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दक्षिण भारत परिसीमन से क्यों डर रहा है? उत्तर भारत की आबादी बढ़ने का संसद पर क्या असर होगा?

Delimitation North vs South India Impact : जानिए क्यों परिसीमन को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच बहस छिड़ी है? आबादी नियंत्रण और संसदीय प्रतिनिधित्व के इस गणित तथा इसके राजनीतिक असर को समझें।
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Delimitation Controversy

Delimitation Controversy : परिसीमन से दक्षिण भारत चिंतित क्यों?, PC- Chatgpt

भारत में परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। सवाल सिर्फ लोकसभा की सीटें बढ़ने का नहीं है, बल्कि यह है कि आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण हुआ तो संसद में किस क्षेत्र का राजनीतिक वजन बढ़ेगा और किसका घटेगा?

यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 1976 के बाद लोकसभा में राज्यों की सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर प्रभावी रूप से स्थिर रखा गया। 2001 के 84वें संविधान संशोधन ने इस रोक को पहली जनगणना के बाद 2026 तक बढ़ाया था। इसका एक उद्देश्य राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित करना भी था। अब यही सवाल सामने है...जिस राज्य ने आबादी नियंत्रित की, क्या उसे संसद में इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा?

परिसीमन क्या होता है?

परिसीमन यानी लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का पुनर्निर्धारण। इसका मूल सिद्धांत यह है कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में आबादी लगभग समान हो और राज्यों को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले। मौजूदा व्यवस्था में राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का वितरण 1971 की जनगणना से जुड़ा हुआ है। लेकिन अगला परिसीमन होने पर यह तस्वीर बदल सकती है।

यही वजह है कि दक्षिणी राज्यों की चिंता केवल सीटों की संख्या को लेकर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में उनके हिस्से को लेकर है।

उत्तर भारत की आबादी ज्यादा बढ़ी, दक्षिण ने नियंत्रित की

पिछले पांच दशकों में उत्तर भारत के कई राज्यों की आबादी दक्षिणी राज्यों की तुलना में तेजी से बढ़ी। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत ज्यादा रही, जबकि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों ने प्रजनन दर कम करने में काफी प्रगति की।

इसका एक राजनीतिक विरोधाभास सामने आता है। दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को ज्यादा प्रभावी तरीके से लागू किया। लेकिन अगर भविष्य में लोकसभा सीटें मुख्य रूप से आबादी के अनुपात में बांटी जाती हैं, तो कम आबादी वाले राज्यों की संसद में हिस्सेदारी घट सकती है। यही वह बिंदु है जिसे दक्षिणी राज्य उठा रहे हैं।

यूपी-बिहार को कितना फायदा हो सकता है?

2026 में पेश किए गए परिसीमन संबंधी विधेयकों में 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों के संभावित पुनर्वितरण का एक अनुमान दिया गया था। अगर लोकसभा की मौजूदा 543 सीटें ही रहतीं, तो 2011 की आबादी के आधार पर अनुमानित बदलाव कुछ इस तरह होता:

राज्यवर्तमान सीटेंअनुमानित सीटें
उत्तर प्रदेश8089
बिहार4046
राजस्थान2530
तमिलनाडु3932
केरल2015
कर्नाटक2826
आंध्र प्रदेश2523

यह केवल 2011 की जनगणना पर आधारित एक प्रक्षेपण था, अंतिम परिसीमन नहीं। PRS के विश्लेषण के मुताबिक मौजूदा सीट संख्या में बदलाव न होने की स्थिति में उत्तर प्रदेश को 9 और बिहार को 6 सीटों का फायदा होता, जबकि तमिलनाडु को 7 और केरल को 5 सीटों का नुकसान होता।

यानी डर का आधार केवल राजनीतिक बयान नहीं है। आबादी के अनुपात पर सीटें बांटने से वास्तव में उत्तर भारत का वजन बढ़ सकता है।

लेकिन सरकार का तर्क क्या है?

केंद्र सरकार का तर्क बिल्कुल अलग है। सरकार ने 2026 में जो प्रस्ताव रखा था, उसमें लोकसभा की सीटों की अधिकतम संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने और राज्यों के लिए अधिकतम 815 सीटों का प्रावधान करने की बात थी। सरकार का दावा था कि अगर सीटों में लगभग 50 प्रतिशत की समान वृद्धि की जाती है, तो दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ेंगी और उनका कुल प्रतिशत लगभग वही रहेगा।

गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा था कि दक्षिण भारत के मौजूदा 129 सांसद बढ़कर लगभग 195 हो सकते हैं और कुल लोकसभा में दक्षिण का हिस्सा करीब 24 प्रतिशत के आसपास बना रहेगा।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है। यह प्रस्ताव कानून नहीं बन सका। संविधान संशोधन विधेयक 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका और खारिज हो गया। उससे जुड़े परिसीमन विधेयक पर भी आगे कार्रवाई नहीं हुई। संसद की मौजूदा स्थिति में Delimitation Bill, 2026 लंबित/अप्रभावी स्थिति में दर्ज है। इसलिए 2026 के प्रस्तावित आंकड़ों को अंतिम सीट बंटवारा बताना गलत होगा।

दक्षिण भारत की असली चिंता क्या है?

दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण को सजा नहीं मिलनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर अगर तमिलनाडु ने जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित की और उत्तर प्रदेश की आबादी तेजी से बढ़ी, तो सिर्फ आबादी के आधार पर संसद की सीटें बदलने से तमिलनाडु का प्रति सांसद राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

यानी सवाल बनता है:

क्या एक सांसद को कम आबादी वाले राज्य में ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए और दूसरे राज्य में कम?

संवैधानिक लोकतंत्र में इसका जवाब आसान नहीं है। एक तरफ ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का सिद्धांत है। दूसरी तरफ संघीय ढांचे में राज्यों की राजनीतिक आवाज को संतुलित रखने की चिंता है। यही दोनों सिद्धांत परिसीमन की बहस को जटिल बनाते हैं।

सिर्फ लोकसभा नहीं, राज्यसभा पर भी असर?

लोकसभा में सीटों का पुनर्वितरण सीधे राजनीतिक शक्ति को प्रभावित करेगा। ज्यादा लोकसभा सीट का मतलब सरकार बनाने के लिए ज्यादा सांसदों की जरूरत वाले बड़े राज्यों का महत्व बढ़ना हो सकता है। इसका असर केंद्र की राजनीति पर पड़ेगा।

आज उत्तर प्रदेश के पास 80 लोकसभा सीटें हैं। अगर भविष्य में उसकी सीटें और बढ़ती हैं, तो किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए यूपी का महत्व और बढ़ सकता है। बिहार की सीटें बढ़ती हैं तो बिहार की राजनीतिक ताकत भी बढ़ेगी।

इसके उलट अगर तमिलनाडु या केरल की कुल सीटों में हिस्सेदारी कम होती है, तो राष्ट्रीय सरकार बनाने में दक्षिणी राज्यों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत अपेक्षाकृत घट सकती है।

हालांकि राज्यसभा का ढांचा अलग है और वहां राज्यों को लोकसभा जैसी आबादी-आधारित सीट संख्या नहीं मिलती।

‘जिसने आबादी नियंत्रित की, उसे नुकसान?’ वाली बहस

यही इस पूरे विवाद का सबसे राजनीतिक सवाल है। दक्षिणी राज्यों का कहना है कि उन्होंने परिवार नियोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में निवेश किया। अगर अब आबादी कम होने के कारण उनका संसदीय प्रतिनिधित्व घटता है, तो राज्यों को भविष्य में जनसंख्या नियंत्रण के लिए क्या प्रोत्साहन मिलेगा? दूसरी तरफ उत्तर भारत का तर्क भी है।

अगर किसी राज्य की आबादी बहुत ज्यादा है, लेकिन उसके लोगों का प्रतिनिधित्व कम सीटों से हो रहा है, तो क्या यह लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है? यानी दोनों पक्षों के पास अपने-अपने तर्क हैं।

2027 की जनगणना से तस्वीर और महत्वपूर्ण होगी

भारत में जनगणना 2027 की प्रक्रिया चल रही है। सरकार के मुताबिक जनसंख्या गणना के दूसरे चरण में जाति की गणना भी की जाएगी। लेकिन, परिसीमन के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होगा, किस जनगणना को आधार बनाया जाएगा और सीटों का नया फार्मूला क्या होगा?

2026 में पेश प्रस्ताव में 2011 की जनगणना को अगले परिसीमन के लिए आधार बनाने की व्यवस्था थी, लेकिन वह संवैधानिक संशोधन पास नहीं हो सका। इसलिए आगे की राजनीति में जनसंख्या, प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन तीनों मुद्दे एक साथ दिखाई देंगे।

तो दक्षिण भारत को कितना नुकसान हो सकता है?

इसका अभी कोई अंतिम आंकड़ा नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य में:

  • लोकसभा की कुल सीटें कितनी रखी जाती हैं?
  • राज्यों के बीच सीटों का फार्मूला क्या होगा?
  • किस जनगणना को आधार बनाया जाएगा?
  • क्या कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की हिस्सेदारी सुरक्षित रखने का कोई तरीका निकाला जाएगा?
  • महिला आरक्षण और परिसीमन को किस तरह लागू किया जाएगा?

इसलिए अभी यह कहना कि 'दक्षिण की सीटें निश्चित रूप से आधी हो जाएंगी' या 'उत्तर भारत सारी सीटें ले जाएगा', तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। असली लड़ाई सीटों की नहीं, राजनीतिक ताकत की है

परिसीमन की बहस को सिर्फ उत्तर बनाम दक्षिण कहना अधूरा होगा। असली सवाल है कि भारत अपने लोकतंत्र में दो चीजों का संतुलन कैसे बनाएगा, आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व और राज्यों के बीच संघीय संतुलन।

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों की आबादी ज्यादा है, इसलिए आबादी आधारित प्रतिनिधित्व लागू होने पर उनका संसदीय वजन बढ़ने की संभावना है। दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, इसलिए वे चाहते हैं कि इसके कारण उनकी राजनीतिक आवाज कमजोर न हो। यही कारण है कि परिसीमन आने वाले वर्षों में भारत की सबसे बड़ी संघीय और राजनीतिक बहसों में से एक बन सकता है।

और सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा

क्या भारत का अगला राजनीतिक नक्शा आबादी के हिसाब से बनेगा, या ऐसा फार्मूला निकलेगा जिसमें जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी भी सुरक्षित रहे?