22 अगस्त 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

कैंसर की वैक्सीन अब हर मरीज के लिए अलग? DNA से तैयार होगा इलाज का नया हथियार

Personalised Cancer Vaccine: कैंसर के खिलाफ अगली बड़ी लड़ाई शायद एक ही दवा से नहीं, बल्कि हर मरीज के ट्यूमर की अपनी 'जेनेटिक पहचान' पढ़कर लड़ी जाएगी। मॉडरेना और मर्क की नई mRNA थेरेपी ने इसी दिशा में उम्मीद जगाई है।
6 min read
Google source verification

भारत

image

Sanjana Kumar

Aug 22, 2026

Personalised Cancer Therapy

Personalised Cancer Therapy: कैंसर के खिलाफ नए तरीके से लड़ाई। (AI Creative)

Personalized Cancer Vaccine: कैंसर की वैक्सीन सुनते ही आमतौर पर दिमाग में ऐसी वैक्सीन की तस्वीर आती है, जो बीमारी होने से पहले शरीर को उससे बचाने के लिए दी जाती है। लेकिन कैंसर की दुनिया में एक बिल्कुल अलग तरह की वैक्सीन विकसित हो रही है। यह है पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन। इसका उद्देश्य किसी स्वस्थ व्यक्ति को कैंसर से पहले से बचाना नहीं, बल्कि कैंसर हो चुके मरीज के शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को उसके अपने ट्यूमर की पहचान सिखाना है।

यही वजह है कि मॉडरेना और मर्क की mRNA आधारित इंटिस्मेरन ऑटोजेन V940/mRNA-4157 (intismeran autogene) थेरेपी को लेकर 2026 में इतनी चर्चा है। 19 अगस्त को कंपनियों ने Phase-3 INTerpath-001 के शुरुआती परिणामों में बताया कि हाई-रिस्क मेलेनोमा (melanoma) के मरीजों में वैक्सीन को कीट्रूडा (Keytruda) (pembrolizumab) के साथ देने पर कैंसर की वापसी और दूर के अंगों तक फैलने से जुड़े दोनों प्रमुख एंडपॉइंट्स में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण लाभ मिला। लेकिन असली कहानी 'mRNA वैक्सीन' से भी ज्यादा दिलचस्प है। यह वैक्सीन आखिर मरीज के लिए बनती कैसे है?

पहले मरीज का कैंसर पढ़ा जाता है

इस तकनीक में सबसे पहले मरीज के ट्यूमर से प्राप्त नमूने की जेनेटिक जांच की जाती है। वैज्ञानिक tumor DNA/RNA में मौजूद उन म्यूटेशन्स को खोजते हैं, जिनसे ऐसे असामान्य प्रोटीन बन सकते हैं, जिन्हें सामान्य कोशिकाओं में नहीं पाया जाता। इन असामान्य टुकड़ों को नियोएंटीजन (neoantigens) कहा जाता है।

नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट (National Cancer Institute) के अनुसार पर्सनलाइज़्ड नियोएंटीजन वैक्सीन में मरीज के ट्यूमर का विश्लेषण और जेनेटिक सिक्वेंसिंग करके उन neoantigens की पहचान की जाती है जो मजबूत इम्यून रेस्पॉन्स पैदा कर सकते हैं। फिर उनके लिए जेनेटिक इंस्ट्रक्शन को mRNA vaccine में शामिल किया जाता है।

यानी यह कुछ-कुछ ऐसा है जैसे डॉक्टर कैंसर के लिए पहले उसका 'जेनेटिक फिंगरप्रिंट' तैयार करें और फिर उसी फिंगरप्रिंट को देखकर प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाया जाए।

वैक्सीन कैंसर सेल को नहीं, इम्यून सिस्टम को सिखाती है

यहां mRNA की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। mRNA को शरीर में ऐसी अस्थायी जेनेटिक इंस्ट्रक्शन्स की तरह समझा जा सकता है, जो कोशिकाओं को खास नियोएंटिजन्स बनाने के बारे में निर्देश देती हैं। इसके बाद इम्यून सिस्टम उन संकेतों को पहचानना सीखता है और टी-सेल्स को ऐसे कैंसर सेल तलाशने के लिए सक्रिय किया जा सकता है जिन पर वही असामान्य पहचान मौजूद हो।

यानी वैक्सीन सीधे ट्यूमर को जहर देकर खत्म करने की कोशिश नहीं करती। इसका लक्ष्य है इम्यून सिस्टम को ज्यादा सटीक निशाना देना। यही पर्सनलाइज्ड थेरेपी और पारंपरिक कैंसर उपचार के बीच बड़ा अंतर है।

फिर Keytruda की जरूरत क्यों?

यहां Moderna-Merck की रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आता है। इस थेरेपी को Keytruda के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है। Keytruda एक इम्यून चेकपॉइंट इनहेबिटर है। सरल भाषा में कहें तो कैंसर कई बार इम्यून सिस्टम पर मौजूद 'ब्रेक' का फायदा उठाकर खुद को बचाता है। चेकपॉइंट इन्हेबिटर उस ब्रेक को हटाने में मदद करता है।

पर्सनलाइज्ड कैंसर इम्यून सिस्टम को निशाना पहचानने की ट्रेनिंग देने की कोशिश करती है, जबकि Keytruda इम्यून रेस्पॉन्स को कैंसर के खिलाफ ज्यादा प्रभावी बने रहने में मदद करता है।

इसी कॉम्बिनेशन ने पहले Phase-2b KEYNOTE-942 अध्ययन में भी उत्साहजनक परिणाम दिखाए थे। 2026 में जारी पांच साल के फॉलोअप में कॉम्बिनेशन ने Keytruda अकेले की तुलना में रिक्योरेंस या डेथ का जोखिम 49% और डिस्टेंट मेटास्टेसिस या डेथ का जोखिम 59% कम दिखाया था।

सबसे बड़ी उपलब्धि, लेकिन अभी अंतिम मंजिल नहीं

Phase-3 INTerpath-001 में 1,137 ऐसे मरीज शामिल थे, जिनका हाई रिस्क मेलेनोमा सर्जरी से निकाला जा चुका था। अध्ययन में स्टेज IIB से IV तक के मरीज शामिल किए गए थे। कंपनियों के अनुसार कॉम्बिनेशन ने रिक्योरेंस फ्री सर्वाइवल और डिस्टेंट मेटास्टेसिस फ्री सर्वाइवल के प्राइमरी और की सेकंडरी एंडोपॉइंट्स हासिल किए।

यहां एक जरूरी सावधानी भी है। अभी उपलब्ध Phase-3 घोषणा मुख्यतः टॉप लाइन रिजल्ट्स पर आधारित है। पूरा वैज्ञानिक डेटा और विस्तृत सर्वाइवल एनालिसिस बाद में सामने आना है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस वैक्सीन ने मेलेनोमा को 'ठीक' कर दिया या यह हर कैंसर के लिए काम करेगी। AP की रिपोर्ट के मुताबिक इस चरण पर ओवरऑल सर्वाइवल का पूरा डेटा उपलब्ध नहीं कराया गया था।

क्या यह हर कैंसर के लिए बन सकती है?

यही इस तकनीक का सबसे बड़ा सवाल है। Melanoma जैसे कुछ कैंसरों में म्यूटेशन की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकती है, जिससे नियोएंटीजन्स पहचानने के अधिक अवसर मिलते हैं। लेकिन हर कैंसर ऐसा नहीं होता। वैज्ञानिकों को यह साबित करना होगा कि पर्सनलाइज्ड वैक्सीन्स अलग-अलग ट्यूमर टाइप्स में कितनी प्रभावी और टिकाऊ होती हैं। इस दिशा में शोध मेलेनोमा से आगे बढ़ चुका है।

Personalized mRNA neoantigen vaccines को पेन्क्रियाटिक और अन्य सॉलिड कैंसर्स में भी जांचा जा रहा है। 2026 की वैज्ञानिक समीक्षा में भी इनके पॉटेंशियर के साथ-साथ बायलॉजिकल और टेक्नीकल लिमिटेशन्स को महत्वपूर्ण चुनौती बताया गया है।

असली चुनौती: 'एक वैक्सीन' नहीं, हजारों अलग वैक्सीन

इस तकनीक की सबसे दिलचस्प चुनौती इसकी खूबी ही है। अगर हर मरीज की वैक्सीन उसके ट्यूमर म्यूटेशन के आधार पर अलग बनती है, तो इसे सामान्य वैक्सीन की तरह बड़े पैमाने पर एक ही फॉर्मूलेशन बनाकर लाखों लोगों को देना आसान नहीं होगा।

ट्यूमर की सिक्वेंसिंग, म्यूटेशन सेलेक्शन, वैक्सीन डिजाइन, मैन्यूफैक्चरिंग और ट्रीटमेंट तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया को तेज और किफायती बनाना होगा।

यानी भविष्य की पर्सनलाइज्ड कैंसर थेरेपी में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि 'क्या वैक्सीन काम करती है?' बल्कि यह भी होगा कि 'क्या इसे हर मरीज के लिए समय पर और उचित लागत में बनाया जा सकता है?'

अब तक इस्तेमाल हो रही थेरेपी

  • पारंपरिक इलाज (base treatments)- सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी

ये अभी भी बेस बने हुए हैं, बाकी नई थेरेपी अक्सर इन्हीं के साथ मिलाकर दी जाती हैं।

  • टार्गेटेड थेरेपी

ट्यूमर के किसी खास जीन/म्यूटेशन को निशाना बनाकर दवा दी जाती है, जैसे KRAS G12C/D इनहिबिटर्स।

  • इम्यूनोथेरेपी

इम्यूनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और सेलुलर थेरेपी को अब मिलाकर पर्सनलाइज्ड इलाज बनाया जा रहा है — यानी मरीज का अपना इम्यून सिस्टम कैंसर सेल्स को पहचानकर खत्म करता है।

  • सेल थेरेपी (CAR-T)

मरीज की अपनी इम्यून सेल्स को इंजीनियर करके वापस शरीर में डाला जाता है, ताकि वे कैंसर सेल्स पर हमला करें।

  • एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स (ADC)

2026 में एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स और सेलुलर थेरेपी के दायरे का विस्तार हो रहा है।

  • जीनोमिक टेस्टिंग / मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग

यूसी सैन डिएगो के शोधकर्ताओं ने पहली बार दुनिया में क्लिनिकल ट्रायल में दिखाया कि मरीज के ट्यूमर के DNA के आधार पर मल्टी-ड्रग इलाज को सुरक्षित तरीके से पर्सनलाइज किया जा सकता है, जिससे इलाज की सफलता काफी बढ़ जाती है। इससे कई मरीजों में गैर-जरूरी कीमोथेरेपी से बचा जा सकता है।

  • लिक्विड बायोप्सी

खून की जांच से ट्यूमर के टुकड़े (circulating tumor DNA) पकड़े जाते हैं। कैंसर के दोबारा होने का पता जल्दी लगाने और इलाज को पर्सनलाइज़ करने में मदद करते हैं।

  • इंग्लैंड में NHS के हजारों कैंसर मरीजों को जल्द ही ऐसी वैक्सीन के ट्रायल में शामिल किया जा सकता है, जो दोबारा कैंसर होने का खतरा कम करे और साइड इफेक्ट्स भी कम हों।
  • रेडियोलिगैंड थेरेपी

एक टार्गेटेड रेडियोएक्टिव इलाज, जिसे हाल ही में मेटास्टैटिक प्रोस्टेट कैंसर के शुरुआती चरणों के इलाज के लिए मंज़ूरी मिली है और यह आक्रामक कैंसर के मरीजों के लिए गेम-चेंजर हो सकता है।

  • जीन थेरेपी

2003 में चीन में मंजूर हुई Gendicine, कैंसर के लिए पहली कमर्शियल जीन थेरेपी थी, जो p53 ट्यूमर-सप्रेसर जीन को बहाल कर कैंसर सेल्स को खत्म करने में मदद करती है।

- AI-संचालित ऑन्कोलॉजी

AI आधारित डायग्नोस्टिक टूल्स (जैसे DeepHRD, MSI-SEER) इमेजिंग, जीनोमिक्स और क्लिनिकल डेटा को जोड़कर बेहतर फैसले लेने में मदद कर रहे हैं।

कैंसर के इलाज में बदल सकता है पूरा नजरिया

इस खोज का महत्व सिर्फ मेलेनोमा तक सीमित नहीं है। अगर आगे के परीक्षणों में इसी तरह के परिणाम दूसरे सॉलिड ट्यूमर्स में भी मिलते हैं तो, कैंसर उपचार का नजरिया बदल सकता है।

आज डॉक्टर कैंसर के प्रकार, स्टेज और मॉलेक्यूलर कैरेक्टरस्टिक्स के आधार पर उपचार चुनते हैं। भविष्य में संभव है कि मरीज के ट्यूमर जीनोम को पढ़कर उसके लिए एक व्यक्तिगत इम्यून ट्रीटमेंट तैयार किया जाए।

यानी कैंसर के खिलाफ भविष्य की वैक्सीन शायद ऐसी चीज नहीं होगी जो, मेडिकल स्टोर से एक ही पैकेट में मिले। हो सकता है, आपकी वैक्सीन सिर्फ आपकी हो, क्योंकि वह आपके कैंसर की अपनी जेनेटिक पहचान पढ़कर बनाई गई हो।

- 2024 में वैश्विक ऑन्कोलॉजी खर्च 252 अरब डॉलर था, जो 2029 तक बढ़कर 441 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। यह दिखाता है कि निवेश कितनी तेजी से बढ़ रहा है। कोई एक कैंसर का इलाज नहीं है, हर प्रगति बीमारी और बायोमार्कर के हिसाब से अलग-अलग है, और शुरुआती नतीजे उत्साहजनक होने के बावजूद पर्सनलाइज्ड वैक्सीन को अभी सार्वभौमिक इलाज नहीं कहा जा सकता।

भारत में उपलब्धता और कीमत

NexCAR19 - भारत की अपनी CAR-T थेरेपी

  • NexCAR19, IIT बॉम्बे और टाटा मेमोरियल सेंटर से निकली कंपनी ImmunoACT ने विकसित की है। यह दुनिया की महान कैंसर रिसर्च संस्थाओं में से एक है।
  • यह CD19 को टारगेट करती है और रिलैप्स्ड/रिफ्रैक्टरी B-cell ALL (15 साल से ऊपर के मरीजों में, जिन्हें पहले कम से कम 2 थेरेपी दी जा चुकी हो) और लार्ज B-cell लिंफोमा के लिए मंजूर है।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ESTIC 2025 कॉन्क्लेव में इसे राष्ट्र को समर्पित किया था और इसे भारत की पहली स्वदेशी कैंसर सेल थेरेपी बताया।
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मुताबिक, यह भारत की पहली लिविंग ड्रग है, जिसने जीन थेरेपी को वैज्ञानिक सटीकता और मरीज़ सुरक्षा से समझौता किए बिना किफ़ायती और सुलभ बनाया है।
  • कीमत में भारी अंतर
  • अमेरिका में जहां CAR-T थेरेपी की कीमत लगभग 400,000 रुपए है, वहीं भारत में NexCAR19 की कीमत करीब 30,000 रुपए (लगभग 25 लाख) है- यानी करीब 13 गुना सस्ती।
  • भारत में CAR-T सेल थेरेपी (NexCAR19) की कीमत 35 लाख से 40 लाख के बीच है, जो एक स्वदेशी विकल्प है।

किन अस्पतालों में उपलब्ध

  • टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल/ACTREC (मुंबई) - NexCAR19 के विकास में शुरुआती सहयोगी संस्थान, सबसे ज्यादा अनुभव और मामलों की संख्या; कुछ जगह सरकारी सब्सिडी भी उपलब्ध है।
  • अपोलो हॉस्पिटल्स (दिल्ली, मुंबई), कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल (मुंबई), मणिपाल हॉस्पिटल (बेंगलुरु), मेदांता (गुरुग्राम)- ये सभी CAR-T प्रोग्राम चला रहे हैं या बढ़ा रहे हैं।
  • जयपुर का SMS हॉस्पिटल 2024 में CAR-T थेरेपी के लिए डेडिकेटेड क्लिनिकल हेमेटोलॉजी डिपार्टमेंट बनाने वाला पहला सरकारी अस्पताल बना, जहां 20 बेड की सुविधा है।
  • 2027 तक भारत में सालाना 600 से ज़्यादा ट्रांसप्लांट की क्षमता की योजना है।

दूसरे इलाजों की अनुमानित कीमत (भारत में)

  • कीमोथेरेपी: 8,000 रुपए से 2,00,000 रुपए प्रति साइकिल (आमतौर पर 4 से 8 साइकिल जरूरी)
  • रेडिएशन थेरेपी: 1,00,000 से 4,50,000 रुपए (पूरा कोर्स)
  • ऑन्कोलॉजी सर्जरी: 1,50,000 से 6,00,000 रुपए (जटिलता के अनुसार)
  • बोन मैरो ट्रांसप्लांट: 10,00,000 से 25,00,000
  • टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल (मुंबई) और AIIMS (दिल्ली) जैसे सरकारी संस्थान भारत में कैंसर इलाज के सबसे किफायती विकल्पों में शामिल हैं।