
यह गर्म होती धरती अब नदियों को भी बेचैन कर रही है। हिमालय से निकलने वाली नदियां धाराएं बदल रही हैं, उनका प्रवाह अस्थिर हो रहा है और पानी की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन की तेजी से बढ़ती मार अब सिर्फ ग्लेशियरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि नदियों की धड़कन में भी महसूस की जा रही है।
हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना तेज हो गया है - पिछले चार दशकों में हिमालय में बर्फ की मोटाई घटने की दर दोगुनी हो गई है, जो सीधे ग्लोबल वार्मिंग का परिणाम है। इसी बीच, मध्य और पश्चिमी हिमालय में ग्लेशियरों का पानी अब पहले से अलग तरीके से बह रहा है - क्षेत्र के आकार, मौसमी बारिश और तापमान में बदलाव के कारण पानी की मात्रा और समय दोनों में परिवर्तन आ रहा है।
ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी अब पहले की तरह स्थिर नहीं रहा। एक अध्ययन में पाया गया कि मानसून के दौरान ग्लेशियरों पर होने वाली बारिश सीधे बर्फ को पिघलाने में मदद करती है - इससे नदी में पानी की मात्रा 3 से 13 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। यह दर्शाता है कि बारिश केवल नदी को भरने का कार्य नहीं करती, बल्कि ग्लेशियर को पिघलाने में भी सक्रिय भूमिका निभाती है।
सैटेलाइट और स्थल पर किए गए अध्ययन बताते हैं कि 1980 से 2020 के बीच हिमालयी नदियां अपने मार्ग को तेजी से बदल रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने और जमीन के नीचे की बर्फ के पिघलने से नदियों की धारा अस्थिर हो रही है, जिससे बाढ़, कटाव और पुलों, सड़कों को नुकसान का खतरा बढ़ गया है।
दुनिया भर की नदियों में ऑक्सीजन की मात्रा धीरे-धीरे घट रही है - 1985 से अब तक औसतन 2.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। गर्म पानी में ऑक्सीजन कम घुलती है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए खतरा बढ़ता है। भारत की नदियां भी इस गिरावट से अछूती नहीं हैं।
जलवायु मॉडल बताते हैं कि आने वाले दशकों में भारत की प्रमुख नदियों में प्रवाह बढ़ सकता है : 2026–2050 के बीच 3 से 25 प्रतिशत तक, 2041–2070 में 11 से 46 प्रतिशत, और 2071–2100 तक 22 से 76 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना है। यह बढ़ोतरी बारिश में वृद्धि और तापमान में बढ़ोतरी का परिणाम है।
लेकिन यह बढ़ता प्रवाह हमेशा अच्छा नहीं है। कुछ क्षेत्रों में, जैसे कावेरी बेसिन में, निकट भविष्य में प्रवाह में कमी भी हो सकती है। साथ ही, ग्लेशियरों का लगातार सिकुड़ना लंबे समय में नदियों की स्थिरता और पानी की उपलब्धता को कमजोर कर सकता है।
ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय–कराकोरम क्षेत्र में ग्लेशियल झीलें बन रही हैं और उनका आकार बढ़ रहा है। इन झीलों के अचानक फटने (GLOF) का खतरा बढ़ गया है, जो नीचे बसे समुदायों के लिए जानलेवा हो सकता है।
नहीं। भारत के अन्य हिस्सों में भी जलवायु परिवर्तन का असर स्पष्ट दिख रहा है। मानसून अब पहले से अधिक अनियमित और तीव्र हो गया है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं। असम में हाल ही में आई बाढ़ ने 100 से अधिक लोगों की जान ली और लाखों को विस्थापित किया।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि तेज बारिश, नदी किनारे कटाव और विकास के कारण बाढ़ और अधिक खतरनाक हो गई है।
हां, लेकिन इसके लिए हमें तैयारी करनी होगी। सबसे पहले, ग्लेशियरों और नदियों की निगरानी बढ़ानी होगी - सैटेलाइट और स्थल दोनों से। ग्लेशियल झीलों पर नजर रखने और समय पर चेतावनी देने के सिस्टम विकसित करने होंगे।
दूसरा, नदी पारिस्थितिकी को समझते हुए जल प्रबंधन करना होगा - जैसे प्रवाह को नियंत्रित करना, बांधों और जलाशयों को पर्यावरण के अनुकूल बनाना, और बाढ़ के समय अलर्ट सिस्टम को मजबूत करना।
तीसरा, स्थानीय समुदायों को तैयार करना आवश्यक है - उन्हें बाढ़, कटाव और पानी की कमी से निपटने के तरीके सिखाने होंगे। साथ ही, पानी बचाने, वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण के उपाय अपनाने होंगे।
इस तरह हम इस बदलते जलवायु के दौर में नदियों को बचा सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।