
Assam Nagaland Oil MoU 2026 : क्या असम और नागालैंड की बदलेगी अर्थव्यवस्था, PC- Chatgpt
असम और नागालैंड के बीच करीब 512 किलोमीटर लंबी सीमा है और दोनों राज्यों के बीच दशकों से सीमा विवाद चला आ रहा है। अब इसी विवादित सीमा क्षेत्र के नीचे मौजूद तेल और प्राकृतिक गैस ने दोनों राज्यों को एक नई वजह से साथ ला दिया है।
11 जून 2026 को केंद्र सरकार, असम और नागालैंड ने एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) किया। इसका मकसद असम-नागालैंड सीमा क्षेत्र में खनिज तेल से जुड़े कामकाज को आसान बनाना और तेल-गैस की खोज तथा उत्पादन के लिए स्थिर माहौल तैयार करना है। सरकार का कहना है कि इससे करीब तीन दशक से अटकी गतिविधियों को फिर गति मिल सकती है।
लेकिन इस कहानी में तेल से बड़ा सवाल जमीन, अधिकार और कमाई का है। आखिर जिस जमीन पर दो राज्य अपना दावा करते हों, वहां से निकलने वाला तेल किसका होगा? रॉयल्टी किसे मिलेगी? स्थानीय लोगों को कितना फायदा होगा? और क्या यह समझौता नॉर्थ-ईस्ट को भारत का नया ऊर्जा क्षेत्र बना सकता है?
असम और नागालैंड का सीमा विवाद नया नहीं है। नागालैंड का गठन 1963 में हुआ था। इसके बाद दोनों राज्यों के बीच सीमा के वास्तविक निर्धारण को लेकर विवाद बना रहा। नागालैंड का दावा है कि उसके पारंपरिक नगा क्षेत्र का एक हिस्सा मौजूदा संवैधानिक सीमा के बाहर चला गया। असम का रुख मौजूदा संवैधानिक सीमा को बनाए रखने का रहा है।
यह विवाद इतना पुराना है कि 1988 से मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। केंद्र सरकार ने समय-समय पर दोनों राज्यों के बीच बातचीत और मध्यस्थता की कोशिश भी की है।
दोनों राज्यों की सीमा करीब 512 किलोमीटर है और विवादित हिस्से को Disputed Area Belt यानी DAB कहा जाता है। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक इस विवादित क्षेत्र का आकार करीब 1,100 वर्ग किलोमीटर है। अब समस्या यह है कि इसी इलाके में हाइड्रोकार्बन की संभावनाएं भी हैं।
तेल निकालने के लिए सिर्फ जमीन के नीचे तेल होना काफी नहीं है। वहां सर्वे, ड्रिलिंग, मशीनरी, सड़क, पाइपलाइन, कर्मचारियों की आवाजाही और सुरक्षा जैसी कई गतिविधियां करनी पड़ती हैं। लेकिन जब जमीन पर ही दो राज्यों के अधिकार का विवाद हो तो किसी कंपनी के लिए लंबे समय का निवेश करना जोखिम भरा हो जाता है।
यही वजह है कि असम-नागालैंड सीमा के कुछ इलाकों में तेल और गैस की खोज की गतिविधियां लंबे समय से बाधित रही हैं। जून 2026 के समझौते का सबसे बड़ा उद्देश्य इसी अनिश्चितता को कम करना है। सरकार के मुताबिक MoU से मौजूदा और भविष्य के हाइड्रोकार्बन संचालन के लिए ज्यादा स्थिरता और परिचालन निरंतरता मिलेगी।
यानी इस समझौते का मतलब यह नहीं है कि अगले दिन से वहां तेल निकलना शुरू हो जाएगा। इसका मतलब है कि तेल की खोज और उत्पादन के लिए रास्ता साफ करने की कोशिश शुरू हो गई है।
यहीं मामला सबसे दिलचस्प हो जाता है। किसी इलाके की जमीन पर राज्य का प्रशासनिक अधिकार और जमीन के नीचे मौजूद पेट्रोलियम संसाधन का कानूनी नियंत्रण एक ही चीज नहीं है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से जुड़े केंद्रीय कानून और अधिकारों का अपना अलग ढांचा है। 2026 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के सामने भी यही संवैधानिक सवाल उठा कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के नियमन में केंद्र और नागालैंड की विधायी शक्तियां किस सीमा तक लागू होती हैं। अदालत ने इस सवाल को तय नहीं किया और कहा कि ऐसे अंतर-सरकारी संवैधानिक विवाद का फैसला उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
दूसरी तरफ नागालैंड को अनुच्छेद 371A के तहत भूमि और संसाधनों से जुड़े मामलों में विशेष संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। यही वजह है कि राज्य में पेट्रोलियम संसाधनों को लेकर अधिकार और राजस्व का सवाल लंबे समय से संवेदनशील रहा है।
इसलिए असम-नागालैंड सीमा पर तेल निकालना सिर्फ इंजीनियरिंग का मामला नहीं, बल्कि संविधान, सीमा और संसाधन अधिकारों का भी मामला है।
हां। नागालैंड में तेल की खोज कोई नई बात नहीं है। राज्य सरकार के एक प्रकाशन के अनुसार ONGC ने 1973 में Changpang क्षेत्र में तेल की खोज की थी और वहां 1983 में उत्पादन शुरू हुआ। लेकिन 1994 में उत्पादन रुक गया। इसके पीछे रॉयल्टी विवाद और उत्पादन से जुड़े दूसरे विवादों का भी उल्लेख किया गया है।
यानी नागालैंड के लिए तेल सिर्फ भविष्य की संभावना नहीं है। वहां पहले से यह अनुभव मौजूद है कि संसाधन होने के बावजूद उन्हें आर्थिक गतिविधि में बदलना कितना मुश्किल हो सकता है।
11 जून के MoU ने केंद्र, असम और नागालैंड को एक साझा ढांचे में ला दिया है। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य है-
यानी अब किसी एक राज्य के अधिकार या सुरक्षा को लेकर पैदा होने वाली समस्या को तीनों पक्ष मिलकर सुलझाने की कोशिश करेंगे। सरकार इसे cooperative federalism यानी सहयोगी संघवाद का उदाहरण बता रही है।
यहीं सावधानी जरूरी है। सरकार ने इस समझौते के आधार पर कोई ऐसा अंतिम आंकड़ा नहीं दिया है कि यहां से कितने अरब बैरल तेल या कितनी गैस निश्चित रूप से निकलेगी।
हां, भूगर्भीय आंकड़े बताते हैं कि पूरा Assam-Arakan Basin तेल और गैस की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। Directorate General of Hydrocarbons के मुताबिक इस बेसिन में असम और नागालैंड से जुड़े कई तेल-गैस क्षेत्र पहले ही खोजे जा चुके हैं।
इसलिए सीमा क्षेत्र में भी हाइड्रोकार्बन की संभावना है, लेकिन संभावित संसाधन और व्यावसायिक रूप से निकाला जा सकने वाला तेल एक ही चीज नहीं है। असल मात्रा का पता विस्तृत सर्वे और ड्रिलिंग के बाद ही चलेगा।
11 जून के समझौते के दौरान गृह मंत्रालय ने बताया कि संबंधित क्षेत्र में मौजूदा उत्पादन क्षमता करीब 1,000 से 1,500 बैरल प्रतिदिन है और इसे दस गुना से ज्यादा बढ़ाने की संभावना जताई गई है।
लेकिन इसे भविष्य का निश्चित उत्पादन नहीं समझना चाहिए। यह सरकार द्वारा बताई गई संभावना है, गारंटी नहीं। तेल की खोज में कई कुएं सूखे निकल सकते हैं, कुछ जगह कम उत्पादन हो सकता है और कई क्षेत्रों में उत्पादन व्यावसायिक रूप से लाभदायक न भी हो।
अगर खोज और उत्पादन सफल होता है तो स्थानीय अर्थव्यवस्था में कई तरह के बदलाव आ सकते हैं। सबसे पहले रोजगार पैदा हो सकता है। ड्रिलिंग, परिवहन, निर्माण, सुरक्षा, रखरखाव और दूसरी सेवाओं में। इसके अलावा सड़क, बिजली, पानी और दूसरी बुनियादी सुविधाओं में निवेश बढ़ सकता है।
राज्यों को पेट्रोलियम गतिविधियों से रॉयल्टी और अन्य राजस्व भी मिल सकता है। असम सरकार के अनुसार राज्य में खनिज और पेट्रोलियम से जुड़े लाइसेंस, लीज और रॉयल्टी की प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद है।
लेकिन नागालैंड में संसाधनों पर विशेष संवैधानिक व्यवस्था के कारण राजस्व और अधिकार का सवाल ज्यादा जटिल है। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इस विशेष सीमा क्षेत्र से निकलने वाले तेल की कमाई किस अनुपात में किसे मिलेगी।
MoU ने संचालन का रास्ता बनाया है; राजस्व बंटवारे का पूरा मॉडल अलग नियमों और परियोजना-विशिष्ट व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
कुछ हद तक मदद मिल सकती है, लेकिन इसे बहुत बड़ा समाधान मानना सही नहीं होगा। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। एक समाचार पत्र के अनुसार देश अपनी जरूरत का 88% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है।
ऐसे में घरेलू उत्पादन का हर अतिरिक्त बैरल आयात पर निर्भरता थोड़ी कम कर सकता है। लेकिन असम-नागालैंड सीमा क्षेत्र से मिलने वाला उत्पादन भारत की कुल तेल खपत की तुलना में कितना बड़ा होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
इसलिए इसे ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक अतिरिक्त स्रोत के रूप में देखना ज्यादा सही होगा, न कि आयात पर निर्भरता खत्म करने वाले समाधान के तौर पर।
तेल और गैस की खोज में जमीन के भीतर ड्रिलिंग, सड़क निर्माण, मशीनरी और पाइपलाइन जैसी गतिविधियां होती हैं। नॉर्थ-ईस्ट में यह चुनौती इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र जैव-विविधता से समृद्ध है और कई इलाकों में जंगल तथा संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद हैं।
इसलिए खोज शुरू होने से पहले पर्यावरणीय मंजूरियां, स्थानीय समुदायों की चिंताएं और जल-स्रोतों की सुरक्षा महत्वपूर्ण होगी। तेल मिलने से आर्थिक फायदा तभी टिकाऊ होगा जब संसाधन निकालने और पर्यावरण बचाने के बीच संतुलन बनाया जाए।
संभावना जरूर है। असम पहले से भारत के पुराने तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। DGH के अनुसार असम-अराकान बेसिन में पिछले सौ वर्षों से अधिक समय से तेल की खोज होती रही है और अब तक कई तेल एवं गैस क्षेत्र खोजे जा चुके हैं।
नागालैंड में भी संसाधनों की संभावना मौजूद है। जून 2026 का समझौता अगर जमीन पर सफल रहता है तो इससे सिर्फ एक सीमा क्षेत्र नहीं, बल्कि नॉर्थ-ईस्ट के दूसरे संभावित हाइड्रोकार्बन क्षेत्रों में निवेश का भरोसा बढ़ सकता है।
सरकार ने भी कहा है कि समझौते के बाद सिर्फ छह चिन्हित क्षेत्रों से आगे पूरे नागालैंड में तेल खोज की संभावनाओं का रास्ता खुल सकता है।
असली सवाल तेल मिलने का नहीं, उसे जमीन तक लाने का है। असम-नागालैंड सीमा की कहानी सिर्फ 'जमीन के नीचे कितना तेल है?' की कहानी नहीं है।
यह कहानी बताती है कि भारत में प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कई बार भूगोल, सीमा विवाद, संविधान, स्थानीय अधिकार और राजनीति से जुड़ जाता है। इस बार तीनों सरकारों ने एक साथ बैठकर कम से कम तेल और गैस के संचालन से जुड़ी सबसे बड़ी बाधाओं में से एक को कम करने की कोशिश की है। लेकिन आगे का रास्ता अभी लंबा है।
पहले विस्तृत खोज होगी। फिर यह पता चलेगा कि कितना तेल और गैस वास्तव में मौजूद है और कितना व्यावसायिक रूप से निकाला जा सकता है। उसके बाद उत्पादन, पाइपलाइन, पर्यावरण मंजूरी, स्थानीय हित और राजस्व का सवाल आएगा।
अगर यह पूरी प्रक्रिया सफल रहती है तो फायदा सिर्फ तेल कंपनियों को नहीं, बल्कि असम, नागालैंड और पूरे नॉर्थ-ईस्ट की अर्थव्यवस्था को हो सकता है।
लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी होगा कि जमीन के नीचे के संसाधन को लेकर जमीन के ऊपर का विवाद फिर न लौटे। क्योंकि इस बार असली चुनौती तेल खोजने की नहीं है। तेल के साथ जुड़े अधिकार, पैसा और पर्यावरण का संतुलन बनाने की है।
Updated on:
18 Aug 2026 04:03 pm
Published on:
18 Aug 2026 04:03 pm
