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नेपाल की तबाही ने बढ़ाई भारत की चिंता: हिमालय में बन रहा ‘वाटर बम’, भारत की 30 लाख की आबादी पर संकट?

जलवायु परिवर्तन के असर से हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बन रही सैकड़ों ग्लेशियल झीलें कभी भी तबाही ला सकती हैं। हिमालय में खतरे की सबसे बड़ी वजह ग्लेशियरों का पीछे हटना और उसकी जगह नई झीलों का बनना है।
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Aug 30, 2026
Melting glaciers risk for floods
सांकेतिक इमेज (सोर्स-chatgpt)

नेपाल और तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ में अब तक 675 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इसके साथ ही करीब 2,400 लोग लापता हैं। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों के आसपास राहत-बचाव अभियान अभी भी जारी है। यह तबाही अकेली घटना नहीं है।

नेपाल की इस घटना से पहले उत्तराखंड में केदारनाथ (2013) और चमोली (2021) तथा सिक्किम में साउथ ल्होनक झील (2023) की आपदाएं भी लगभग एक जैसे पैटर्न पर हुई थीं। ऊंचाई पर बनी ग्लेशियल झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूटा और नीचे बसी आबादी तबाह हो गई। विशेषज्ञों के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बन रही सैकड़ों ग्लेशियर झीलें कभी भी ऐसी तबाही ला सकती हैं।

क्यों बढ़ रहा है खतरा?

हिमालय में खतरे की सबसे बड़ी वजह ग्लेशियरों का पीछे हटना और उनकी जगह नई झीलों का बनना है। ये झीलें बर्फ, चट्टान और मलबे से बने कमजोर प्राकृतिक बांधों के पीछे रुकी होती हैं। तेज बारिश, बादल फटना, भूस्खलन, हिमस्खलन या ग्लेशियर का कोई बड़ा हिस्सा टूटकर झील में गिरने से यह बांध टूट सकता है। ऐसी स्थिति में पानी के साथ भारी मलबा तेज रफ्तार से नीचे की घाटियों में उतर आता है। इसी को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी 'ग्लोफ' कहा जाता है।

केंद्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों और अन्य जलनिकायों के कुल क्षेत्रफल में हाल के वर्षों में करीब 10.81 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। भारत में 67 झीलें ऐसी चिन्हित की गईं, जिनके सतही क्षेत्रफल में 40 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी हुई। इन्हें ग्लोफ के लिहाज से उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। सबसे अधिक विस्तार लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में देखा गया।

वहीं, देहरादून के वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान समेत कई संस्थानों के हालिया आकलनों के मुताबिक पूरे हिमालय में इस समय करीब 8,300 से 9,300 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जिनमें से 1,000 से ज्यादा नई झीलें 1990 के बाद बनी हैं। अलग-अलग अध्ययनों में पुरानी झीलों के क्षेत्रफल में भी 17 से 76 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। नई झीलों का बनना और पुरानी झीलों का फैलाव खासतौर पर नेपाल, सिक्किम, भूटान और एवरेस्ट क्षेत्र में सबसे ज्यादा देखा गया है। यही इलाके गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों के उद्गम क्षेत्र भी हैं।

दुनिया में करोड़ों लोगों पर जोखिम

'नेचर कम्युनिकेशंस' पत्रिका में प्रकाशित न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक दुनियाभर में करीब 1.5 करोड़ लोग संभावित 'ग्लोफ' के असर वाले क्षेत्र में रहते हैं। इनमें से आधे से ज्यादा भारत, पाकिस्तान, पेरू और चीन में बसे हैं। हाई माउंटेन एशिया क्षेत्र में सबसे ज्यादा करीब 93 लाख लोग जोखिम में हैं।

हाल ही में IIT रुड़की के एक अध्ययन में भी अनुमान लगाया गया कि अकेले भारत में करीब 30 लाख लोग ऐसी झीलों के ठीक नीचे वाले इलाकों में रहते हैं। हालांकि, विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि इन सभी पर तत्काल खतरा है। यह उस अनुमानित आबादी का आंकड़ा है जो किसी झील के टूटने पर बनने वाली बाढ़ के प्रभाव-क्षेत्र में आ सकती है।

भारत और उत्तराखंड की तस्वीर

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने पूरे भारतीय हिमालय में अब तक 28,043 छोटी-बड़ी हिमनद झीलें चिन्हित की हैं। उत्तराखंड की बात करें तो वाडिया संस्थान के ताजा अध्ययन के अनुसार, राज्य में हिमनद झीलों की संख्या 2013 के 1,266 से बढ़कर 2025 में 1,290 हो गई, जबकि इनका कुल क्षेत्रफल इस दौरान करीब 8.1 प्रतिशत बढ़ा।

इसके अलावा वैज्ञानिक शोध पत्रिका 'नेचुरल हैजर्ड्स' में प्रकाशित एक अलग अध्ययन में सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर उत्तराखंड की 1,000 वर्ग मीटर से बड़ी 426 हिमनद झीलों का विश्लेषण किया गया। जिनमें से 25 झीलें 'संभावित रूप से खतरनाक' पाई गईं। इनमें 6 झीलें सबसे ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी (A), 6 मध्यम जोखिम वाली श्रेणी (B) और 13 अपेक्षाकृत कम जोखिम वाली श्रेणी (C) में रखी गईं। अलकनंदा और धौलीगंगा घाटियां इस लिहाज से सबसे संवेदनशील पाई गईं।

भविष्य के लिए सबक और तैयारी

केदारनाथ (2013) में चोराबाड़ी झील के टूटने और भारी बारिश से आई बाढ़ में हजारों लोगों की जान गई थी। चमोली (2021) में ऋषिगंगा बेसिन में हिमस्खलन के बाद आई बाढ़ ने तपोवन-विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना को तबाह कर 200 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। सिक्किम (2023) में साउथ ल्होनक झील के फटने से 77 से अधिक लोग मारे गए थे।

इन घटनाओं के बाद अब उत्तराखंड में भी वाडिया संस्थान को सबसे संवेदनशील झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि, सैटेलाइट कम्युनिकेशन जैसी तकनीकी चुनौतियां अभी बाकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के लगातार पीछे हटने के बीच इन झीलों के आकार, स्थिरता और आसपास बढ़ती मानव बस्तियों पर सतत निगरानी बेहद जरूरी हो गई है।

Updated on:
30 Aug 2026 05:47 pm
Published on:
30 Aug 2026 05:47 pm