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पैरों का मामूली दर्द बन सकता है जानलेवा ‘साइलेंट किलर’, जानें ब्लड क्लॉट के शुरुआती संकेत और बचाव

लोग अक्सर पैरों में होने वाले दर्द को थकान, मोच या मांसपेशियों की खिंचाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। क्या आपको पता है कि पैरों में मामूली दर्द की समस्या आपके लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है?
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भारत

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Vinay Shakya

Aug 30, 2026

blood clot disease symptoms

सांकेतिक इमेज (सोर्स-gemini)

पैरों में दर्द को अक्सर लोग थकान, मोच या मांसपेशियों की खिंचाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कई बार यह मामूली-सा दिखने वाला दर्द शरीर की गहरी नसों में बन रहे खून के थक्के यानी ब्लड क्लॉट का शुरुआती संकेत हो सकता है, जो समय रहते पहचान न होने पर जानलेवा साबित हो सकता है।

मेयो क्लीनिक के मुताबिक, अगर पैर की गहरी नस में बना यह थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह पल्मोनरी एम्बोलिज्म नाम की जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है। यही वजह है कि डॉक्टर बार-बार यह चेतावनी देते हैं कि पैरों के अनजाने दर्द या सूजन को हल्के में न लें।

ब्लड क्लॉट यानी डीवीटी क्या है?


मेडिकल की भाषा में ब्लड क्लॉट को डीप वेन थ्रोम्बोसिस (डीवीटी) कहा जाता है। यह तब होता है, जब शरीर की गहरी नसों में आमतौर पर पैरों में, खून का थक्का जम जाता है। अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के अनुसार, जब यह थक्का पैर की नस से टूटकर खून के बहाव के साथ फेफड़ों में पहुंच जाता है और वहां किसी रक्तवाहिनी को अवरुद्ध कर देता है तो इस स्थिति को पल्मोनरी एम्बोलिज्म कहते हैं।

डीवीटी और पीई को मिलाकर वेनस थ्रोम्बोएम्बोलिज्म (वीटीई) कहा जाता है। अंतरराष्ट्रीय सोसाइटी ऑन थ्रोम्बोसिस एंड हीमोस्टेसिस के मुताबिक दुनियाभर में हर साल अस्पताल से जुड़े करीब एक करोड़ वीटीई मामले सामने आते हैं। दुनिया में होने वाली हर 4 मौतों में से एक के पीछे थ्रोम्बोसिस से जुड़ी वजह जिम्मेदार होती है। अकेले अमेरिका में हर साल करीब 3.5 लाख से 9 लाख लोगों में नया ब्लड क्लॉट बनता है, जिनमें से 60 हजार से 1 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यह आंकड़ा वहां स्तन कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर के नए मामलों से भी ज्यादा है।

शुरुआती संकेत क्या हैं?


डॉक्टरों के मुताबिक, डीवीटी के सबसे आम लक्षणों में एक पैर में अचानक सूजन आना, पिंडली या जांघ में दर्द जो अक्सर ऐंठन या खिंचाव जैसा महसूस होता है। प्रभावित हिस्से में गर्माहट और छूने पर दर्द, तथा त्वचा का रंग लाल या नीला पड़ना शामिल हैं। कई बार पैर की सतही नसें भी उभरी हुई दिखाई दे सकती हैं।

अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की स्टेटपर्ल्स रिपोर्ट के अनुसार, डीवीटी के करीब आधे मामलों में शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण नजर ही नहीं आता है। इसलिए जोखिम वाले लोगों को खासतौर पर सतर्क रहने की सलाह दी जाती है। असली खतरा तब बढ़ जाता है जब थक्का फेफड़ों तक पहुंच जाए।

ऐसी स्थिति में अचानक सांस फूलना, सांस लेने या खांसने पर सीने में दर्द, दिल की धड़कन तेज होना, चक्कर आना या बेहोशी और खांसी में खून आना जैसे लक्षण दिख सकते हैं। सीडीसी और मेयो क्लीनिक दोनों ही इन लक्षणों को मेडिकल इमरजेंसी मानते हुए तुरंत डॉक्टर के पास जाने की सलाह देते हैं।

किन लोगों को ज्यादा खतरा?


लंबी हवाई या सड़क यात्रा के दौरान घंटों एक ही मुद्रा में बैठे रहना, सर्जरी या बीमारी के बाद लंबे समय तक बिस्तर पर रहना, गर्भावस्था और डिलीवरी के बाद का समय, हार्मोन थेरेपी या गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन, धूम्रपान, मोटापा, कैंसर, बढ़ती उम्र और थक्का जमने से जुड़ा पारिवारिक इतिहास, ये सभी डीवीटी के जाने-पहचाने जोखिम कारक हैं। सीडीसी के मुताबिक, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में ब्लड क्लॉट का खतरा सामान्य से पांच गुना ज्यादा हो जाता है।

इलाज और बचाव के तरीके


डॉक्टरों के अनुसार, डीवीटी के इलाज का मुख्य मकसद थक्के को बढ़ने से रोकना, नए थक्के बनने से बचाना और उसे फेफड़ों तक पहुंचने से रोकना है। इसके लिए सबसे पहले खून पतला करने वाली दवाएं यानी एंटीकोआगुलेंट दी जाती हैं। ज्यादा गंभीर मामलों में थक्का घोलने वाली थ्रोम्बोलाइटिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है, हालांकि इनसे अचानक रक्तस्राव का खतरा भी रहता है। इसलिए डॉक्टर इन्हें आमतौर पर आपातकालीन स्थिति में ही देते हैं।

जिन मरीजों को खून पतला करने वाली दवाएं नहीं दी जा सकतीं, उनमें पेट की बड़ी नस में एक फिल्टर (आईवीसी फिल्टर) लगाया जा सकता है ताकि थक्का फेफड़ों तक न पहुंच पाए। इसके अलावा कंप्रेशन स्टॉकिंग्स भी सूजन और दर्द कम करने के साथ नए थक्के बनने से रोकने में मददगार मानी जाती हैं।

समस्या से बचाव के लिए डॉक्टर नियमित रूप से चलने-फिरने और पैरों की एक्सरसाइज को सबसे कारगर उपाय बताते हैं। लंबी यात्रा के दौरान हर एक-दो घंटे में उठकर टहलना, बैठे-बैठे पैरों को स्ट्रेच करना और पैर हिलाते रहना, सर्जरी के बाद डॉक्टर की सलाह पर जल्द से जल्द चलना शुरू करना, धूम्रपान छोड़ना और वजन नियंत्रित रखना जैसे सामान्य कदम इस जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। जिन लोगों को ज्यादा दिक्कत है, उन्हें डॉक्टर की सलाह पर कंप्रेशन स्टॉकिंग्स या निवारक दवाएं भी दी जा सकती हैं।

डॉक्टरों की सलाह

डॉक्टरों का कहना है कि अगर किसी एक पैर में बिना किसी वजह के सूजन, दर्द, गर्माहट या रंग में बदलाव दिखे तो इसे नजरअंदाज न करें। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। समय पर रोग की पहचान और इलाज से डीवीटी जैसी स्थिति को सुरक्षित रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।