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Ayurvedic Ritucharya: मौसम बदलते ही क्यों गिरती है इम्युनिटी? जानिए आयुर्वेद के वैज्ञानिक उपाय

Seasonal Health Routine: बदलते मौसम में सर्दी, जुकाम और संक्रमण से बचने के लिए आयुर्वेद की ऋतुचर्या पद्धति अपनाएं। च्यवनप्राश, सोंठ जल और ऋतुहरितकी के नियमित उपयोग से रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाया जा सकता है।
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Aug 28, 2026
Seasonal Health Routine News
आयुर्वेद के अनुसार मौसमी आहार और जीवनशैली अपनाकर स्वस्थ रहें। (फोटो: AI)

Immunity यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता का सीधा संबंध हमारे बदलते पर्यावरण और खान-पान से होता है। मौसम में बदलाव आते ही तापमान और आर्द्रता में उतार-चढ़ाव होने लगता है, जिससे मानव शरीर के त्रिदोष 'वात, पित्त और कफ़'का संतुलन प्रभावित होता है। आयुर्वेद में इस मौसमी बदलाव के साथ सामंजस्य बैठाने के लिए 'ऋतुचर्या' का विधान दिया गया है। आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों से भी यह स्पष्ट हुआ है कि मौसमी बदलाव के दौरान पाचन क्रिया, आंतों के माइक्रोबायोम और प्रतिरक्षा प्रणाली में परिवर्तन आते हैं, जिन्हें सही जीवनशैली और आहार से नियंत्रित किया जा सकता है।

बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और च्यवनप्राश

मौसम के संक्रमण काल में बच्चे सबसे तेज़ी से सर्दी-खांसी और वायरल संक्रमण की चपेट में आते हैं। स्कूली बच्चों पर किए गए क्लीनिकल अध्ययनों में देखा गया कि नियमित रूप से च्यवनप्राश का सेवन करने वाले बच्चों में एलर्जी और संक्रमण की दर में उल्लेखनीय कमी आई। इससे बच्चों की बीमारी की अवधि घटकर लगभग आधी रह गई। च्यवनप्राश में मौजूद आंवला, पिप्पली और अन्य पादप तत्व बच्चों के शारीरिक स्टेमिना, ऊर्जा और फेफड़ों की कार्यक्षमता को सुदृढ़ बनाते हैं।

वसंत ऋतु: सोंठ जल और कफ़ का शमन

सर्दियों के बाद वसंत ऋतु के आगमन पर शरीर में संचित कफ़ पिघलने लगता है, जिसके कारण भूख न लगना, भारीपन, सुस्ती, लगातार छींकें और खांसी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इस ऋतु में 'शुंठी सिद्ध जल' (सोंठ यानी सूखी अदरक से उबला हुआ पानी) का सेवन अत्यंत लाभकारी पाया गया है। सोंठ की दीपन और पाचन क्षमता जठराग्नि को प्रदीप्त करती है और कफ़ दोष का शमन कर ऊर्जा का स्तर बनाए रखती है। इसके अतिरिक्त, वसंत में हरितकी का सेवन शहद के साथ करने से भी सुस्ती और श्वास संबंधी अवरोधों में राहत मिलती है।

वर्षा ऋतु: ऋतुहरितकी और पाचन संरक्षण

वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी बढ़ने से जठराग्नि मंद हो जाती है और वात दोष का प्रकोप बढ़ता है। इस काल में पाचन संबंधी विकार, फ्लू, जोड़ों का दर्द और त्वचा संक्रमण बढ़ने लगते हैं। इस मौसम में हरितकी (हरड़) का सेवन 'सैंधव नमक' (सेंधा नमक) के साथ करने का शास्त्रीय नियम है, जिसे शोधों में भी सुरक्षित और प्रभावी पाया गया है। यह संयोजन रक्त मापदंडों जैसे ईोसिनोफिल्स और ईएसआर (ESR) को नियंत्रित कर शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करता है।

सभी आयु वर्गों के लिए साल भर च्यवनप्राश

15 से 75 वर्ष तक के वयस्कों पर हुए अध्ययनों के अनुसार, पूरे वर्ष च्यवनप्राश का संतुलित मात्रा में सेवन फेफड़ों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाता है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है।

सावधानियां व चिकित्सीय परामर्श

आयुर्वेदिक उपायों को अपनाते समय व्यक्तिगत प्रकृति का ध्यान रखना आवश्यक है। यदि किसी को तेज़ बुखार, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई, अनियंत्रित दस्त या पुरानी एलर्जी जैसी समस्याएं हों, तो तुरंत योग्य चिकित्सक से परामर्श लें। मधुमेह या उच्च रक्तचाप के मरीज़ों को च्यवनप्राश या लवण युक्त औषधियों का उपयोग डॉक्टर की देखरेख में ही करना चाहिए। ऋतुचर्या के इन प्रामाणिक नियमों को अपनाकर मौसमी बीमारियों से सुरक्षित रहा जा सकता है।

Updated on:
28 Aug 2026 07:31 pm
Published on:
28 Aug 2026 07:30 pm