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महिलाओं का इम्यून सिस्टम ज्यादा मजबूत, फिर बीमारियां उन्हीं पर क्यों भारी? नए शोध ने खोला शरीर का छिपा राज

Female Immune System: महिलाएं केवल दिखने में ही नहीं, नई रिसर्च से वैज्ञानिक हैरान, पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के शरीर में मिले 1,000 से ज्यादा जेनेटिक स्विच, भविष्य में बदल सकता है इलाज का तरीका, सामने आया क्यों पुरुषों से ज्यादा महिलाओं पर भारी पड़ती है ऑटोइम्यून बीमारी?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 21, 2026

female immune system genetic switches

female immune system genetic switches: ऩई रिसर्च में सामने आया महिलाओं और पुरुषों के इम्यूनिटी का अंतर, सिर्फ देखने में अलग नहीं हैं स्त्री पुरुष सामने आ सकते हैं कई और डिफरेंसेस (AI Creative)

Female Immune System: महिलाओं का शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए ज्यादा सक्रिय प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दे सकता है, लेकिन यही ताकत कई बार शरीर के खिलाफ भी मुड़ जाती है। 12.5 लाख से ज्यादा प्रतिरक्षा कोशिकाओं पर हुए नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 1,000 से ज्यादा आनुवंशिक 'स्विच' खोजे हैं, जो पुरुषों और महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली के फर्क को समझने में नई कड़ी जोड़ते हैं।

कभी आपने सोचा है कि एक ही बीमारी पुरुष और महिला के शरीर में अलग तरह से क्यों दिखाई दे सकती है? या क्यों कुछ ऐसी बीमारियां हैं जिनका बोझ महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा है?

इस सवाल का जवाब सिर्फ हार्मोन में नहीं छिपा हो सकता। वैज्ञानिकों को अब शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के भीतर मौजूद ऐसे आनुवंशिक नियंत्रण मिले हैं, जो पुरुषों और महिलाओं में अलग तरीके से काम करते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के गारवन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च और न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने करीब 1,000 स्वस्थ लोगों के खून से 12.5 लाख से ज्यादा प्रतिरक्षा कोशिकाओं का अध्ययन किया। शोध में सिंगल-सेल तकनीक का इस्तेमाल किया गया, यानी वैज्ञानिकों ने बजाय पूरे रक्त का औसत निकालकर कोई निष्कर्ष निकालने के अलग-अलग कोशिकाओं की गतिविधि को देखा।

महिलाओं की ताकत ही बन सकती है कमजोरी

हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली का काम बाहरी दुश्मनों से लड़ना है। वायरस या बैक्टीरिया शरीर में जैसे ही एंटर होते हैं, प्रतिरक्षा कोशिकाएं एक्टिव हो जाती हैं और उन्हें खत्म करने की कोशिश करती हैं।

नए अध्ययन में महिलाओं की प्रतिरक्षा कोशिकाओं में सूजन यानी इंफ्लेमेशन से जुड़े रास्तों की गतिविधि ज्यादा दिखाई दीं। महिलाओं में बी कोशिकाओं और नियामक टी कोशिकाओं की संख्या भी अधिक पाई गई। इसके उलट पुरुषों में मोनोसाइट नामक शुरुआती रक्षा कोशिकाओं का अनुपात ज्यादा था।

यही ज्यादा सक्रिय प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया महिलाओं को कुछ संक्रमणों से लड़ने में फायदा दे सकती है। लेकिन शरीर की सुरक्षा व्यवस्था अगर जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाए तो समस्या भी पैदा हो सकती है।

इसे ऐसे समझिए, घर की सुरक्षा के लिए गार्ड का चौकन्ना रहना अच्छी बात है, लेकिन अगर वह हर आने-जाने वाले को दुश्मन समझने लगे तो परेशानी घर के अंदर ही शुरू हो जाएगी।

शरीर अपने ही अंगों को दुश्मन समझने लगे तो…

ऑटोइम्यून बीमारी में यही होता है। प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से शरीर के स्वस्थ ऊतकों यानी टिश्यू को ही बाहरी खतरा समझकर उन पर हमला करने लगती है। ल्यूपस इसका एक प्रमुख उदाहरण है। शोधकर्ताओं के अनुसार ल्यूपस महिलाओं में पुरुषों की तुलना में लगभग नौ गुना ज्यादा पाया जाता है। मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी कुछ अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों में भी महिलाओं का जोखिम अधिक है।

अब तक वैज्ञानिक इस अंतर के पीछे सेक्स हार्मोन, एक्स और वाई गुणसूत्र तथा प्रतिरक्षा कोशिकाओं के व्यवहार जैसे कई कारणों को देखते रहे हैं। नया अध्ययन इस कहानी में एक और परत जोड़ता है। और यह है जीन को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था।

मिले 1,000 से ज्यादा जेनेटिक स्विच'

शोधकर्ताओं ने ऐसे आनुवंशिक नियंत्रण बिंदुओं की पहचान की जिन्हें एक्सप्रेशन क्वांटिटेटिव ट्रेट लोकी यानी ईक्यूटीएल (EQTL) कहा जाता है। इन्हें किसी जीन का वॉल्यूम कंट्रोल समझ सकते हैं। ये तय करने में मदद करते हैं कि कोई जीन कितनी मात्रा में सक्रिय होगा।

वैज्ञानिकों को 1,000 से ज्यादा सेक्स-स्पेसिफिक जेनेटिक स्विच मिले। खास बात यह रही कि इनका बड़ा हिस्सा एक्स और वाई सेक्स क्रोमोसोम पर नहीं, बल्कि उन सामान्य गुणसूत्रों पर मिला, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों में पाए जाते हैं।

यानी महिलाओं और पुरुषों की प्रतिरक्षा प्रणाली का फर्क केवल 'महिला में दो एक्स क्रोमोसोम और पुरुष में एक्स-वाई' तक सीमित कहानी नहीं है। शरीर के दूसरे हिस्सों में मौजूद जीन भी अलग तरीके से सक्रिय हो सकते हैं।

ल्यूपस की पहेली में भी मिली नई कड़ी

शोध का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि कुछ आनुवंशिक बदलावों का संबंध सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस से जुड़े दो जीनों की गतिविधि से मिला। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि महिलाओं में ल्यूपस का जोखिम इतना अधिक क्यों है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी महिला के जीन में ऐसा बदलाव है तो उसे बीमारी निश्चित रूप से होगी। शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि ऑटोइम्यून बीमारी का जोखिम केवल आनुवंशिकता से तय नहीं होता, हार्मोन और दूसरे जैविक तथा पर्यावरणीय कारक भी महत्वपूर्ण हैं।

भविष्य में इलाज भी एक जैसा नहीं होगा?

इस खोज का असर केवल यह समझने तक सीमित नहीं है कि महिलाओं को ऑटोइम्यून बीमारी ज्यादा क्यों होती है। इसका संबंध भविष्य की पर्सनलाइज्ड मेडिसिन से भी है। आज कई ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज में ऐसी दवाएं इस्तेमाल होती हैं, जो व्यापक रूप से प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाती हैं। लेकिन हर मरीज का शरीर दवा को एक जैसा जवाब नहीं देता।

अगर आगे के अध्ययन इन आनुवंशिक रास्तों की भूमिका को और स्पष्ट करते हैं, तो भविष्य में इलाज बीमारी के नाम के साथ-साथ मरीज की जैविक और आनुवंशिक विशेषताओं के आधार पर चुना जा सकता है।

यहां समझें पूरा अध्ययन

इस अध्ययन में सामने आया है कि खासतौर पर उम्र बढ़ने के साथ ही महिलाओं में पुरुषों की तुलना में इम्यून सिस्टम में कहीं ज्यादा बदलाव देखे गए। नेचर एजिंग में प्रकाशित इस इस शोघ में उन सेल्स और जीन्स की पहचान की गई, जो यह बताते हैं कि, पुरुष और महिला में इम्यून सिस्टम की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी अलग-अलग तरह से होता है। जबकि इससे पहले इसे सिर्फ आबादी के स्तर पर ही देखा गया था।

इस तरह, नतीजों से पता चलता है कि उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं के इम्यून सिस्टम में ज्यादा साफ बदलाव आते हैं, जिसमें इन्फ्लेमेटरी इम्यून सेल्स की संख्या बढ़ जाती है। यह जानकारी यह समझने में मदद कर सकती है कि ऑटोइम्यून बीमारियां ज्यादातर महिलाओं को क्यों होती हैं, खासकर उम्र बढ़ने के दौरान और मेनोपॉज के बाद कुछ इन्फ्लेमेटरी बीमारियां क्यों बिगड़ जाती हैं।

दूसरी ओर पुरुषों में इम्यून सिस्टम की उम्र बढ़ने से जुड़े बदलाव कम देखे गए। इशके विपरीत कुछ ब्लड सेल्स में प्री-ल्यूकेमिया जैसे बदलाव देखने को मिले। इससे यह समझा जा सकता है कि ज्यादा उम्र के पुरुषों में कुछ तरह के ब्लड कैंसर ज्यादा क्यों होते हैं?

अध्ययन है बड़ा सबक

ये पैटर्न अलग-अलग उम्र के लगभग 1,000 लोगों (जिनमें वयस्क जीवन के सभी पड़ाव शामिल थे) के ब्लड सैंपल के एनालिसिस और 'सिंगल-सेल RNA सीक्वेंसिंग' जैसी टेक्नोलॉजी (जो हर सेल का अलग-अलग एनालिसिस कर सकती है) की मदद से पता लगाए जा सके। कुल मिलाकर, रिसर्चर्स ने दस लाख से ज्यादा ब्लड सेल्स में 20,000 जीन्स की एक्टिविटी का एनालिसिस किया, जिससे उन्हें यह समझने में भी मदद मिली कि बढ़ती उम्र के साथ इम्यून सिस्टम कैसे बदलता है?

यह भी पता चला कि महिला और पुरुष का शरीर सिर्फ दिखने में अलग नहीं है, उसकी कोशिकाओं के काम करने का तरीका भी कई स्तरों पर अलग हो सकता है। और शायद आने वाले समय की चिकित्सा में 'एक बीमारी, एक इलाज' के बजाय 'एक मरीज, उसके शरीर के मुताबिक इलाज' सिद्धांत ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए।