
बाढ़, सूखे और पानी के बढ़ते संकट के बीच जलवायु-सक्षम खेती किसानों के लिए नई राह बन सकती है। (फोटो : AI. )
भारत की खेती के सामने अब चुनौती केवल मानसून की मात्रा नहीं है। बारिश कब होगी, कितनी तेज़ होगी और कितने दिनों के अंतराल के बाद होगी-ये सभी बातें खेती के जोखिम को प्रभावित कर रही हैं। एक ओर कम बारिश और लंबे शुष्क दौर फसल की उत्पादकता पर दबाव डालते हैं, तो दूसरी ओर कम समय में होने वाली अत्यधिक बारिश खेतों में जलभराव और फसल नुकसान का कारण बन सकती है।
| बदलता मौसम | नई खेती | किसानों के अवसर |
|---|---|---|
| बाढ़, सूखा और अनियमित बारिश से बढ़ रहा फसल जोखिम | सूक्ष्म सिंचाई, जल-संचयन और जलवायु-सहिष्णु बीजों पर जोर | कम पानी वाली फसलें, विविधीकरण और मौसम आधारित सलाह |
| बारिश का समय और वितरण भी बन रहा चुनौती | मिट्टी की नमी बचाने और पानी की दक्षता बढ़ाने की जरूरत | फसल चक्र में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलाव |
यही वजह है कि भारत में Climate-Proof Farming यानी जलवायु-सक्षम खेती पर ध्यान बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य मौसम को बदलना नहीं, बल्कि खेती की ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जो सूखे, अधिक बारिश, बढ़ते तापमान और पानी की कमी जैसे जोखिमों के सामने अपेक्षाकृत अधिक टिकाऊ हो।
पारंपरिक खेती में किसान लंबे समय से स्थानीय मौसम चक्र के अनुभव के आधार पर फसल का चुनाव करते रहे हैं। लेकिन बदलती जलवायु में केवल पुराने अनुभव पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता। फसल का चुनाव अब मिट्टी, पानी की उपलब्धता, स्थानीय मौसम और बाजार की मांग को साथ रखकर करना अधिक जरूरी होता जा रहा है।
ऐसी स्थिति में कम अवधि में तैयार होने वाली, सूखा-सहिष्णु या जलभराव सहने वाली फसल किस्मों का महत्व बढ़ जाता है। अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्मों का चयन जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
खेती में पानी की दक्षता बढ़ाना जलवायु-सक्षम कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियां पानी को सीधे पौधे के पास पहुंचाने में मदद करती हैं। इससे अनावश्यक पानी की खपत घटाने और उपलब्ध जल का बेहतर उपयोग करने की संभावना बढ़ती है।
इसके साथ खेत-तालाब, वर्षाजल संचयन, मेड़बंदी, मल्चिंग और मिट्टी में नमी संरक्षण जैसी स्थानीय तकनीकें भी महत्वपूर्ण हैं। इन उपायों का लाभ केवल पानी बचाने तक सीमित नहीं है। मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखने से फसल को कम बारिश वाले दौर में भी सहारा मिल सकता है।
कृषि अनुसंधान संस्थान लंबे समय से जलवायु-सक्षम किस्मों, संसाधन दक्षता, जल प्रबंधन और फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। इसका संकेत साफ है—भविष्य की खेती में पानी की हर बूंद की उत्पादकता महत्वपूर्ण होगी।
जलवायु जोखिम बढ़ने पर एक ही फसल या एक ही फसल चक्र पर अत्यधिक निर्भरता किसान के लिए जोखिम बढ़ा सकती है। ऐसे में क्षेत्र के अनुसार दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और कम पानी की जरूरत वाली फसलों को फसल प्रणाली में शामिल करने की संभावना बढ़ती है।
हालांकि फसल चक्र बदलने का निर्णय केवल मौसम देखकर नहीं किया जाना चाहिए। स्थानीय मिट्टी, सिंचाई, बीज की उपलब्धता, बाजार मूल्य और सरकारी कृषि सलाह को ध्यान में रखना जरूरी है। गलत फसल चयन से जलवायु जोखिम कम होने के बजाय आर्थिक जोखिम बढ़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन खेती के लिए चुनौती है, लेकिन यही स्थिति कुछ नए अवसर भी पैदा कर रही है। मौसम आधारित कृषि सलाह, डिजिटल कृषि, सटीक सिंचाई, संरक्षित खेती, कृषि-वनीकरण और फसल विविधीकरण किसानों को बदलती परिस्थितियों के अनुकूल बनाने में मदद कर सकते हैं।
आने वाले समय में सफल किसान वह नहीं होगा जो केवल ज्यादा उत्पादन करे, बल्कि वह भी होगा जो कम पानी, बदलते मौसम और बढ़ते जोखिम के बीच स्थिर उत्पादन बनाए रख सके।
भारत के लिए Climate-Proof खेती किसी एक तकनीक का नाम नहीं है। यह बीज से लेकर पानी, मिट्टी, फसल चक्र और बाजार तक पूरी कृषि व्यवस्था को बदलते मौसम के अनुरूप ढालने की रणनीति है। यही बदलाव खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के साथ किसान की आय के जोखिम को भी कम कर सकता है।
Updated on:
30 Aug 2026 01:35 pm
Published on:
30 Aug 2026 01:28 pm
