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हम कितनी गर्मी सहन कर सकते हैं? जानिए कितनी ठंडी जगह पर रहना है जरूरी!

क्या आप जानते हैं कि गर्मी आपकी जान भी ले सकती है? जब पारा चढ़ता है, तो आपकी सहनशीलता की असली परीक्षा शुरू होती है और वो सीमा शायद आपको हैरान कर दे!
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 30, 2026

hamara sharir kitna temperature jhel sakta hai

प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

गर्मी और उमस का संगम अब सिर्फ असहज नहीं, बल्कि जानलेवा हो सकता है। वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया है कि मानव शरीर की गर्मी सहन करने की क्षमता सीमित है और यह सीमा हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं कम हो सकती है।

Wet‑Bulb तापमान: असली खतरा क्या है?

वैज्ञानिकों ने “wet‑bulb temperature” (Tₙ) को मानव गर्मी सहनशीलता का सबसे सटीक माप माना है - यह तापमान और नमी दोनों को मिलाकर बताता है कि शरीर पसीने के माध्यम से कितनी गर्मी बाहर निकाल सकता है। यदि यह तापमान 35°C तक पहुंच जाए, तो शरीर का तापमान नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है - यह वह सीमा है जहां शरीर का प्राकृतिक ठंडा होने का सिस्टम काम करना बंद कर देता है।

लेकिन नए शोध बताते हैं कि यह सीमा और भी कम हो सकती है। उदाहरण के लिए, एक अध्ययन में पाया गया कि 31°C wet‑bulb तापमान पर भी युवा स्वस्थ लोग लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकते। इसका मतलब है कि 35°C की सीमा एक आदर्श स्थिति में ही लागू होती है - वास्तविक जीवन में यह सीमा अक्सर उससे कम होती है।

नए प्रयोगों से मिली जानकारी

हाल के एक प्रयोग में 36 युवा, बिना गर्मी के आदी, स्वस्थ वयस्कों को 32–35°C wet‑bulb तापमान में 8 घंटे तक बैठकर हल्का काम करने के लिए रखा गया। परिणाम बताते हैं:

  • 32–33°C पर शरीर तापमान संतुलित रहा (compensable)।
  • 34–35°C पर शरीर का कोर तापमान लगातार बढ़ा (uncompensable)।
  • 35°C पर पुरुषों में जीवन-खतरे वाली स्थिति तक पहुंचने का समय 7.1–7.7 घंटे था, जबकि महिलाओं में यह 8.3–8.6 घंटे था।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि 35°C wet‑bulb तापमान पर भी शरीर कुछ समय तक टिक सकता है, लेकिन यह सीमा बहुत नजदीक है और इससे ऊपर जाना खतरनाक हो सकता है।

विभिन्न परिस्थितियों में सहनशीलता में अंतर

एक अन्य अध्ययन ने यह दिखाया कि 35°C wet‑bulb तापमान की सीमा केवल आदर्श परिस्थितियों (छाया, हाइड्रेशन, आराम) में ही लागू होती है। असल जीवन में, विशेषकर धूप, उमस और उम्र बढ़ने के साथ यह सीमा और भी कम हो जाती है। वृद्धों के लिए यह सीमा 21.9–33.7°C तक भी हो सकती है, जो युवा लोगों से कई डिग्री कम है।

गर्मी का असर: सिर्फ तापमान नहीं, जीवन पर असर

गर्मी सिर्फ असहज नहीं होती; यह हमारे शरीर और दिमाग दोनों पर असर डालती है। एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि यदि रात का तापमान 26°C से ऊपर बना रहे, तो शरीर को आराम नहीं मिलता और लगातार शारीरिक और मानसिक कार्यों में गिरावट आती है। यह खासकर बुजुर्गों, बच्चों, और पहले से बीमार लोगों के लिए खतरनाक है।

गर्मी और उमस का बढ़ता खतरा

एक अध्ययन के अनुसार, 2024 में वैश्विक स्तर पर लोग औसतन 41 दिन अधिक खतरनाक गर्मी का सामना कर चुके हैं, जो 1970 के दशक की तुलना में काफी अधिक है। इसका मतलब है कि हम पहले से ही उन सीमाओं के करीब पहुंच रहे हैं जहां मानव शरीर को खतरा हो सकता है।

यह जानकारी सिर्फ वैज्ञानिक नहीं है, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन के लिए अहम है:

  • अगर wet‑bulb तापमान 30–32°C तक पहुंच जाए, तो भी सावधानी जरूरी है।
  • बुजुर्ग, बच्चे, और पहले से बीमार लोग कम तापमान पर भी जोखिम में हो सकते हैं।
  • रात में ठंडक न मिलना, लगातार गर्मी में रहना, और उमस का बढ़ना - ये सब मिलकर स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

क्या कर सकते हैं हम?

यहां कुछ व्यावहारिक सुझाव हैं जो आप और आपका परिवार अपनाकर गर्मी के खतरों को कम कर सकते हैं:

  • घर में छाया और हवा का प्रवाह बनाए रखें - पंखा, कूलर, या एयर कंडीशनर का इस्तेमाल करें।
  • दिन के सबसे गर्म समय (दोपहर 12 से शाम 4 बजे) में बाहर निकलने से बचें।
  • खूब पानी पिएं और हल्का, ढीला कपड़ा पहनें।
  • बुजुर्गों और बच्चों की देखभाल में विशेष ध्यान दें - वे जल्दी गर्मी से प्रभावित हो सकते हैं।
  • रात में तापमान 26°C से नीचे लाने की कोशिश करें - पंखा, ठंडा पानी, या गीले तौलिये से मदद मिल सकती है।

वैज्ञानिक लगातार यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अलग‑अलग उम्र, स्वास्थ्य और परिस्थितियों में मानव शरीर गर्मी को कैसे सहन करता है। हमें भी अपने आसपास के वातावरण और मौसम अलर्ट पर ध्यान देना चाहिए। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी, हमें अपने घर, स्कूल, खेत और समाज में ठंडक और सुरक्षा के उपाय मजबूत करने होंगे।

गर्मी की सीमा अब सिर्फ तापमान नहीं, बल्कि जीवन की सीमा बन चुकी है।