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भारत के पास जमीन के नीचे खजाना है, फिर भी चिप-सेमीकंडक्टर के लिए बाहर क्यों देखना पड़ता है? Rare Earth की पूरी कहानी

Rare Earth Elements Supply Chain India : भारत के पास मोनाजाइट और रेयर अर्थ का विशाल भंडार होने के बावजूद सेमीकंडक्टर और हाई-टेक उत्पादों के लिए विदेशों पर क्यों निर्भर रहना पड़ता है? जानें माइनिंग से लेकर प्रोसेसिंग तकनीक और सप्लाई चेन की पूरी कहानी।
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Aug 24, 2026
Rare Earth Elements Supply Chain India
Rare Earth Elements Supply Chain India : rare earth मिनरल निकालना कितना कठिन, PC- Chatgpt

भारत आज सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, ड्रोन, मिसाइल, रोबोट, पवन टरबाइन और हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स का बड़ा केंद्र बनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इन उद्योगों की नींव सिर्फ चिप फैक्ट्री नहीं है। इसके पीछे Rare Earth Elements और Critical Minerals की पूरी आपूर्ति शृंखला चाहिए। यहीं भारत की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है।

भारत के पास खनिज संसाधन हैं, लेकिन खदान से निकलने वाले अयस्क को उच्च शुद्धता वाले रसायन, धातु, मिश्रधातु, चुंबक और सेमीकंडक्टर-ग्रेड सामग्री में बदलने की क्षमता अभी सीमित है और यही वजह है कि जमीन के नीचे संसाधन होने के बावजूद भारत को कई हाई-टेक उत्पादों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

Rare Earth Elements आखिर होते क्या हैं?

Rare Earth Elements यानी REE कुल 17 तत्वों का समूह है। इनमें नियोडिमियम, प्रसीओडिमियम, डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे तत्व खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। इनका इस्तेमाल हाई-परफॉर्मेंस स्थायी चुंबकों में होता है। इन चुंबकों की जरूरत इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटर, पवन टरबाइन, औद्योगिक मोटर, ड्रोन, रोबोट, हार्ड डिस्क, रक्षा उपकरण, कुछ हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स में पड़ती है।

लेकिन एक जरूरी बात समझना जरूरी है हर सेमीकंडक्टर Rare Earth से नहीं बनता। चिप उद्योग में सिलिकॉन के साथ गैलियम, जर्मेनियम, इंडियम, टैंटलम, हाई-प्योरिटी सामग्री जैसे कई Critical Minerals की भूमिका है। भारत की 30 Critical Minerals की सूची में REE के साथ गैलियम, जर्मेनियम, सिलिकॉन, टैंटलम, टंग्स्टन, लिथियम, कोबाल्ट आदि शामिल हैं। इसलिए असली कहानी सिर्फ Rare Earth की नहीं, Critical Mineral Value Chain की है।

भारत के पास कितना Rare Earth है?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 तक भारत में 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट संसाधन पहचाना गया है, जिसमें लगभग 7.23 मिलियन टन Rare Earth Oxide equivalent है। ये संसाधन मुख्यतः आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय या अन्य बालू क्षेत्रों में हैं।

इसके अलावा गुजरात और राजस्थान के हार्ड-रॉक क्षेत्रों में करीब 1.29 मिलियन टन REO equivalent संसाधन की पहचान हुई है। यानी भारत के पास संसाधन की कमी नहीं है। समस्या आगे शुरू होती है।

चीन का दबदबा इतना बड़ा क्यों है?

Rare Earth की असली ताकत खदान में नहीं, प्रोसेसिंग और आगे के उत्पादों में है। IEA के 2026 के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में चीन ने दुनिया के magnet rare earths के करीब 60% का खनन किया, लेकिन refining में उसकी हिस्सेदारी करीब 91% और permanent magnet production में करीब 94% थी। यानी चीन सिर्फ खनिज निकालने वाला देश नहीं है। उसने पूरी औद्योगिक श्रृंखला खड़ी कर ली है।

खदान → अयस्क → अलग-अलग Rare Earth Oxides → धातु → मिश्रधातु → चुंबक → मोटर/उत्पाद। इस पूरी सीढ़ी पर चीन की मजबूत पकड़ है। यही भारत के लिए असली चुनौती है।

खदान से मोबाइल या EV तक पहुंचने में कितने चरण होते हैं?

इसे एक आसान उदाहरण से समझिए।

  • पहला चरण—खनन: जमीन या समुद्र के किनारे से अयस्क निकाला जाता है।
  • दूसरा—Beneficiation: अयस्क को तोड़कर और अलग करके उपयोगी खनिज की मात्रा बढ़ाई जाती है।
  • तीसरा—Chemical Processing: मिश्रित Rare Earth को रासायनिक प्रक्रिया से अलग किया जाता है।
  • चौथा—Separation: नियोडिमियम, प्रसीओडिमियम, डिस्प्रोसियम जैसे अलग-अलग तत्वों को अलग किया जाता है।
  • पांचवां—Refining: इन्हें उच्च शुद्धता वाले ऑक्साइड या धातु में बदला जाता है।
  • छठा—Alloy और Magnet: धातुओं से विशेष मिश्रधातु और फिर स्थायी चुंबक बनता है।
  • सातवां—Manufacturing: यही चुंबक EV मोटर, ड्रोन, रोबोट, विंड टरबाइन या दूसरे उपकरण में जाता है।

IEA भी Rare Earth value chain को extraction से beneficiation, separation, refining, alloying और magnet manufacturing तक कई तकनीकी चरणों वाली प्रक्रिया बताता है। यानी खदान खोलना पूरी कहानी का सिर्फ पहला अध्याय है।

भारत अयस्क निकालकर वहीं रुक जाता है?

पूरी तरह नहीं, लेकिन भारत की क्षमता चीन की तुलना में काफी पीछे है। भारत Rare Earth minerals के मामले में आत्मनिर्भरता की दिशा में काम कर रहा है। सरकार का कहना है कि देश Rare Earth minerals के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं है, लेकिन Rare Earth magnets और संबंधित उत्पादों के लिए आयात पर निर्भरता है। इसकी एक वजह भारतीय संसाधनों का अपेक्षाकृत कम grade—करीब 0.056%-0.058%—और radioactivity से जुड़ी जटिलता है।

मोनाजाइट में Rare Earth के साथ थोरियम भी होता है। इसलिए इसकी processing सामान्य खनिज की तुलना में अधिक जटिल और महंगी हो सकती है। यही कारण है कि संसाधन मौजूद होना और आर्थिक रूप से बड़े पैमाने पर उत्पादन करना दो अलग बातें हैं।

सेमीकंडक्टर के लिए भारत को बाहर क्यों देखना पड़ता है?

यहां भी सिर्फ Rare Earth को दोष देना सही नहीं होगा। सेमीकंडक्टर उद्योग में अत्यंत शुद्ध सिलिकॉन, विशेष रसायन, गैसें और कुछ Critical Minerals की जरूरत होती है। भारत की 30 Critical Minerals सूची में गैलियम को सेमीकंडक्टर और Integrated Circuits के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है, जबकि जर्मेनियम का इस्तेमाल ऑप्टिकल फाइबर, सैटेलाइट और सोलर सेल में होता है।

उदाहरण के लिए भारत के Critical Minerals Committee ने बताया था कि गैलियम एल्यूमिना उत्पादन के दौरान उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त किया जा सकता है, और देश में इसकी recovery की क्षमता पर दोबारा काम करने की जरूरत है। जर्मेनियम के लिए भारत की जरूरत आयात से पूरी होती है।

इसलिए चिप बनाने की चुनौती सिर्फ 'खनिज है या नहीं' नहीं है। सवाल है- क्या हमारे पास semiconductor-grade material बनाने की तकनीक और औद्योगिक क्षमता है?

अगर चीन सप्लाई रोक दे तो क्या होगा?

इसका असर सबसे पहले उन उद्योगों पर पड़ सकता है जिन्हें Rare Earth permanent magnets और संबंधित सामग्री की जरूरत है। सबसे संवेदनशील क्षेत्र होंगे-

  • EV और ऑटोमोबाइल: मोटर और दूसरे इलेक्ट्रिक सिस्टम।
  • पवन ऊर्जा: हाई-परफॉर्मेंस जनरेटर।
  • ड्रोन और रोबोट: छोटी लेकिन शक्तिशाली मोटरों में इस्तेमाल होने वाले चुंबक।
  • रक्षा: मिसाइल, रडार, विमान, ड्रोन और अन्य प्रणालियों में कई Critical Minerals की जरूरत।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स और डेटा सेंटर: हाई-परफॉर्मेंस मोटर और कुछ विशेष इलेक्ट्रॉनिक उपकरण।

2025 में चीन के Rare Earth export controls ने इसी जोखिम को सामने ला दिया था। IEA के अनुसार उस दौरान अमेरिका और यूरोप समेत कई देशों के ऑटो निर्माताओं को permanent magnets की आपूर्ति में मुश्किल आई और कुछ कंपनियों को उत्पादन घटाना पड़ा। यानी यह सिर्फ व्यापार का मुद्दा नहीं है। यह आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी है।

क्या Mining से ज्यादा जरूरी Processing Technology है?

यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। मान लीजिए भारत के पास 10 लाख टन अयस्क है, लेकिन उसे अलग-अलग Rare Earth तत्वों में बदलने की क्षमता नहीं है। तब वह अयस्क अपने आप EV मोटर या मिसाइल में इस्तेमाल नहीं हो सकता।

इसीलिए सरकार की National Critical Mineral Mission का लक्ष्य सिर्फ खनन बढ़ाना नहीं है। इसमें exploration, mining, beneficiation, processing, recycling, research और technology development को पूरी value chain के रूप में मजबूत करने की बात है।

भारत अब विदेशों में भी Critical Mineral assets हासिल करने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए KABIL जैसी व्यवस्था बनाई गई है।

साथ ही देश में recycling और नई processing technology पर शोध भी चल रहा है। 2026 में Ministry of Mines के तहत Rare Earth magnet waste से REE recovery और battery waste से critical minerals निकालने जैसी परियोजनाएं चल रही हैं।

भारत के सामने असली चुनौती क्या है?

भारत को सिर्फ 'अपनी खदान' नहीं चाहिए। उसे चाहिए अपनी खदान → अपनी processing technology → अपनी refining → अपनी high-purity materials → अपनी alloys → अपने magnets → अपनी semiconductor और high-tech manufacturing। यही पूरी आत्मनिर्भरता है। अगर भारत सिर्फ अयस्क निकालेगा और उसे विदेश भेजकर refined material या magnet वापस खरीदेगा तो सबसे ज्यादा मूल्य दूसरे देश में बनेगा।

Updated on:
24 Aug 2026 04:50 pm
Published on:
24 Aug 2026 04:50 pm