
भारत की परमाणु बिजली व्यवस्था अब बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। करीब सात दशक तक परमाणु ऊर्जा का उत्पादन मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों के हाथ में रहा, लेकिन अब SHANTI Act, 2025 के जरिए निजी कंपनियों के लिए भी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता खोला गया है। सरकार का लक्ष्य 2047 तक देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता को मौजूदा करीब 8.78 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करना है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि निजी कंपनियां कितनी बिजली बनाएंगी, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि अगर परमाणु हादसा हुआ तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
भारत की बिजली की जरूरत लगातार बढ़ रही है। सौर और पवन ऊर्जा तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन ये मौसम और समय पर निर्भर हैं। परमाणु बिजली लगातार बिजली देने वाला स्रोत है। इसलिए सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ बिजली के एक महत्वपूर्ण स्रोत के तौर पर देख रही है।
2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का लक्ष्य सरकारी कंपनियों के दम पर हासिल करना मुश्किल माना जा रहा है। इसी वजह से सरकार निजी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के जरिए निवेश बढ़ाना चाहती है।
सरकार के रोडमैप के अनुसार 2031-32 तक परमाणु क्षमता करीब 22 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य है। इसके बाद क्षमता में और तेजी से बढ़ोतरी की योजना है।
नहीं। निजी क्षेत्र के लिए रास्ता खुलने का मतलब यह नहीं है कि कंपनियां बिना सरकारी नियंत्रण के परमाणु संयंत्र चला सकेंगी। SHANTI Act के तहत परमाणु सुविधा स्थापित करने और चलाने के लिए केंद्र सरकार का लाइसेंस और परमाणु सुरक्षा से जुड़ी नियामकीय मंजूरी जरूरी होगी। सुरक्षा, रेडियोधर्मी सामग्री और कचरे के प्रबंधन जैसी जिम्मेदारियां ऑपरेटर पर रहेंगी।
यानी व्यवस्था का मॉडल यह होगा, निवेश निजी हो सकता है, लेकिन परमाणु सुरक्षा पर सरकार और नियामक का नियंत्रण बना रहेगा।
यह सबसे अहम सवाल है। SHANTI Act में नो-फॉल्ट लायबिलिटी का प्रावधान है। इसका मतलब है कि परमाणु हादसे के पीड़ितों को मुआवजा पाने के लिए पहले यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि ऑपरेटर की गलती थी।
अगर किसी निजी कंपनी के परमाणु संयंत्र में हादसा होता है और उससे परमाणु नुकसान होता है तो ऑपरेटर पर निर्धारित सीमा तक मुआवजे की जिम्मेदारी होगी।
ऑपरेटर की अधिकतम देनदारी संयंत्र की क्षमता के अनुसार तय की गई है। बड़े संयंत्र के लिए यह अधिकतम ₹3,000 करोड़ तक हो सकती है। यानी हादसे की स्थिति में पहला वित्तीय बोझ निजी ऑपरेटर पर आएगा, लेकिन उसकी जिम्मेदारी असीमित नहीं होगी।
यहीं सरकार की भूमिका शुरू होती है। अगर परमाणु हादसे से होने वाला नुकसान ऑपरेटर की निर्धारित देनदारी से ज्यादा हो जाता है तो अतिरिक्त राशि की व्यवस्था केंद्र सरकार करेगी। कानून में इसके लिए सरकारी वित्तीय व्यवस्था और Nuclear Liability Fund जैसे प्रावधानों का रास्ता रखा गया है।
इसका सीधा मतलब है कि परमाणु बिजली का कारोबार निजी हो सकता है, लेकिन बहुत बड़े हादसे का पूरा वित्तीय जोखिम निजी कंपनी पर नहीं रहेगा।
यही इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा सवाल भी है। मुनाफे में निजी कंपनी की हिस्सेदारी होगी, लेकिन बेहद बड़े हादसे की स्थिति में सार्वजनिक धन की जरूरत पड़ सकती है।
निजी परमाणु ऑपरेटर को अपनी कानूनी देनदारी को कवर करने के लिए बीमा या दूसरी वित्तीय सुरक्षा रखनी होगी। भारत में पहले से India Nuclear Insurance Pool जैसी व्यवस्था मौजूद है। इसका उद्देश्य परमाणु हादसे से जुड़ी देनदारी के लिए वित्तीय सुरक्षा उपलब्ध कराना है।
हालांकि नई व्यवस्था में निजी कंपनियों के लिए बीमा का वास्तविक ढांचा कितना होगा, इसका अंतिम स्वरूप संबंधित नियमों और परियोजनाओं की शर्तों से स्पष्ट होगा। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि हर निजी परमाणु संयंत्र के लिए बीमा प्रीमियम कितना होगा।
परमाणु बिजली को केवल उत्पादन लागत से नहीं समझा जा सकता। परमाणु संयंत्र बनाने में शुरुआती निवेश बहुत बड़ा होता है और परियोजना पूरी होने में कई साल लग सकते हैं। NPCIL के अनुसार 2024-25 में उसकी परमाणु बिजली की औसत टैरिफ करीब ₹3.90 प्रति यूनिट रही। लेकिन नई परियोजनाओं की लागत इससे अलग हो सकती है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुमानों में नई परमाणु परियोजनाओं के लिए पूंजीगत लागत करीब ₹15-16 करोड़ प्रति मेगावाट और स्तरित टैरिफ करीब ₹6 प्रति यूनिट के आसपास रहने का अनुमान दिया गया है। इसमें निर्माण लागत, वित्तपोषण, सुरक्षा, ईंधन, बीमा और दूसरे खर्च महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए निजी कंपनियों के आने से परमाणु बिजली अपने आप सस्ती हो जाएगी, ऐसा अभी कहना जल्दबाजी होगी।
सरकार को उम्मीद है कि निजी पूंजी आने से परमाणु परियोजनाओं के लिए निवेश बढ़ेगा और नई परियोजनाएं तेजी से तैयार हो सकेंगी। निजी कंपनियां अपनी पूंजी, प्रबंधन क्षमता और तकनीकी विशेषज्ञता लगा सकती हैं। इससे सरकार पर पूरा निवेश करने का दबाव कम होगा।
इसके अलावा Small Modular Reactors यानी SMR जैसी नई तकनीकों के विकास और इस्तेमाल में भी निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ सकती है।
भारत आने वाले वर्षों में परमाणु ऊर्जा को सिर्फ बिजली उत्पादन के लिए नहीं, बल्कि उद्योगों और भविष्य की बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए भी महत्वपूर्ण मान रहा है।
यही निजी भागीदारी की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। परमाणु बिजलीघर सामान्य फैक्ट्री नहीं होता। यहां छोटी सी गलती का असर लंबे समय तक हो सकता है। इसलिए निजी और सरकारी ऑपरेटरों के लिए सुरक्षा मानक समान रूप से कड़े होने जरूरी हैं।
दूसरा सवाल : नियामक की स्वतंत्रता और क्षमता का है। अगर निजी कंपनियों की संख्या बढ़ती है तो परमाणु नियामक को ज्यादा परियोजनाओं की निगरानी करनी होगी।
तीसरा सवाल पारदर्शिता का है : हादसा होने पर जानकारी कितनी जल्दी सार्वजनिक होगी और प्रभावित लोगों को मुआवजा कितनी जल्दी मिलेगा?
आज भारत की परमाणु क्षमता करीब 8.78 गीगावाट है और लक्ष्य 2047 तक इसे 100 गीगावाट तक पहुंचाना है। यानी करीब 20 वर्षों में क्षमता को लगभग 11 गुना बढ़ाना होगा।
यह आसान काम नहीं है। परमाणु परियोजनाओं में जमीन, सुरक्षा मंजूरी, निर्माण, वित्त और तकनीक से लेकर स्थानीय विरोध तक कई चुनौतियां होती हैं। इसीलिए सरकार निजी कंपनियों को जोड़कर इस क्षेत्र में निवेश और परियोजनाओं की गति बढ़ाना चाहती है।