
राजस्थानी भाषा को उसका वाजिब हक और संवैधानिक मान्यता दिलाने का दशकों पुराना संघर्ष अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर एक निर्णायक मोड़ ले चुका है। मायड़ भाषा के पैरोकारों की ओर से छेड़ी गई इस कानूनी लड़ाई ने राजस्थानी भाषा को एक नई संजीवनी दी है। राजस्थान हाईकोर्ट से निराशा हाथ लगने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे इस मामले में अदालत ने भाषा प्रेमियों के पक्ष में एक अभूतपूर्व फैसला सुनाया है। अब राज्य सरकार को अपने अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट और हलफनामा पेश करना है, लेकिन इसी बीच प्रदेश में नगर निकाय चुनाव की आचार संहिता लागू होने से इस बहुप्रतीक्षित मामले में एक नया पेच फंस गया है।
इस पूरे विवाद की जड़ें शिक्षा और मातृभाषा के जुड़ाव से निकलती हैं। पदम मेहता और डॉ. कल्याणसिंह शेखावत ने सबसे पहले राजस्थान हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर मांग की थी कि राजस्थान अध्यापक पात्रता परीक्षा (REET) के पाठ्यक्रम में राजस्थानी भाषा को शामिल किया जाए और बच्चों को प्राथमिक शिक्षा स्थानीय भाषा में दी जाए। उनकी दलील थी कि 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में 4.36 करोड़ से अधिक लोग राजस्थानी बोलते हैं। इसके बावजूद इसे शिक्षक पात्रता परीक्षा से बाहर रखा गया है, जबकि पंजाबी, गुजराती, सिंधी और उर्दू जैसी भाषाओं को इसमें जगह मिली हुई है। राजस्थान हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि राजस्थानी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है, इसलिए अदालत राज्य सरकार को इसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ दोनों याचिकाकर्ताओं ने हार नहीं मानी और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने जो फैसला सुनाया, वह राजस्थानी भाषा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी बच्चे का अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना केवल एक सुविधा नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है।
सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से यह तकनीकी दलील दी गई थी कि शिक्षा केवल संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में ही दी जा सकती है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का हवाला देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह मातृभाषा में शिक्षा देने के लिए एक व्यापक नीति तैयार करे।
अब जब राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की पालना में राजस्थानी को मान्यता देने और शिक्षा के माध्यम के रूप में लागू करने की रूपरेखा अदालत के समक्ष पेश करनी थी, तभी बीच में प्रदेश में नगर निकाय चुनाव की आचार संहिता लागू हो गई है। निर्वाचन आयोग के स्पष्ट नियमों के अनुसार, आचार संहिता प्रभाव में रहने तक राज्य सरकार कोई भी नई नीतिगत घोषणा, योजना का ऐलान या ऐसा कोई बड़ा प्रशासनिक फैसला नहीं ले सकती, जिससे मतदाता सीधे तौर पर प्रभावित होते हों।
उल्लेखनीय है कि राजस्थानी भाषा को शिक्षा में लागू करने या नीति बनाने का फैसला करोड़ों प्रदेशवासियों की भावनाओं और वोट बैंक से सीधा जुड़ा हुआ है। ऐसे में कानूनी और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई में आचार संहिता का हवाला दे सकती है। सरकार अदालत से यह गुजारिश कर सकती है कि चुनाव संपन्न होने तक उसे नई नीति का हलफनामा पेश करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाए। इससे मामले के अंतिम समाधान में थोड़ी और देरी होने की आशंका बन गई है।
गौरतलब है कि राजस्थानी भाषा का उद्भव 11वीं सदी में माना जाता है और इसका अपना एक बहुत समृद्ध साहित्य व व्याकरण है। संविधान की ओर से मान्यता प्राप्त कई भाषाएं राजस्थानी से छोटी हैं, फिर भी इसे उचित दर्जा न मिलना स्थानीय युवाओं के साथ भेदभाव रहा है। अब प्रदेशवासियों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि आचार संहिता की बंदिशों के बीच राज्य सरकार अदालत में क्या रुख अपनाती है और अदालत इस देरी पर क्या टिप्पणी करती है। याचिकाकर्ताओंका यह संघर्ष अब राजस्थानी अस्मिता का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है, जो अपनी तार्किक परिणति की ओर बढ़ रहा है। उम्मीद जागी है कि अब राजस्थानी भाषा केमहान साहित्यकारों विजयदान देथा 'बिज्जी', कन्हैयालाल सेठिया और डॉ.शक्तिदान कविया की भाषा 'राजस्थानी' अब संवैधानिक मान्यता मिलने की ओर अग्रसर है।