
Railway Solar Tracks: भारतीय रेलवे, जो दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है, हमेशा से अपनी विशालता और पुरानी विरासत के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब यही रेलवे हरित ऊर्जा के क्षेत्र में एक अग्रणी प्रयोगकर्ता की एक नई पहचान बना रहा है। बनारस लोकोमोटिव वर्क्स (BLW) ने हाल ही में देश की पहली हटाने योग्य (Removable) सौर पैनल परियोजना का शुभारंभ किया है, जिसे रेलवे पटरियों के बीच की खाली जगह पर स्थापित किया गया है ।
यह केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं है, बल्कि यह उस सोच को दर्शाता है हर छोटी से छोटी जगह का अधिकतम उपयोग करने वाले 'न्यू इंडिया' की पहचान है। ये सौर पैनल पटरियों के बीच उस जगह पर लगाए गए हैं, जो आमतौर पर बेकार पड़ी रहती हैं। इसका मतलब है कि इस परियोजना के लिए एक इंच भी अतिरिक्त जमीन की जरूरत नहीं पड़ी।
यह पायलट प्रोजेक्ट 70 मीटर लंबी पटरी पर फैला है, जिसमें कुल 28 सोलर पैनल लगाए गए हैं। ये पैनल मिलकर करीब 15 किलोवाट (KW) बिजली पैदा करते हैं । हालांकि ये आंकड़ा फिलहाल छोटा है, लेकिन इसकी क्षमता असीमित है। BLW के महाप्रबंधक नरेश पाल सिंह के अनुसार, BLW की कुल ऊर्जा जरूरतों का 20% हिस्सा पहले से ही सौर ऊर्जा से पूरा हो रहा है। इस नई तकनीक से यह प्रतिशत और बढ़ने की उम्मीद है।
इन पैनलों की सबसे खास बात यह है कि ये हटाए भी जा सकते हैं। इसका मतलब है कि जब जरूरत हो, इन्हें आसानी से हटाकर रखरखाव (मेंटेनेंस) किया जा सकता है, या मौसम के हिसाब से इनकी दिशा बदली जा सकती है। इनकी उम्र करीब 25 साल होने का अनुमान है।
रेलवे की 'हरित क्रांति' की बड़ी तस्वीर
वाराणसी का यह प्रयोग भारतीय रेलवे की उस बड़ी सोच का हिस्सा है, जिसमें वह शून्य-कार्बन उत्सर्जन (Net Zero Carbon Emission) का लक्ष्य लेकर चल रही है।
हो सकता है कि आप सोचें, 'ये पटरियों पर पैनल लगा रहे हैं, इससे मुझे क्या?' असल में इसका सीधा और बड़ा फायदा आम यात्री को ही होगा। जब रेलवे अपनी बिजली खुद बनाएगी, तो उसकी परिचालन लागत कम होगी। इससे किराए पर दबाव कम हो सकता है और जो पैसा बिजली पर खर्च होता था, वह सुरक्षा, सफाई या सुविधाओं पर खर्च हो सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो, ट्रेन सस्ती और बेहतर हो सकती है।
अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के अधिकारियों ने भी पहले ही दिखा दिया है कि कैसे हरित तकनीक से न सिर्फ बिजली बचती है, बल्कि हवा की गुणवत्ता और पानी की रीसाइक्लिंग में भी सुधार होता है। वाराणसी का यह प्रयोग उसी दिशा में एक और नई पहल है।
अभी यह सिर्फ एक पायलट प्रोजेक्ट है, लेकिन अगर यह सफल रहा तो, आने वाले समय में देशभर की रेलवे पटरियों पर हजारों किलोमीटर तक ऐसे सोलर पैनल बिछते दिख सकते हैं। यह एक ऐसी सोच है जो, 'विकसित भारत @2047' के सपने को साकार करने में मदद कर सकती है, जहां विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। कहना होगा कि ये सिर्फ पटरियां नहीं रह गईं, ये भविष्य की वो लाइनें हैं, जिन पर भारत की हरित ऊर्जा की गाड़ी दौड़ेगी, तेज़, सस्ती और स्वच्छ।