
अंटार्कटिका की बर्फ़ीली दुनिया से जलवायु परिवर्तन को लेकर एक और चिंताजनक ख़बर सामने आई है। पश्चिमी अंटार्कटिका का विशाल थ्वाइट्स ग्लेशियर, जिसे 'डूम्सडे ग्लेशियर' कहा जाता है। यह ग्लेशियर वैज्ञानिकों के पुराने अनुमानों से अधिक अस्थिर साबित हो रहा है।
नए शोध के अनुसार, इस ग्लेशियर में हो रहे बदलावों से वर्ष 2100 तक वैश्विक औसत समुद्री जलस्तर करीब 3 सेंटीमीटर बढ़ सकता है। यह अनुमान पिछले कुछ मॉडल अनुमानों से लगभग दोगुना है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियर के नीचे समुद्री पानी की आवाजाही उसकी स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन रही है।
वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर कम्युनिकेशंस' में 12 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अध्ययन में थ्वाइट्स ग्लेशियर के भविष्य का नया आकलन किया गया है। कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन और अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की जेट प्रोपल्शन प्रयोगशाला से जुड़े वैज्ञानिकों ने उपग्रह आंकड़ों और कंप्यूटर मॉडल की मदद से पिछले लगभग 3 दशकों में ग्लेशियर के बदलावों का विश्लेषण किया। शोध के मुताबिक, समुद्र के संपर्क में आने वाले बर्फ़ के निचले हिस्से की प्रक्रियाओं को शामिल करने से भविष्य में बर्फ़ के नुक़सान का अधिक सटीक अनुमान मिलता है।
थ्वाइट्स ग्लेशियर का आकार लगभग अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के बराबर है। यह पश्चिमी अंटार्कटिका की हिमचादर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि इसकी पूरी बर्फ़ पिघल जाए तो वैश्विक समुद्री जलस्तर लगभग 65 सेंटीमीटर बढ़ने के बराबर पानी निकल सकता है। हालांकि यह एक दीर्घकालिक सैद्धांतिक संभावना है, मौजूदा सदी के लिए ऐसा अनुमान नहीं लगाया गया है। ग्लेशियर के पीछे हटने से आसपास की बर्फ़ की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है।
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ग्लेशियर के नीचे मौजूद 'ग्राउंडिंग ज़ोन' है। यह वह क्षेत्र है, जहां ज़मीन पर टिकी बर्फ़ समुद्र में तैरने वाली बर्फ़ में बदलती है। पहले कई वैज्ञानिक मॉडल इस क्षेत्र को एक सीमित रेखा मानकर चलते थे। नए शोध में पाया गया कि ज्वार-भाटा के दौरान अपेक्षाकृत गर्म समुद्री पानी कई किलोमीटर भीतर तक प्रवेश कर सकता है। इससे नीचे की बर्फ़ पिघलती है और ग्लेशियर की पकड़ कमज़ोर होती जाती है।
थ्वाइट्स ग्लेशियर का एक हिस्सा समुद्र तल के नीचे मौजूद मौगिनोट रिज नामक चट्टानी उभार के सहारे टिका हुआ है। यह प्राकृतिक अवरोध बर्फ़ के पीछे हटने की गति को सीमित करता है। अध्ययन के अनुसार, यदि ग्राउंडिंग ज़ोन का विस्तार 5 से 6 किलोमीटर तक रहता है, तो वर्ष 2100 तक ग्लेशियर के इस सहारे से अलग होने की संभावना लगभग 60 प्रतिशत हो सकती है। कुछ मॉडल परिस्थितियों में यह बदलाव 2038 से भी शुरू हो सकता है। हालांकि यह संभावित परिदृश्य है, तय समयसीमा नहीं।
वैज्ञानिकों ने पाया कि वर्ष 1996 से ग्लेशियर के पश्चिमी हिस्से की ग्राउंडिंग लाइन लगभग 25 किलोमीटर पीछे खिसक चुकी है। मार्च 2026 में 'जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स' में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार, थ्वाइट्स से बर्फ़ के नुक़सान की दर 1990 के दशक की तुलना में पांच गुने से अधिक हो गई है। शोधकर्ताओं ने आशंका जताई है कि आने वाले दशकों में बर्फ़ का नुक़सान और बढ़ सकता है।
विज्ञान समाचार वेबसाइट 'फ़िज़ डॉट ऑर्ग' की 13 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, शोधकर्ता एरिक रिग्नोट ने चेताया कि ग्लेशियर के निचले हिस्से में होने वाले पिघलाव को पुराने मॉडल पर्याप्त रूप से नहीं समझ पा रहे थे। नए निष्कर्ष तटीय बाढ़ के ख़तरे का बेहतर आकलन करने की आवश्यकता बताते हैं।
समुद्री जलस्तर बढ़ने से भारत सहित दुनियाभर के निचले तटीय क्षेत्रों में बाढ़, कटाव और खारे पानी के प्रवेश जैसी समस्याएं गंभीर हो सकती हैं। हालांकि किसी विशेष शहर में कितना जलस्तर बढ़ेगा, इसका आकलन अलग स्थानीय आंकड़ों से करना होगा।
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे ने 13 अक्टूबर 2026 को जारी एक अलग अध्ययन में चेताया कि समुद्र के अत्यधिक ठंडा होने की काल्पनिक परिस्थितियों में भी थ्वाइट्स ग्लेशियर अगले कम से कम 150 वर्षों तक बर्फ़ खोता रह सकता है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ बदलाव लंबे समय तक जारी रह सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, वैश्विक तापमान वृद्धि रोकने के प्रयासों के साथ तटीय सुरक्षा और समुद्री जलस्तर की निगरानी को भी प्राथमिकता देनी होगी।