
बच्चों के शुरुआती विकास में स्क्रीन का इस्तेमाल कितना और कब हो, यह सवाल अब वैज्ञानिकों के लिए भी अहम बनता जा रहा है। इंसर्म, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और सिंगापुर के अन्य शोध संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं की टीम ने 502 बच्चों के दीर्घकालिक आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में 1 से 8 वर्ष की उम्र तक स्क्रीन देखने के समय और बाद के शैक्षणिक प्रदर्शन व कार्यशील स्मृति के बीच संबंध देखा गया। सबसे मजबूत संबंध शुरुआती शैशवावस्था और 6 वर्ष की उम्र में सामने आए।
बचपन में स्क्रीन की अहम उम्र
| विजुअल / चरण | मेन पॉइंट्स |
|---|---|
| बच्चा और मोबाइल/टैबलेट | • 502 बच्चों का अध्ययन • 1 से 8 साल तक निगरानी |
| उम्र की टाइमलाइन + स्क्रीन | • 1 साल पर मजबूत संबंध • 6 साल पर फिर संबंध • 9 साल में पढ़ाई का आकलन • 10.5 साल में स्मृति जांच • औसत स्क्रीन समय बढ़ा • अधिक समय से कमजोर परिणाम का संबंध |
| परिवार, किताब और खेल | • सामग्री भी महत्वपूर्ण • अध्ययन कारण साबित नहीं करता |
मोबाइल, टैबलेट और टीवी आज बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन बचपन में स्क्रीन के सामने बिताया गया समय आगे चलकर सीखने और याददाश्त से कैसे जुड़ता है, इस पर वैज्ञानिकों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है।
वर्ल्ड जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित इस नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बच्चों को कई वर्षों तक फॉलो किया। माता-पिता ने बच्चों के स्क्रीन देखने का समय 1, 1.5, 2, 3, 6 और 8 वर्ष की उम्र में बताया। इसके बाद 9 वर्ष की उम्र में बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन और 10.5 वर्ष की उम्र में कार्यशील स्मृति का परीक्षण किया गया।
अध्ययन में कुल 502 बच्चे शामिल थे। शोधकर्ताओं ने स्क्रीन टाइम और बाद के परिणामों के बीच संबंध का विश्लेषण करते समय कई अन्य कारकों को भी ध्यान में रखा।
नतीजों में पाया गया कि 1 वर्ष की उम्र में अधिक स्क्रीन देखने का समय 9 वर्ष की उम्र में कमजोर शैक्षणिक प्रदर्शन से जुड़ा था। यह संबंध 1.5 वर्ष और 6 वर्ष की उम्र में भी देखा गया, लेकिन 1 वर्ष की उम्र में संबंध सबसे मजबूत था।
शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि स्क्रीन टाइम और बाद के परिणामों का संबंध हर उम्र में समान नहीं था।
2 और 3 वर्ष की उम्र में स्क्रीन देखने के समय का बाद के शैक्षणिक प्रदर्शन या कार्यशील स्मृति से कोई महत्वपूर्ण समायोजित संबंध नहीं मिला। लेकिन 6 वर्ष की उम्र में यह संबंध फिर दिखाई दिया।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, छह वर्ष का समय बच्चों के लिए महत्वपूर्ण विकासात्मक चरण है। इसी उम्र के आसपास कई बच्चे औपचारिक स्कूली शिक्षा की शुरुआत करते हैं। इस दौरान ध्यान केंद्रित करने, निर्देश समझने, जानकारी याद रखने और नई चीजें सीखने की मांग बढ़ जाती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि छह वर्ष की उम्र में स्क्रीन देखने वाला हर बच्चा पढ़ाई में कमजोर होगा। अध्ययन केवल आबादी के स्तर पर स्क्रीन टाइम और बाद के परिणामों के बीच सांख्यिकीय संबंध दिखाता है।
शोधकर्ताओं ने बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन को मापने के लिए वेक्सलर इंडिविजुअल अचीवमेंट टेस्ट, तीसरे संस्करण का इस्तेमाल किया।
समायोजित विश्लेषण में 1 वर्ष, 1.5 वर्ष और 6 वर्ष की उम्र में अधिक स्क्रीन टाइम का संबंध 9 वर्ष की उम्र में कम शैक्षणिक प्रदर्शन से बना रहा। इनमें 1 वर्ष की उम्र का संबंध सबसे मजबूत था।
इससे यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि स्क्रीन टाइम का असर केवल कुल घंटों से तय होता है या बच्चे की उम्र भी इसमें भूमिका निभाती है।
अध्ययन के नतीजे दूसरे विकल्प की ओर संकेत करते हैं। यानी बचपन में स्क्रीन का समय और विकास का चरण, दोनों महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
शोध में बच्चों की वर्किंग मेमोरी यानी कार्यशील स्मृति का भी परीक्षण किया गया। यह वह मानसिक क्षमता है जिसकी मदद से व्यक्ति थोड़े समय के लिए जानकारी को दिमाग में रखकर उसका इस्तेमाल करता है।
10.5 वर्ष की उम्र में किए गए परीक्षण में 1 वर्ष और 6 वर्ष की उम्र में अधिक स्क्रीन देखने का समय कमजोर कार्यशील स्मृति से जुड़ा पाया गया।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया। बचपन के दौरान औसत संचयी स्क्रीन टाइम का संबंध बाद के शैक्षणिक प्रदर्शन से लगातार देखा गया, लेकिन कार्यशील स्मृति के साथ ऐसा स्पष्ट संबंध नहीं मिला।
इसलिए अध्ययन के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि ज्यादा स्क्रीन टाइम सीधे तौर पर बच्चों की याददाश्त को कमजोर करता है।
अध्ययन में शामिल बच्चों का औसत स्क्रीन टाइम उम्र के साथ बढ़ता गया। एक वर्ष की उम्र में बच्चों का औसत स्क्रीन समय करीब 2.1 घंटे प्रतिदिन था। आठ वर्ष की उम्र तक यह बढ़कर करीब 3 घंटे प्रतिदिन हो गया।
यह आंकड़ा बताता है कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, स्क्रीन उनके दैनिक जीवन में अधिक जगह बना सकती है।
हालांकि, केवल स्क्रीन के घंटों को देखकर बच्चे के विकास का आकलन नहीं किया जा सकता। स्क्रीन पर दिखाई जाने वाली सामग्री, उसका उद्देश्य, माता-पिता की मौजूदगी, नींद, शारीरिक गतिविधि, पढ़ने की आदत और परिवार के साथ बातचीत जैसे कई दूसरे पहलू भी महत्वपूर्ण हैं।
यह अध्ययन ग्रोइंग अप इन सिंगापुर टुवर्ड्स हेल्दी आउटकम्स यानी जीयूएसटीओ जन्म समूह के आंकड़ों पर आधारित था। इस जन्म समूह में बच्चों के स्वास्थ्य और विकास से जुड़े आंकड़े लंबे समय तक एकत्र किए गए।
शोधकर्ताओं ने छह अलग-अलग उम्र में माता-पिता द्वारा बताए गए स्क्रीन टाइम को रिकॉर्ड किया। इसके बाद बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन और कार्यशील स्मृति का मानकीकृत परीक्षण किया गया। अध्ययन में बहु-चर सांख्यिकीय विश्लेषण का इस्तेमाल किया गया, ताकि अन्य संभावित कारकों के प्रभाव को कम किया जा सके।
शोधपत्र के प्रमुख लेखकों में शुआई यांग, नटराजन पद्मप्रिया, सियांग-मेई सॉ, याप सेंग चोंग, लिनेट पी. शेक, पीटर डी. ग्लुकमैन, कीथ एम. गॉडफ्रे, जोहान जी. एरिक्सन, फाल्क म्यूलर-रिमेंशनाइडर, एवलिन सी. लॉ और जोनाथन वाई. बर्नार्ड शामिल हैं। इन शोधकर्ताओं की संबद्धता सिंगापुर, फ्रांस और अन्य शोध संस्थानों से है।
यहां सबसे जरूरी सावधानी यह है कि अध्ययन कारण और परिणाम साबित नहीं करता।
शोधकर्ताओं ने यह पाया कि कुछ उम्र में अधिक स्क्रीन टाइम और बाद में कमजोर शैक्षणिक प्रदर्शन या कार्यशील स्मृति के बीच संबंध था। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि स्क्रीन देखने के कारण ही बच्चों का प्रदर्शन कमजोर हुआ।
उदाहरण के लिए, जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम अधिक था, उनके पारिवारिक माहौल, नींद, शारीरिक गतिविधि या दूसरे व्यवहार अलग हो सकते हैं। शोध में कई संभावित कारकों को समायोजित किया गया, लेकिन ऐसे सभी प्रभावों को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं होता।
इसलिए अध्ययन को चेतावनी के संकेत के रूप में देखना ज्यादा उचित है, न कि हर बच्चे पर लागू होने वाले निश्चित नियम के रूप में।
अध्ययन का संदेश स्क्रीन को पूरी तरह प्रतिबंधित करने से ज्यादा संतुलित इस्तेमाल पर ध्यान देने का है। खासकर शुरुआती बचपन में बच्चों के लिए बातचीत, खेल, किताबें, शारीरिक गतिविधियां और आमने-सामने सीखने के अवसर जरूरी हैं।
माता-पिता यह भी देख सकते हैं कि बच्चा स्क्रीन पर क्या देख रहा है और स्क्रीन उसके खेलने, सोने, पढ़ने या परिवार के साथ समय बिताने की जगह तो नहीं ले रही।
शोधकर्ताओं के अनुसार भविष्य के अध्ययनों में स्क्रीन की सामग्री, उपकरण के प्रकार और माता-पिता की सहभागिता जैसे पहलुओं को भी शामिल करना जरूरी होगा। इससे स्क्रीन इस्तेमाल और बाल विकास के बीच संबंध को और बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।
इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि बचपन में स्क्रीन टाइम का सवाल सिर्फ “कितने घंटे?” का नहीं हो सकता। “किस उम्र में?” यह सवाल भी महत्वपूर्ण है।
502 बच्चों के दीर्घकालिक आंकड़ों में 1 वर्ष की उम्र में स्क्रीन टाइम का संबंध सबसे मजबूत दिखा, जबकि 6 वर्ष की उम्र में भी शैक्षणिक प्रदर्शन और कार्यशील स्मृति से जुड़े संबंध सामने आए।
यानी बचपन की स्क्रीन आदतों पर ध्यान देने की जरूरत जरूर है, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों को समझते समय यह फर्क बनाए रखना जरूरी है कि शोध ने संबंध पाया है, सीधा कारण नहीं।