
सऊदी अरब पर हूती के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की बात करने वाले पाकिस्तान के सुर अब बदले नजर आ रहे हैं। इस्लामाबाद ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ पिछले महीने हुए मक्का पैक्ट को एक रक्षात्मक गठबंधन बताया है और फिलहाल इसमें किसी अन्य देश को शामिल करने या हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का कोई इरादा जाहिर नहीं किया।
पाकिस्तानी विदेश कार्यालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि समझौते का उद्देश्य सदस्य देशों की सुरक्षा और रक्षा सहयोग मजबूत करना है, लेकिन सैन्य कार्रवाई पर फिलहाल कोई चर्चा नहीं चल रही। सज्जाद हैदर खान ने कहा कि इस्लामाबाद सऊदी अरब के साथ रक्षा-सुरक्षा मामलों में समन्वय बनाए हुए है, मगर समझौते का क्रियान्वयन धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होगा।
सज्जाद हैदर खान ने दोहराया कि पाकिस्तान अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाएगा, लेकिन तत्काल जवाबी कार्रवाई की कोई योजना नहीं है। पाकिस्तानी विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ने साफ किया कि मक्का रक्षा समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है। तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। इसका यह मतलब नहीं कि सऊदी अरब से जुड़े हर सुरक्षा संकट में पाकिस्तान सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेगा।
गौरतलब है कि इससे पहले पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक निजी न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि बिना उकसावे के हमला या यमन के हालात का सऊदी अरब तक विस्तार, निश्चित रूप से समझौते को सक्रिय कर देगा। सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना पहले से प्रशिक्षण और रसद सहायता के लिए तैनात है, जिसे पुराने द्विपक्षीय रक्षा सहयोग का हिस्सा बताया गया है।
बीते 7 अगस्त 2026 को इस्तांबुल नहीं बल्कि मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता नाटो के अनुच्छेद-5 जैसी व्यवस्था पर आधारित है, यानी किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। यह पैक्ट पाकिस्तान-सऊदी अरब के बीच सितंबर 2025 में हुए द्विपक्षीय सामरिक रक्षा समझौते (एसएमडीए) की नींव पर खड़ा है। हस्ताक्षर के वक्त पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने इसे विशुद्ध रक्षात्मक बताते हुए कहा था कि यह क्षेत्र के अन्य देशों के लिए भी खुला है।
समझौते पर हस्ताक्षर के करीब एक महीने बाद ही यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के आभा, खमीस मुशैत, जिजान और नजरान शहरों पर मिसाइल व ड्रोन हमले किए, जिनमें महिलाओं और बच्चों समेत 70 से अधिक लोग घायल हुए। हूती समूह ने दावा किया कि उसका निशाना सऊदी तेल कंपनी अरामको की सुविधाएं और किंग खालिद एयर बेस थे। इन हमलों के बाद सऊदी अरब ने दक्षिणी हिस्से की कुछ ऊर्जा सुविधाएं अस्थायी रूप से बंद कर दीं। तुर्की के विदेश मंत्रालय ने भी 8 सितंबर को इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाइयां यमन संकट के राजनीतिक समाधान की कोशिशों को कमजोर करती हैं।
अगस्त में समझौते पर हस्ताक्षर के तुरंत बाद पाकिस्तान ने इसे क्षेत्र के अन्य इच्छुक देशों के लिए खुला बताया था और मिस्र जैसे देशों के जुड़ने की चर्चाओं का भी स्वागत किया गया था। लेकिन हूती हमलों के बाद सऊदी अरब पर वास्तविक खतरा मंडराने की स्थिति में पाकिस्तान ने अब फिलहाल विस्तार की कोई योजना न होने की बात कहकर सतर्कता भरा रुख अपनाया है।
विश्लेषकों की मानें तो यह पहला मौका है, जब हस्ताक्षर के महज एक महीने के भीतर इस नए "मुस्लिम नाटो" जैसे गठबंधन की असली परीक्षा सामने आई है। पाकिस्तान और तुर्की, दोनों ही ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई में उलझने से बचना चाहते हैं, क्योंकि इससे ईरान के साथ सीधा टकराव बढ़ सकता है। वहीं, इस्लामाबाद खुद तेहरान से बातचीत और मध्यस्थता के रास्ते पर बना रहना चाहता है।
अल जजीरा और अटलांटिक काउंसिल जैसे थिंक-टैंकों के विश्लेषण बताते हैं कि समझौते को लागू करने का सटीक तरीका अब भी स्पष्ट नहीं है। यह अस्पष्टता जानबूझकर बनाई गई एक रणनीतिक गुंजाइश भी हो सकती है, जिससे सऊदी अरब को कूटनीतिक समर्थन मिले, लेकिन पाकिस्तान व तुर्की को तत्काल सैन्य जोखिम में न उतरना पड़े। कुछ विशेषज्ञ इसे शुद्ध रूप से प्रतीकात्मक गठबंधन भी मानते हैं। अन्य विशेषज्ञ इसे मध्य-पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़े बदलाव और गंभीर सैन्य-कूटनीतिक क्षमता वाले गठजोड़ के तौर पर देखते हैं, क्योंकि तीनों देशों के पास मिलाकर लाखों की सेना और भारी सैन्य जखीरा मौजूद है।