Patrika+

बेटियां बनीं रोल मॉडल, राजस्थान में जूडो का नया स्वर्णिम दौर, युवाओं ने गाड़े झंडे

राजस्थान में जूडो का स्वर्णिम दौर: जूनियर नेशनल चैंपियनशिप से लेकर सीनियर प्रतियोगिताओं तक, राज्य के युवा और महिला खिलाड़ियों ने रचा इतिहास। जानिए सफलता की पूरी कहानी।
5 min read
Aug 22, 2026
jUDO PLAYER
जूडो में राजस्थान का डंका (AI)

राजस्थान की पहचान हमेशा से शौर्य, साहस और जुझारूपन की भूमि के रूप में रही है। पारंपरिक रूप से जहां राजस्थान की माटी कुश्ती, तीरंदाजी और घुड़सवारी जैसे खेलों से पहचानी जाती थी, वहीं आज राज्य के युवा आधुनिक मार्शल आर्ट्स विशेषकर जूडो (Judo) में पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं।

हाल के वर्षों में राजस्थान के जूडो परिदृश्य में एक अभूतपूर्व क्रांति देखने को मिली है। कस्बों और गांवों से निकलकर खिलाड़ी अब न केवल राज्य स्तरीय बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय तातामी (जूडो मैट) पर अपनी तकनीकी श्रेष्ठता और मानसिक दृढ़ता का लोहा मनवा रहे हैं। कोलकाता से लेकर दिल्ली और हैदराबाद तक, राजस्थान के जूडोकाओं का दबदबा यह साबित कर रहा है कि यदि प्रतिभा को सही दिशा और हौसला मिले, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।

राष्ट्रीय फलक पर स्वर्णिम चमक

राजस्थान के जूडो इतिहास में हालिया समय स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हाल ही में कोलकाता में आयोजित जूनियर नेशनल जूडो चैंपियनशिप में देखने को मिला, जहां राजस्थान की पुरुष टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ओवरऑल टीम चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया। देश के दिग्गज राज्यों को पछाड़कर यह खिताब जीतना राज्य के खेल ढांचे और युवा खिलाड़ियों के कड़े अभ्यास का प्रत्यक्ष परिणाम है। इसके साथ ही, दिल्ली में आयोजित सीनियर राष्ट्रीय जूडो प्रतियोगिता में भी राजस्थान का परचम शान से लहराया।

मोनिका चौधरी: 48 किलोग्राम भार वर्ग में अपने तेज आक्रमण और सटीक तकनीक के दम पर स्वर्ण पदक (Gold Medal) जीतकर प्रदेश का नाम रोशन किया।

हिमांशु चौधरी: 60 किलोग्राम भार वर्ग में कड़े मुकाबले के बाद रजत पदक (Silver Medal) जीतकर अपनी प्रतिभा साबित की।

सीनियर वर्ग में दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीतना यह दर्शाता है कि राज्य के खिलाड़ी अब केवल भाग लेने नहीं, बल्कि पोडियम पर शीर्ष स्थान हासिल करने के इरादे से उतरते हैं।

जमीनी स्तर पर प्रतिभा की खोज: भीलवाड़ा, टोंक और भरतपुर का जलवा

किसी भी खेल की मजबूती उसकी जड़ों में होती है। राजस्थान में जूडो केवल जयपुर या बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छोटे जिलों और कस्बों में इसका आधार बेहद मजबूत हुआ है।

  • भीलवाड़ा का दबदबा: सोड़ा (टोंक) में आयोजित सब-जूनियर राज्य स्तरीय जूडो प्रतियोगिता में भीलवाड़ा के खिलाड़ियों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। जिले ने कुल 7 स्वर्ण, 5 रजत और 2 कांस्य पदक जीतकर "राजस्थान ऑल-विजेता बालक/बालिका चैंपियनशिप" की ट्रॉफी पर कब्जा जमाया। यह प्रदर्शन बताता है कि जिला स्तर पर ग्रासरूट कोचिंग कितनी प्रभावी हो चुकी है।
  • भरतपुर की बेटी अपनी सिंह का कमाल: भरतपुर की प्रतिभावान खिलाड़ी अपनी सिंह ने 48 किग्रा भार वर्ग में राज्य स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर राष्ट्रीय सब-जूनियर टीम में जगह बनाई और हैदराबाद में राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व किया।
  • स्कूल और जिला स्तर की प्रतिस्पर्धा: उदयपुर में आयोजित 69वीं जिला स्तरीय कुश्ती और जूडो प्रतियोगिता में विभिन्न विद्यालयों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसमें पुरुष वर्ग में डी.पी.एस. और महिला वर्ग में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय (कनारपुर) ने प्रथम स्थान प्राप्त कर यह साबित किया कि सरकारी और निजी दोनों स्कूलों में खेल प्रतिभाएं निखर रही हैं।

'दंगल' से आगे: जूडो में बेटियों का बढ़ता दबदबा

राजस्थान जैसे पारंपरिक समाज में खेल के मैदान पर बेटियों की बढ़ती भागीदारी एक सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। जूडो जैसे शारीरिक और तकनीकी खेल में लड़कियों का आगे आना न केवल आत्मरक्षा (Self-Defense) के प्रति जागरूकता बढ़ाता है, बल्कि उन्हें एक सशक्त पहचान भी दे रहा है।

मोनिका चौधरी और अपनी सिंह जैसी खिलाड़ी आज राज्य की हजारों बालिकाओं के लिए रोल मॉडल बन चुकी हैं। स्कूल और सब-जूनियर स्तर पर लड़कियों के वर्ग में मिलने वाले पदकों की संख्या यह दर्शाती है कि आने वाले समय में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान की महिला जूडोका भारत का गौरव बढ़ाएंगी।

राजस्थान स्टेट जूडो एसोसिएशन (RSJA) की सक्रियता

खिलाड़ियों की मेहनत को मंच तभी मिलता है जब खेल संघ पारदर्शी और सक्रिय हों। राजस्थान स्टेट जूडो एसोसिएशन (RSJA), अध्यक्ष श्री हरीश चंद्र शर्मा और महासचिव महिपाल ग्रेवाल के नेतृत्व में, राज्य में खेल के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

पारदर्शी चयन प्रक्रिया: भीलवाड़ा और अन्य जिलों में समय-समय पर सीनियर और जूनियर ओपन चयन ट्रायल्स का आयोजन किया जा रहा है, जिससे दूर-दराज के प्रतिभावान खिलाड़ियों को भी बिना किसी भेदभाव के राष्ट्रीय टीम में जगह मिल रही है।

नियमित प्रतियोगिताएं: राज्य भर में नियमित प्रतियोगिताओं के आयोजन से खिलाड़ियों को मैच-टेंपरामेंट और दबाव में खेलने का अनुभव मिल रहा है।

मिट्टी की खुशबू से मैट के अनुशासन तक

राजस्थान के अधिकांश जूडो खिलाड़ी मध्यमवर्गीय या ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। इनके रास्ते में चुनौतियां कम नहीं थीं:

  • संसाधनों का अभाव: शुरुआत में कई जिलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के जूडो मैट (तातामी) और प्रॉपर जूडोगी (ड्रेस) की कमी रही। खिलाड़ियों ने मिट्टी के अखाड़ों और साधारण गद्दों पर तकनीक का अभ्यास किया।
  • आर्थिक बाधाएं: महंगे डाइट चार्ट, सप्लीमेंट्स और राष्ट्रीय टूर्नामेंट्स की यात्रा का खर्च उठाना कई परिवारों के लिए चुनौती रहा है, लेकिन माता-पिता के त्याग और स्थानीय कोचों के निस्वार्थ समर्पण ने इन बाधाओं को पार कराया।
  • खेल विज्ञान और रिकवरी: आधुनिक खेल विज्ञान और फिजियोथेरेपी की सीमित पहुंच के बावजूद खिलाड़ियों ने देसी खान-पान, पारंपरिक शक्ति संवर्धन और अनुशासन के बल पर राष्ट्रीय स्तर के एथलीटों को मात दी।

युवा एथलीटों के लिए सीख

राजस्थान के इन जूडो चैंपियंस का सफर हर उस युवा के लिए एक रोडमैप है जो खेल में अपना करियर बनाना चाहता है।

  • संसाधनों की कमी को बहाना न बनाएं: लगन और नियमित अभ्यास से किसी भी बड़े प्रतिद्वंद्वी को हराया जा सकता है।
  • जिला और राज्य स्तर पर अपनी पहचान बनाएं: सीधे बड़े मंच का सपना देखने से पहले स्थानीय स्तर की हर प्रतियोगिता में अपना सर्वश्रेष्ठ दें।
  • तकनीक और मानसिक संतुलन: जूडो केवल ताकत का खेल नहीं, बल्कि संतुलन और रणनीति (Leverage & Timing) का खेल है।
  • एसोसिएशन के ट्रायल्स पर नजर रखें: अपने जिले और राज्य के आधिकारिक ट्रायल्स की जानकारी रखें और समय पर प्रतिभाग करें।
  • महिला सशक्तिकरण का माध्यम: जूडो लड़कियों के लिए आत्मरक्षा के साथ-साथ करियर और सम्मान का बेहतरीन जरिया है।

राजस्थान को जूडो की नर्सरी कैसे बनाएं?

राजस्थान में जूडो का भविष्य बेहद उज्ज्वल है, लेकिन इस गति को बनाए रखने के लिए कुछ ठोस कदमों की आवश्यकता है।

  • तहसील स्तर पर आधुनिक हॉल: हर जिले और प्रमुख तहसीलों में अंतरराष्ट्रीय मानकों वाले जूडो हॉल और मैट उपलब्ध कराए जाएं।
  • स्पोर्ट्स साइंस व न्यूट्रिशन सपोर्ट: पदक विजेता खिलाड़ियों को विशेष न्यूट्रिशन और इंजरी मैनेजमेंट (फिजियो) की सुविधा मिले।
  • सरकारी प्रोत्साहन व नौकरियां: राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले जूडो खिलाड़ियों को आउट-ऑफ-टर्न नियुक्तियां और वित्तीय सहायता सुनिश्चित की जाए ताकि वे आर्थिक चिंताओं से मुक्त होकर 2028 और 2032 के ओलंपिक का लक्ष्य रख सकें।
  • स्कूलों में अनिवार्य प्रशिक्षण: खासकर बालिकाओं के लिए स्कूलों में जूडो और आत्मरक्षा का प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।

राजस्थान के जूडो खिलाड़ियों ने यह साबित कर दिया है कि "हौसलों के तरकश में जब मेहनत का तीर होता है, तो हर मुकाबला फतह होता है।" कोलकाता में टीम चैंपियनशिप की ट्रॉफी हो या दिल्ली में चमचमाते पदक, यह केवल शुरुआत है। यदि इसी तरह खिलाड़ियों का जज्बा, कोचों की लगन और एसोसिएशन का समर्थन जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब ओलंपिक के पोडियम पर राजस्थान का कोई लाल या लाडली तिरंगा लहराते हुए नजर आएंगे।

Updated on:
22 Aug 2026 01:58 pm
Published on:
22 Aug 2026 01:58 pm