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MSP पर सरकार कितना पैसा खर्च कर रही है और किसान तक कितना पहुंच रहा है?

PM AASHA Scheme MSP Outlay : सरकार MSP और PM-AASHA योजना के तहत कितना पैसा खर्च कर रही है? जानें धान, गेहूं, दालों और तिलहन की सरकारी खरीद, राज्यों की स्थिति और किसानों को MSP से कम दाम मिलने की असली वजहें।
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Aug 24, 2026
PM AASHA Scheme MSP Outlay
PM AASHA Scheme MSP Outlay : कैसे मिलती है किसानों को MSP, PC-Chatgpt

किसान को उसकी फसल की लागत से कम कीमत न मिले, इसके लिए सरकार हर साल कई फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP तय करती है। लेकिन सिर्फ MSP घोषित कर देने से किसान को वह कीमत मिलना तय नहीं होता। असली सवाल यह है कि सरकार कितनी फसल खरीदती है, किन किसानों से खरीदती है और बाकी किसान अपनी उपज किस कीमत पर बेचते हैं।

इसी अंतर को कम करने के लिए सरकार प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान यानी PM-AASHA के जरिए दाल, तिलहन और खोपरा जैसी फसलों की कीमत को सहारा देती है। 2026-27 के बजट में PM-AASHA के लिए ₹7,200 करोड़ रखे गए हैं। 2024-25 में इस योजना पर वास्तविक खर्च ₹5,437.99 करोड़ था, जबकि 2025-26 में बजट बढ़कर ₹6,941.36 करोड़ हुआ था।

लेकिन यह समझना जरूरी है कि ₹7,200 करोड़ पूरे देश में MSP पर खरीदी गई हर फसल का कुल सरकारी खर्च नहीं है। गेहूं और धान की सरकारी खरीद अलग व्यवस्था के तहत बहुत बड़े पैमाने पर होती है। PM-AASHA मुख्य रूप से दाल, तिलहन और खोपरा की कीमत को सहारा देने के लिए है।

MSP और किसान को मिलने वाली कीमत में अंतर क्यों?

MSP सरकार द्वारा घोषित वह कीमत है जिस पर सरकार जरूरत पड़ने पर निर्धारित फसल और गुणवत्ता की उपज खरीद सकती है। लेकिन MSP कोई ऐसी कीमत नहीं है जिस पर हर किसान को अपनी पूरी फसल बेचने की कानूनी गारंटी मिल जाए।

PM-AASHA के तहत Price Support Scheme यानी PSS में सरकार तभी खरीद शुरू करती है जब संबंधित फसल का बाजार भाव MSP से नीचे चला जाए। किसान का पंजीकरण होना, फसल का निर्धारित गुणवत्ता मानक यानी FAQ पूरा करना और खरीद की अवधि के भीतर उपज लाना भी जरूरी होता है।

यहीं सबसे बड़ा अंतर पैदा होता है। अगर सरकारी खरीद केंद्र किसान के गांव या मंडी के पास नहीं है, खरीद की सीमा खत्म हो चुकी है, पंजीकरण नहीं हुआ है या किसान को तुरंत नकदी चाहिए, तो वह व्यापारी को कम कीमत पर फसल बेच सकता है। यानी MSP घोषित है, लेकिन हर किसान को हर किलो उपज पर MSP मिलना जरूरी नहीं है।

सरकार MSP पर कितना खरीद रही है?

दाल और तिलहन की सरकारी खरीद पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2009-14 के दौरान MSP पर दालों की खरीद केवल 1.52 लाख मीट्रिक टन थी, जो 2020-25 के दौरान बढ़कर 82.98 लाख मीट्रिक टन हो गई। यानी करीब 7,350% की वृद्धि। इसी अवधि में तिलहनों की MSP खरीद में भी 1,500% से ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई।

सोयाबीन इसका बड़ा उदाहरण है। 2024-25 में छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और तेलंगाना में सरकार ने MSP पर सोयाबीन खरीद की। 9 फरवरी 2025 तक 19.99 लाख मीट्रिक टन सोयाबीन खरीदा गया था, जिससे 8.46 लाख किसानों को फायदा हुआ।

किन राज्यों में सबसे ज्यादा खरीद होती है?

दाल और तिलहन की सरकारी खरीद कुछ राज्यों में ज्यादा केंद्रित है। 2026 के रबी सीजन में चना खरीद के लिए महाराष्ट्र में 7.61 लाख टन, गुजरात में 4.13 लाख टन, मध्य प्रदेश में 5.80 लाख टन और राजस्थान में 5.53 लाख टन की मंजूरी दी गई।

सरसों में राजस्थान सबसे आगे रहा। वहां 13.79 लाख टन सरसों की MSP खरीद को मंजूरी दी गई, जबकि गुजरात के लिए 1.33 लाख टन का प्रावधान था।

उत्तर प्रदेश में भी दाल और तिलहन की बड़ी खरीद को मंजूरी दी गई। मार्च 2026 में करीब 14.31 लाख टन चना, मसूर और सरसों की खरीद के लिए लगभग ₹9,341 करोड़ का प्रावधान किया गया। हरियाणा में 3.73 लाख टन से ज्यादा चना और सरसों की खरीद को मंजूरी मिली। इससे साफ है कि सरकारी खरीद का फायदा कुछ प्रमुख उत्पादक राज्यों में ज्यादा दिखाई देता है।

दालों की खरीद में अब बड़ा बदलाव

दालों के मामले में सरकार ने खरीद को और मजबूत किया है। अक्टूबर 2025 में शुरू हुए Mission for Aatmanirbharta in Pulses के तहत 2030-31 तक दाल उत्पादन बढ़ाने के लिए ₹11,440 करोड़ का प्रावधान है।

इस मिशन में तूर, उड़द और मसूर की 100% खरीद का प्रावधान है। यानी इच्छुक किसानों से इन तीन दालों की निर्धारित शर्तों के अनुसार MSP पर खरीद का लक्ष्य रखा गया है। मार्च 2026 तक NAFED और NCCF के माध्यम से रबी सीजन में करीब 1.5 लाख दाल किसानों का पंजीकरण हो चुका था।

बिहार में 2026 में पहली बार संगठित मसूर खरीद शुरू हुई। 10 अगस्त 2026 तक NCCF और NAFED ने मिलकर हजारों टन मसूर खरीदी और सैकड़ों किसानों को भुगतान किया।

फिर भी किसान MSP से नीचे क्यों बेचता है?

यही MSP व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है।

पहला कारण- सरकारी खरीद हर जगह नहीं होती।
धान और गेहूं की तुलना में दाल और तिलहन की खरीद व्यवस्था अभी भी कम व्यापक है।

दूसरा-खरीद केंद्र और समय।
किसान को पंजीकरण, निर्धारित खरीद केंद्र और तय अवधि का इंतजार करना पड़ सकता है। छोटे किसान के लिए फसल को कई दिनों तक रोककर रखना आसान नहीं होता।

तीसरा-तुरंत पैसे की जरूरत।
कर्ज चुकाना हो, अगली फसल के लिए बीज-खाद खरीदना हो या घर का खर्च चलाना हो, तो किसान अक्सर तुरंत भुगतान करने वाले व्यापारी को कम कीमत पर फसल बेच देता है।

चौथा-गुणवत्ता की शर्त।
सरकारी खरीद निर्धारित FAQ गुणवत्ता के अनुसार होती है। नमी या गुणवत्ता तय मानक से अलग होने पर किसान को परेशानी हो सकती है।

MSP सिर्फ खरीद से नहीं, कीमत की कमी की भरपाई से भी जुड़ा है

PM-AASHA में केवल सरकारी खरीद ही नहीं है। Price Deficiency Payment Scheme यानी PDPS के तहत कुछ तिलहनों में अगर बाजार भाव MSP से कम रहता है तो पात्र पंजीकृत किसान को MSP और बिक्री/मॉडल कीमत के बीच के अंतर का भुगतान किया जा सकता है।

इस व्यवस्था में सरकार को हर फसल खरीदकर गोदाम में रखने की जरूरत नहीं पड़ती। किसान बाजार में बेचता है और निर्धारित शर्तों के तहत कीमत के अंतर की भरपाई की जाती है।

यही मॉडल आगे MSP व्यवस्था का दायरा बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि हर फसल की पूरी उपज खरीदना सरकार के लिए महंगा और भंडारण की दृष्टि से मुश्किल है।

क्या MSP बढ़ने से किसान की आय बढ़ रही है?

MSP में लगातार बढ़ोतरी हुई है। 2026-27 में तूर का MSP ₹8,450 प्रति क्विंटल, उड़द का ₹8,200 और मूंग का ₹8,780 है। मूंगफली ₹7,517 और सूरजमुखी बीज ₹8,343 प्रति क्विंटल है।

सरकार का दावा है कि MSP को उत्पादन लागत से कम से कम 50% ऊपर रखने की नीति के कारण किसानों को लागत पर बेहतर मार्जिन मिल रहा है। लेकिन किसान की वास्तविक आय केवल MSP से तय नहीं होती। उत्पादन कितना हुआ, बाजार में भाव क्या रहा, कितनी फसल MSP पर बिकी और खेती की वास्तविक लागत कितनी थी-इन सभी का असर पड़ता है।

असली चुनौती: MSP की घोषणा नहीं, पहुंच

सरकार MSP पर खर्च बढ़ा रही है और दाल-तिलहन की खरीद भी पहले से काफी बढ़ी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी यही है कि कितने किसान अपनी पूरी फसल MSP पर बेच पा रहे हैं।

आंकड़े बताते हैं कि सरकारी खरीद में तेजी आई है, लेकिन खरीद अभी भी कुछ फसलों और राज्यों में ज्यादा केंद्रित है। इसलिए छोटे और सीमांत किसान तक MSP का फायदा पहुंचाने के लिए ज्यादा खरीद केंद्र, आसान पंजीकरण, तेज भुगतान, बेहतर भंडारण और स्थानीय स्तर पर बाजार व्यवस्था जरूरी है।

सीधी भाषा में कहें तो MSP किसान के लिए सुरक्षा कवच है, लेकिन यह तभी काम करता है जब किसान उस कीमत तक पहुंच भी सके। सरकार का ₹7,200 करोड़ का PM-AASHA बजट इसी सुरक्षा कवच को मजबूत करने की कोशिश है। अब इसकी असली सफलता इस बात से मापी जाएगी कि सरकारी खरीद में कितने करोड़ रुपये खर्च हुए, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि कितने किसानों ने अपनी उपज वास्तव में MSP या उसके करीब की कीमत पर बेची।

Updated on:
24 Aug 2026 11:12 am
Published on:
24 Aug 2026 11:10 am