
राजस्थानी थाली में फाइबर का वह जादू है, जो आपके पाचन को सहज बनाता है और लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखता है। साथ ही ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से बचाता है। आइए जानें कि राजस्थान की पारंपरिक रसोई में फाइबर कैसे शामिल है, क्यों जरूरी है और इसे अपनी थाली में कैसे शामिल करें।
राजस्थान की पारंपरिक रसोई में बाजरा (Pearl millet), ज्वार, रागी, और फॉक्सटेल मिलेट जैसे मोटे अनाज प्रमुख हैं। ये अनाज फाइबर के साथ-साथ कैल्शियम, आयरन और अन्य पोषक तत्वों से भी भरपूर होते हैं। इसके अलावा, थार के रेगिस्तानी इलाके में मिलने वाले जंगलों के फल जैसे सांगरी (Sangri), बेर (Ber), गंगरी (Gangeri), और चौलाई (Amaranthus) की पत्तियां भी फाइबर और विटामिन-खनिजों का अच्छा स्रोत हैं।
राष्ट्रीय पोषण संस्थान (ICMR-NIN) के अनुसार, भारत में फाइबर की खपत सुझाए गए स्तर से कम है। राजस्थान की शहरी महिलाओं में फाइबर, आयरन और फोलेट की कमी देखी गई है। यह कमी विशेष रूप से उत्तर भारत में गंभीर है, जहां पारंपरिक आहार में फाइबर की मात्रा कम हो सकती है।
ICMR-NIN की 2020 की दिशानिर्देशों के अनुसार, एक सामान्य वयस्क पुरुष (मध्यम गतिविधि) को लगभग 40 ग्राम फाइबर प्रतिदिन की आवश्यकता होती है, जबकि महिलाएं लगभग 30 ग्राम तक ले सकती हैं। फाइबर से पाचन सुधरता है, कब्ज दूर होती है, ब्लड शुगर नियंत्रण में रहता है और हृदय रोग का जोखिम कम होता है।
राजस्थान के पारंपरिक खाद्य पदार्थ जैसे पंचकुट्टा (Ker, Sangri, Kumatiya, Gunda, Kachri) में फाइबर की मात्रा 17.2 ग्राम प्रति 100 ग्राम है। जंगलों के फल जैसे सांगरी में फाइबर 16–34 ग्राम प्रति 100 ग्राम तक होता है, जो इसे बेहद पौष्टिक बनाता है।
फाइबर का सेवन पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है। यह कब्ज को दूर करता है और पेट की समस्याओं को कम करता है। इसके अलावा, फाइबर ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करता है, जिससे डायबिटीज का खतरा कम होता है। फाइबर युक्त आहार हृदय रोगों के जोखिम को भी कम करता है।
यदि कब्ज, पेट फूलना या ब्लड शुगर में अस्थिरता जैसी समस्याएं हैं, तो डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ से सलाह लें। फाइबर की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाएं और पर्याप्त पानी पिएं, ताकि पाचन सहज रहे।
(डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ की सलाह का विकल्प नहीं।)