
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अगस्त 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर लगातार बनाए रखा, लेकिन अब महंगाई के बदलते स्वरूप ने ब्याज दरों को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने दर में कोई बदलाव नहीं किया और तटस्थ रुख बरकरार रखा। इसके बावजूद आरबीआई के ताज़ा संकेत बताते हैं कि अगर खाद्य, ईंधन और अन्य लागतों का दबाव व्यापक हुआ, तो भविष्य में मौद्रिक नीति को सख़्त करने का विकल्प खुला रहेगा।
| महंगाई | कर्ज/EMI | निवेश |
|---|---|---|
| जुलाई CPI 4.45% | रेपो 5.25% पर स्थिर | बॉन्ड व इक्विटी पर असर संभव |
| खाद्य महंगाई 5.52% | अभी तत्काल बढ़ोतरी नहीं | दरों की दिशा अहम |
| लक्ष्य 4%, दायरा 2–6% | आगे का फैसला महंगाई पर निर्भर | तेल और रुपये पर नजर |
अगस्त की बैठक में छह सदस्यीय MPC ने सर्वसम्मति से रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर कायम रखने का निर्णय लिया। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान 6.7 प्रतिशत और CPI आधारित महंगाई का अनुमान 5 प्रतिशत रखा है। तिमाही अनुमान में महंगाई के 2026-27 की तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत तक पहुंचने और चौथी तिमाही में 5.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
यह तस्वीर बताती है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है। हालांकि, दरों में कटौती की गुंजाइश भी पहले जैसी स्पष्ट नहीं दिख रही है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अनुसार जुलाई 2026 में खुदरा महंगाई दर 4.45 प्रतिशत रही, जबकि जून में यह 4.38 प्रतिशत थी। जुलाई का आंकड़ा लगातार दूसरे महीने आरबीआई के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर रहा। हालांकि यह अभी 2 से 6 प्रतिशत की निर्धारित सहनशील सीमा के भीतर है।
खाद्य महंगाई ज्यादा चिंता का विषय बनी हुई है। जुलाई में उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) आधारित खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत रही। ग्रामीण क्षेत्रों में यह 5.79 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.05 प्रतिशत रही। यानी घरेलू बजट पर दबाव का बड़ा स्रोत अभी खाद्य कीमतें हैं।
आरबीआई ने अपनी अगस्त नीति में वैश्विक तेल कीमतों की अस्थिरता और भू-राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़े जोखिमों को रेखांकित किया है। केंद्रीय बैंक ने यह भी कहा है कि खाद्य, ईंधन और अन्य इनपुट कीमतों में बढ़ोतरी अगर व्यापक महंगाई में बदलती है, तो मुद्रास्फीति की उम्मीदों पर असर पड़ सकता है।
यही वह बिंदु है जो आगे की ब्याज दर नीति के लिए महत्वपूर्ण होगा। महंगे कच्चे तेल से आयात लागत और परिवहन खर्च बढ़ सकते हैं। यदि लागत का असर उत्पादन और सेवाओं तक पहुंचता है, तो महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।
फिलहाल तुरंत EMI बढ़ने का कोई आधार नहीं है, क्योंकि अगस्त में रेपो दर में बढ़ोतरी नहीं हुई है। लेकिन फ्लोटिंग रेट वाले ऋण लेने वालों को आगे की नीतिगत दिशा पर नजर रखनी होगी।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने MPC Minutes में कहा कि दर में किसी बदलाव के लिए महंगाई के वास्तविक आंकड़ों, उसके टिकाऊ रहने की संभावना और आगे सामान्य होने की दिशा को लेकर अधिक स्पष्टता का इंतजार करना उचित होगा। साथ ही, खाद्य, ईंधन और अन्य इनपुट कीमतों से व्यापक महंगाई का जोखिम सामने आने पर नीतिगत सख्ती की जरूरत पड़ सकती है।
इसका सीधा अर्थ है कि अभी महंगा कर्ज तय नहीं है, लेकिन दरों में भविष्य की कटौती की उम्मीद भी सावधानी के साथ देखनी होगी।
ब्याज दरों की दिशा का असर बॉन्ड, बैंकिंग, रियल एस्टेट और कर्ज पर निर्भर कंपनियों पर पड़ सकता है। यदि महंगाई नियंत्रित रहती है, तो स्थिर दरें आर्थिक गतिविधियों और निवेश को सहारा दे सकती हैं। इसके विपरीत महंगाई के व्यापक होने पर सख़्त मौद्रिक नीति की संभावना बढ़ सकती है।
फिलहाल आरबीआई का संदेश साफ है-रेपो दर स्थिर है, लेकिन महंगाई पर निगरानी ढीली नहीं हुई है। आने वाले महीनों में खाद्य कीमतें, कच्चा तेल, रुपये की चाल और महंगाई के आंकड़े तय करेंगे कि भारत में सस्ते कर्ज का दौर आगे बढ़ता है या ब्याज दरों पर फिर दबाव बनता है।