
श्रीनगर और जम्मू-कश्मीर के दूसरे इलाकों में किसान अब अखरोट की पारंपरिक खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ रहे हैं। ऊंचे और पुराने पेड़ों की जगह ग्रीफ्टेड पौधों, उच्च घनत्व वाले बागानों और वैज्ञानिक प्रबंधन को अपनाने का रुझान बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि कटाई के दौरान होने वाले हादसों का जोखिम घटाना, जमीन का बेहतर इस्तेमाल करना और बाजार में बेहतर गुणवत्ता वाला अखरोट उपलब्ध कराना भी है।
पंपोर के पास पातलबाग गांव के युवा किसान रियाज अहमद भट इसका उदाहरण हैं। उन्होंने पारंपरिक केसर खेती से हटकर अखरोट का बाग लगाया और SKUAST-K तथा ICAR-CITH से प्राप्त ग्रीफ्टेड पौधों का इस्तेमाल किया।
इन पौधों की खासियत यह है कि वे पारंपरिक अखरोट के पेड़ों की तुलना में छोटे आकार में विकसित किए जा सकते हैं। इससे पेड़ पर चढ़कर फल तोड़ने की जरूरत कम होती है और कटाई का काम अपेक्षाकृत सुरक्षित बनाया जा सकता है। उन्होंने अखरोट के पेड़ों के बीच मटर जैसी फसलें भी उगाईं। इससे शुरुआती वर्षों में खाली जमीन का उपयोग हुआ और अतिरिक्त आय की संभावना बनी।
जम्मू-कश्मीर में अखरोट की खेती को आधुनिक बनाने के लिए High-Density Plantation को बढ़ावा दिया जा रहा है। पारंपरिक बागानों में पेड़ बड़े आकार के होते हैं और उनके बीच काफी दूरी रहती है। इसके मुकाबले उच्च घनत्व वाले बागानों में अपेक्षाकृत छोटे और बेहतर गुणवत्ता वाले पौधों का इस्तेमाल किया जाता है।
सरकारी प्रोत्साहन से किसानों की रुचि भी बढ़ी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 2023-24 और 2024-25 के दौरान इस पहल के तहत करीब 398 किसानों को 50 प्रतिशत सब्सिडी दी गई। हालांकि, पुराने अखरोट के पेड़ों को काटने से जुड़े नियम अभी भी लागू हैं।
श्रीनगर स्थित ICAR-Central Institute of Temperate Horticulture (ICAR-CITH) किसानों को अखरोट की आधुनिक खेती के लिए तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण दे रहा है।
किश्तवाड़ के किसान सुनील सिंह ने संस्थान से उच्च गुणवत्ता वाले पौधे तैयार करने, ग्रीफ्टिंग और बडिंग, परागण प्रबंधन, पुराने बागों के पुनरुद्धार और बाग की वैज्ञानिक योजना जैसे विषयों पर प्रशिक्षण लिया। उन्होंने 2021 से 2024 के बीच 70,000 रूटस्टॉक और 25,000 ग्रीफ्टेड पौधे तैयार किए। उनकी एक चयनित किस्म ‘SS-1’ को पौध किस्मों के संरक्षण के लिए PPV&FRA के तहत आवेदन किया गया है।
अक्टूबर 2025 में ICAR-CITH ने किश्तवाड़ के गुंडरना गांव में जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किया, जिसमें किसानों को पौध विविधता के संरक्षण, वैज्ञानिक उत्पादन, वैल्यू एडिशन और किस्मों के कानूनी संरक्षण की जानकारी दी गई।
ICAR-CITH की कुछ विकसित वॉलनट किस्मों में CITH Walnut-6 और CITH Walnut-7 शामिल हैं। इनकी विशेषताओं में अपेक्षाकृत मध्यम आकार, हल्के रंग की खोल, अच्छा स्वाद और करीब 50-60 प्रतिशत तक कर्नेल रिकवरी बताई जाती है।
उन्नत और ग्रीफ्टेड पौधों का एक बड़ा फायदा यह है कि वे पारंपरिक पौधों की तुलना में जल्दी फल देने की क्षमता रखते हैं। कुछ परिस्थितियों में नई तकनीक से तैयार पौधे 3-4 वर्ष में उत्पादन शुरू कर सकते हैं, जबकि पारंपरिक अखरोट के पेड़ों को उत्पादन तक पहुंचने में काफी अधिक समय लग सकता है। हालांकि, वास्तविक उत्पादन और आय किस्म, जलवायु, मिट्टी, पौध प्रबंधन और बाजार भाव पर निर्भर करती है।
अखरोट की पारंपरिक खेती की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक कटाई के दौरान होने वाली दुर्घटनाएं हैं। पुराने पेड़ काफी ऊंचे हो सकते हैं और फल तोड़ने के लिए मजदूरों को पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है। गिरने से गंभीर चोट का खतरा बना रहता है।
इसी वजह से छोटे आकार के ग्रीफ्टेड पेड़ और वैज्ञानिक बाग प्रबंधन केवल उत्पादकता ही नहीं, बल्कि किसानों और मजदूरों की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
उत्पादन बढ़ने के साथ अखरोट की कटाई के बाद की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो जाती है। छंटाई, सफाई, सुखाने, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और भंडारण के पारंपरिक तरीकों से उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। आधुनिक पोस्ट-हार्वेस्ट तकनीकों को अपनाने से अखरोट की गुणवत्ता बनाए रखने और बेहतर बाजार मूल्य हासिल करने में मदद मिल सकती है।
भारत में अखरोट की घरेलू मांग और बाजार की संभावनाएं किसानों के लिए महत्वपूर्ण अवसर पैदा करती हैं। देश को अपनी मांग पूरी करने के लिए आयात पर भी निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाना जम्मू-कश्मीर के अखरोट उत्पादकों के लिए बड़ा अवसर बन सकता है।
इसी दिशा में उच्च उत्पादकता वाली किस्मों, बेहतर पौध सामग्री और हाई-डेंसिटी बागानों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ‘Chandler’ जैसी किस्मों के पौधों को भी भारत में लाने की पहल की गई है।
अखरोट की खेती को अधिक सुरक्षित और लाभदायक बनाने के लिए किसान:
जम्मू-कश्मीर की अखरोट खेती अब धीरे-धीरे पारंपरिक बागवानी से आधुनिक और अधिक व्यवस्थित उत्पादन की ओर बढ़ रही है। छोटे आकार के ग्रीफ्टेड पौधे, हाई-डेंसिटी बागान, वैज्ञानिक प्रबंधन और बेहतर पोस्ट-हार्वेस्ट तकनीक किसानों के लिए नई संभावनाएं खोल रहे हैं।