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RK-251: भारत की लैब से निकली वो ‘स्मार्ट’ दवा, जो सिर्फ कैंसर सेल्स को पहचानकर करेगी वार

RK-251 को असम की इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IASST) के डॉ. असीस बाला और IIT गुवाहाटी के डॉ. भाबक की टीम ने मिलकर तैयार किया है।
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Aug 21, 2026
cancer medicine india
प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

कीमोथेरेपी का नाम सुनते ही अधिकतर लोगों के मन में एक ही तस्वीर बनती है - बाल झड़ना, उल्टियां, कमजोरी और हफ्तों तक चलने वाली थकान। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पारंपरिक कीमोथेरेपी सिर्फ कैंसर की कोशिकाओं पर ही नहीं, बल्कि शरीर की तेजी से बढ़ने वाली स्वस्थ कोशिकाओं पर भी हमला करती है। लेकिन असम की एक प्रयोगशाला में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दवा तैयार की है, जो इस समस्या का हल निकाल सकती है — और इसका नाम है RK-251

क्या है RK-251, और यह "स्मार्ट" क्यों है?

RK-251 को असम की इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IASST) के डॉ. असीस बाला और IIT गुवाहाटी के डॉ. के.पी. भाबक की टीम ने मिलकर तैयार किया है। IASST भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत काम करने वाला एक स्वायत्त संस्थान है। यह शोध जुलाई 2026 में American Chemical Society के प्रतिष्ठित जर्नल Journal of Medicinal Chemistry में प्रकाशित हुआ।

इस दवा को "स्मार्ट" इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह शरीर में तब तक निष्क्रिय पड़ी रहती है, जब तक उसे कैंसर कोशिका जैसा माहौल न मिले। कैंसर कोशिकाओं में आमतौर पर "रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज" (ROS) नाम के अणु सामान्य कोशिकाओं से ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं। RK-251 को ठीक इसी फर्क को पहचानने के लिए डिजाइन किया गया है - जैसे ही यह किसी उच्च-ROS वाली कैंसर कोशिका में पहुंचती है, यह सक्रिय हो जाती है और NBDHEX नाम का शक्तिशाली एंटी-कैंसर कंपाउंड छोड़ती है, जो GSTP1 नाम के उस प्रोटीन पर हमला करता है जिसकी मदद से कई कैंसर कोशिकाएं इलाज से बच निकलती हैं।

अभी तक के प्रीक्लिनिकल (लैब स्तर के) परीक्षणों में यह दवा ट्रिपल-निगेटिव ब्रेस्ट कैंसर जैसी आक्रामक बीमारी की कोशिकाओं पर काफी असरदार साबित हुई है, जबकि स्वस्थ कोशिकाओं पर इसका असर बेहद कम रहा। ज़ेब्राफिश भ्रूणों पर हुए परीक्षण में भी किसी तरह की विषाक्तता के संकेत नहीं मिले।

लेकिन यहां एक जरूरी बात समझनी होगी - RK-251 अभी सिर्फ एक प्रायोगिक दवा उम्मीदवार (experimental drug candidate) है। इसका अभी तक इंसानों पर कोई क्लिनिकल ट्रायल नहीं हुआ है। यानी इसे मरीजों तक पहुंचने में अभी बरसों लग सकते हैं - पहले जानवरों पर विस्तृत टॉक्सिकोलॉजी अध्ययन, फिर तीन चरणों के मानव परीक्षण, और तब कहीं जाकर यह दवा असली मरीजों के इलाज में इस्तेमाल हो पाएगी।

भारत में कैंसर कितना बड़ा खतरा है?

RK-251 जैसी खोज इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत में कैंसर की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में भारत में करीब 14.1 लाख नए कैंसर मामले दर्ज हुए, जबकि करीब 9.16 लाख लोगों की मौत कैंसर की वजह से हुई। साल 2024 के लिए यह अनुमान बढ़कर करीब 16 लाख नए मामलों और करीब 9 लाख मौतों तक पहुंच गया।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर नौ में से एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में कैंसर होने की आशंका रहती है। सिर व गर्दन के कैंसर के ही हर साल करीब 2.8 लाख नए मामले सामने आते हैं, जो दुनियाभर के ऐसे कुल मामलों का करीब एक-तिहाई है - हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि अगर इसकी पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो 80-90% मरीज़ पूरी तरह ठीक भी हो सकते हैं। इन आंकड़ों को देखते हुए ही विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को सस्ती, असरदार और कम साइड-इफेक्ट वाली स्वदेशी कैंसर दवाओं की सख्त जरूरत है।

दुनिया में कहां-कहां बन रही हैं ऐसी "स्मार्ट" दवाएं?

RK-251 जिस तरीके पर काम करती है, उसे वैज्ञानिक भाषा में "टारगेटेड थेरेपी" कहा जाता है - यानी दवा सिर्फ कैंसर कोशिका को पहचानकर उसी पर हमला करे। इस दिशा में दुनिया के कई देश पहले से काफी आगे बढ़ चुके हैं, खासकर एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स (ADC) नाम की दवाओं की श्रेणी में, जिन्हें वैज्ञानिक "बायोलॉजिकल मिसाइल" भी कहते हैं क्योंकि ये एंटीबॉडी की मदद से सीधे ट्यूमर तक कीमोथेरेपी वाला ज़हरीला पदार्थ पहुंचाती हैं।

  • अमेरिका: यहां FDA अब तक करीब 20 से ज़्यादा ADC दवाओं को मंज़ूरी दे चुका है, जिनमें Kadcyla, Adcetris और Enhertu जैसी दवाएं शामिल हैं। अमेरिका का 21st Century Cures Act ऐसी दवाओं की समीक्षा प्रक्रिया को भी तेज़ करता है।
  • चीन: यहां की दवा नियामक संस्था NMPA ने भी कई स्वदेशी ADC दवाओं (जैसे disitamab vedotin) को मंज़ूरी दी है, और चीन इस क्षेत्र में सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाले देशों में गिना जाता है।
  • जापान: यहां की तेज़-ट्रैक समीक्षा व्यवस्था "साकीगाके" के तहत समीक्षा का समय घटाकर छह महीने तक कर दिया गया है। जापान ने Akalux जैसी अनूठी फोटो-इम्यूनोथेरेपी दवा को भी मंज़ूरी दी है, जो प्रकाश की मदद से कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाती है।
  • यूरोपीय संघ: यहां भी Innovative Medicines Initiative जैसी योजनाओं के ज़रिए ऐसी दवाओं के विकास को समर्थन दिया जा रहा है।

इस पूरी वैश्विक तस्वीर में भारत का RK-251 अभी शुरुआती लैब चरण में है, जबकि अमेरिका, चीन और जापान जैसे देश अपनी टारगेटेड कैंसर दवाओं को मरीजों तक पहुंचा भी चुके हैं। लेकिन RK-251 की खासियत यह है कि यह पूरी तरह भारत में, भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई है और अगर आने वाले वर्षों में इसके क्लिनिकल ट्रायल सफल रहे, तो यह भारत को इस वैश्विक दौड़ में एक मजबूत दावेदार बना सकती है।

नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है, यह चिकित्सीय सलाह नहीं है। कैंसर से जुड़े किसी भी लक्षण या इलाज के लिए कृपया किसी योग्य डॉक्टर से सलाह लें।

Updated on:
21 Aug 2026 05:20 pm
Published on:
21 Aug 2026 05:20 pm