
राजस्थान के चार प्रमुख शहरों ' जयपुर, उदयपुर, कोटा और अजमेर'को स्मार्ट सिटी मिशन के तहत विकसित करने की योजना ने हाल के वर्षों में इन शहरों का परिदृश्य बदलने का प्रयास किया है। किंतु क्या यह बदलाव आम नागरिकों के दैनिक जीवन में सचमुच महसूस हो रहा है? आइए देखें कि अब तक क्या कार्य हुआ है, ज़मीनी असर क्या है, और आगे क्या चुनौतियाँ हैं।
जयपुर में स्मार्ट सिटी परियोजना का एक बड़ा स्तंभ इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC) रहा है। लगभग ₹46.64 करोड़ की लागत से सुदृढ़ किया गया यह केंद्र 20 लाख से अधिक नागरिकों को कचरा प्रबंधन, यातायात नियंत्रण, सार्वजनिक सुरक्षा और पर्यावरण निगरानी जैसी सेवाएँ रीयल-टाइम डेटा के आधार पर उपलब्ध कराता है।
प्रमुख तकनीकी सुविधाएँ: जीपीएस-ट्रैक्ड कचरा संग्रहण, स्मार्ट पार्किंग सेंसर, एलईडी स्ट्रीट लाइट्स और वायु-गुणवत्ता निगरानी सेंसर।
परिणाम: शहर के कचरा प्रबंधन और यातायात निगरानी में सुधार हुआ है तथा स्थानीय निकायों को पार्किंग व ई-चालान के माध्यम से राजस्व भी प्राप्त हुआ है।
दूसरी ओर, कई नागरिकों का मानना है कि ज़मीनी बुनियादी ढाँचा अभी भी कमजोर है। स्मार्ट रोड, ओपन-एयर जिम और आधुनिक बस शेल्टर तो बने हैं, लेकिन सीवरेज नेटवर्क, सुगम यातायात और संपूर्ण स्वच्छता जैसी मूलभूत समस्याएँ कई इलाकों में जस की तस हैं।
राजस्थान में स्मार्ट सिटी मिशन के तहत कुल ₹4,000 करोड़ से अधिक की योजनाएँ स्वीकृत की गईं, जिनमें से अधिकतर बजट जलापूर्ति, स्वास्थ्य, स्मार्ट मोबिलिटी, धरोहर संरक्षण और सीवरेज संरचना पर व्यय किया जा चुका है।
आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय प्रगति लगभग 90% से अधिक पूरी हो चुकी है, लेकिन भौतिक धरातल पर योजनाओं का असर और गुणवत्ता शहरों के अलग-अलग क्षेत्रों में असमान है।
तकनीकी नवाचारों के बावजूद कई बुनियादी मुद्दों पर त्वरित सुधार की आवश्यकता है:
जलभराव व ड्रेनेज: मानसूनी बारिश के दौरान प्रमुख चौराहों और निचले इलाकों में जलभराव की समस्या।
यातायात व पार्किंग: प्रमुख बाज़ारों में अनियंत्रित पार्किंग और जाम से व्यापारी व नागरिक दोनों प्रभावित हैं।
सड़कों का रखरखाव: परियोजनाओं के तहत खोदी गई सड़कों की समय पर मरम्मत न होना।
स्मार्ट सिटी मिशन का वास्तविक उद्देश्य केवल सेंसर और कैमरे लगाना नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता (Ease of Living) में सुधार करना है। इसके लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:
नागरिक-केंद्रित ICCC: कमांड सेंटर के डेटा का उपयोग शिकायतों के तुरंत निस्तारण और फील्ड टीमों की जवाबदेही तय करने में हो।
एजेंसियों में समन्वय: नगर निगम, जेडीए/यूआईटी, विद्युत और जल विभागों के बीच कार्य-तालमेल बेहतर किया जाए ताकि बार-बार सड़क खुदाई न हो।
पारदर्शी निगरानी: हर वार्ड स्तर पर लंबित परियोजनाओं और खर्च का ऑडिट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।
सुलभ शिकायत प्रणाली: मोबाइल ऐप और हेल्पलाइन पर प्राप्त शिकायतों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित किया जाए।
स्मार्ट सिटी मिशन ने राजस्थान के प्रमुख शहरों में तकनीकी नींव तो रखी है, परंतु यह परियोजना तब तक पूरी तरह सफल नहीं मानी जा सकती जब तक तकनीक का लाभ आम नागरिक को सुरक्षित सड़कों, निर्बाध सीवरेज और स्वच्छ वातावरण के रूप में रोज़मर्रा के जीवन में न मिले।