को भी चुनावी तैयारियों में महत्वपूर्ण भूमिका दी है।

2007 में BSP ने दलित आधार के साथ ब्राह्मण और दूसरे सवर्ण समूहों को जोड़कर ऐसा सामाजिक गठबंधन बनाया था, जिसने उसे पूर्ण बहुमत दिया। लेकिन 2027 में वही फॉर्मूला दोहराना आसान नहीं होगा।

क्योंकि आज BJP का सामाजिक आधार पहले से ज्यादा व्यापक है और SP भी गैर-यादव OBC तथा दलित वोटों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है।

विपक्ष के लिए मायावती की वापसी क्यों जरूरी है?

यह सवाल राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। अगर BSP कमजोर रहती है और उसके जाटव व दूसरे दलित वोटों का बड़ा हिस्सा SP-कांग्रेस गठबंधन की तरफ चला जाता है, तो विपक्ष का मुकाबला BJP से सीधे मजबूत हो सकता है। लेकिन, अगर BSP अपना वोट बैंक वापस खड़ा कर लेती है तो कई सीटों पर तीन तरफा मुकाबला बन सकता है। यह विपक्ष के लिए दोधारी तलवार है।

  • एक तरफ: BSP मजबूत हुई तो BJP विरोधी वोट बंट सकता है।
  • दूसरी तरफ: BSP का मजबूत होना BJP के लिए भी मुश्किल पैदा कर सकता है, क्योंकि दलित वोटों में BJP और BSP के बीच सीधा मुकाबला बढ़ेगा।

इसलिए विपक्ष के लिए आदर्श स्थिति सिर्फ BSP की वापसी नहीं, बल्कि BSP के वोट का BJP के खिलाफ किस दिशा में जाना है, यह भी महत्वपूर्ण है।

2027 में मायावती के सामने चार बड़ी चुनौतियां

  • जाटव वोट वापस लाना BSP का सबसे मजबूत पारंपरिक आधार
  • गैर-जाटव दलितों में पकड़ दलित वोट को व्यापक बनाना जरूरी
  • OBC और सवर्ण वोट जोड़ना सिर्फ दलित वोट से बहुमत मुश्किल
  • संगठन मजबूत करना वोट को सीट में बदलने के लिए बूथ स्तर की मशीनरी जरूरी

तो क्या मायावती की वापसी संभव है?

संभव है, लेकिन आसान नहीं। BSP को पहले अपना पुराना कोर वोट बचाना होगा। इसके बाद गैर-जाटव दलितों में वापसी करनी होगी। फिर OBC और सवर्ण समूहों में ऐसा सामाजिक गठबंधन बनाना होगा जो 2007 की तरह व्यापक हो।

2026 में पार्टी ने 2027 की तैयारी तेज कर दी है। उम्मीदवार चयन, संगठन मजबूत करने और ‘सर्वजन’ तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

लेकिन मायावती के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि क्या BSP 10% के आसपास के वोट शेयर से वापस 20% से ऊपर पहुंच सकती है?

क्योंकि उत्तर प्रदेश में 10% वोट वाली पार्टी भी परिणाम बदल सकती है, लेकिन 20%+ वोट वाली BSP चुनाव की पूरी धुरी बदल सकती है।

यही कारण है कि मायावती की वापसी सिर्फ BSP की कहानी नहीं है। यह 2027 में BJP बनाम SP के मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने वाली सबसे बड़ी संभावित ताकतों में से एक है।

और आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या मायावती अपने पुराने जाटव आधार को फिर से एकजुट कर पाएंगी और उसके ऊपर नया ‘सर्वजन’ गठबंधन खड़ा कर पाएंगी? अगर जवाब हां है, तो 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव दो दलों की लड़ाई नहीं, बल्कि एक बार फिर तीन बड़े सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवों का मुकाबला बन सकता है।

Updated on:
23 Aug 2026 04:41 pm
Published on:
23 Aug 2026 04:41 pm