
The Taj Mahal Symbol of Love: दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल अब सिर्फ इतिहास और वास्तुकला की मिसाल भर नहीं रह गया है, यह इस समय वैज्ञानिकों, अदालतों और संरक्षणविदों के बीच एक गंभीर बहस के केंद्र में है। हाल के महीनों में सामने आए तथ्य बताते हैं कि 17वीं सदी का यह मकबरा जितना खूबसूरत है, उतना ही नाजुक भी हो चला है।
पिछले कुछ समय से ताजमहल पर बढ़ते पर्यटकों के दबाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट सक्रिय रहा है। कोर्ट के निर्देश पर सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी (CEC) ने स्मारक की तथाकथित 'केयरिंग कैपेसिटी' यानी बिना नुकसान पहुंचाए एक समय में कितने पर्यटक ताजमहल के अंदर रह सकते हैं, यह सीमा तय करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन का सुझाव दिया।
नवंबर 2025 में CEC ने अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए ताजमहल समेत अन्य स्मारकों पर बढ़ती भीड़ पर चिंता जताई, जिसके बाद IIT दिल्ली की एक टीम ने सर्वे शुरू किया ताकि, प्रवेश नियमों को वैज्ञानिक आधार पर सीमित किया जा सके। दिलचस्प बात यह है कि यह कवायद बिल्कुल नई नहीं है।
2015 में भी नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEIRI) ने इसी तरह का अध्ययन किया था, लेकिन उस पर अमल कभी पूरी तरह नहीं हो सका। अब दस साल बाद यह मुद्दा फिर अदालत की निगरानी में लौटा है।
ताजमहल की चार मीनारें देखने में बिल्कुल सीधी लगती हैं, लेकिन वास्तुकला के जानकार बताते हैं कि इन्हें मुख्य गुंबद से हल्का-सा बाहर की ओर झुकाकर बनाया गया था। यह कोई निर्माण-दोष नहीं, बल्कि सोची-समझी इंजीनियरिंग थी।
अगर कभी भूकंप जैसी आपदा में मीनारें गिरतीं, तो वे मुख्य मकबरे से दूर, बाहर की तरफ गिरतीं, न कि मूल संरचना और मुमताज महल की कब्र पर। यही वजह है कि नजदीक से देखने पर गुंबद असल आकार से बड़ा दिखाई देता है, जबकि दूर से यह पूरी तरह संतुलित नजर आता है। यह ऑप्टिकल भ्रम मुगल वास्तुकारों की बारीक समझ का नमूना है।
आगरा और आसपास के इलाकों में औद्योगिक प्रदूषण तथा वाहनों के धुएं से निकलने वाले सल्फर व नाइट्रोजन ऑक्साइड, बारिश के पानी के साथ मिलकर अम्ल वर्षा का रूप ले लेते हैं।
यह अम्लीय पानी जब सफेद संगमरमर की सतह पर पड़ता है, तो संगमरमर की चमक फीकी पड़ने लगती है और उस पर पीलापन व भूरापन छा जाता है। इसी प्रक्रिया को विज्ञान की भाषा में 'मार्बल कैंसर' कहा जाता है।
यही कारण है कि पिछले कुछ दशकों में ताजमहल के आसपास 500 मीटर के दायरे में कोयला और डीजल जनरेटर पर पाबंदी जैसे कदम उठाए गए, फिर भी शहर की हवा की गुणवत्ता इसे लगातार चुनौती देती रहती है।
2023 के मानसून में यमुना का जलस्तर आगरा में खतरे के निशान से ऊपर पहुंच गया था और बाढ़ का पानी ताजमहल की लाल बलुआ पत्थर की चारदीवारी तक जा पहुंचा था। ऐसा नजारा शहर ने 1978 के बाद पहली बार देखा था।
हालांकि पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकारियों ने साफ किया कि मकबरा एक ऊंचे चबूतरे पर बना है और इसकी डिजाइन ही ऐसी है कि बाढ़ का पानी मुख्य संरचना तक पहुंच ही नहीं सकता। लेकिन विशेषज्ञ इस बात को लेकर सहमत हैं कि यमुना का घटता प्रवाह असल में ज्यादा बड़ी चिंता है।
नदी में पानी कम होने से नींव में लगी लकड़ी की परतें सूखकर कमजोर हो सकती हैं, जिससे संरचनात्मक स्थिरता को दीर्घकालिक खतरा पैदा होता है।
मुमताज महल की मृत्यु 1631 में बुरहानपुर (मध्य प्रदेश) में हुई थी, अपनी 14वीं संतान को जन्म देने के दौरान। उन्हें वहां अस्थायी रूप से दफनाया गया था और करीब छह महीने बाद ही उनके अवशेष आगरा लाए गए, जहां ताजमहल का निर्माण शुरू हुआ।
19वीं सदी में अंग्रेजों के बीच यह धारणा फैली कि इतनी खूबसूरत इमारत का श्रेय किसी यूरोपीय वास्तुकार (उस्ताद ईसा) को जाना चाहिए। लेकिन इतिहासकार अब मानते हैं कि यह कहानी औपनिवेशिक सोच से गढ़ी गई थी। मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी थे, जो भारतीय-फारसी परंपरा से जुड़े थे।
प्याज के आकार का मुख्य गुंबद करीब 18.4 मीटर व्यास और 12 मीटर ऊंचाई के बेलनाकार आधार पर टिका है। यह इंजीनियरिंग उस दौर के लिए बेहद उन्नत मानी जाती है।
संगमरमर पर उकेरी गई कैलिग्राफी को दूर और नजदीक से देखने पर एक जैसा अनुपात दिखे, इसके लिए ऊपर की आयतों के अक्षर नीचे वालों से बड़े बनाए गए हैं। यह एक ऑप्टिकल करेक्शन तकनीक थी।
संगमरमर राजस्थान के मकराना से आया, जबकि नक्काशी में इस्तेमाल हुए कीमती पत्थर फिरोजा, तिब्बत से, नीलम, श्रीलंका से, और जेड-क्रिस्टल चीन से मंगाए गए थे।
मुख्य मकबरा 1648 तक बनकर तैयार हो गया था, लेकिन बगीचे, मस्जिद और अन्य ढांचों पर काम अगले पांच साल यानी 1653 तक चलता रहा।
भीड़ नियंत्रण, प्रदूषण और नदी का जलस्तर, ये तीनों मुद्दे मिलकर बताते हैं कि ताजमहल का संरक्षण अब सिर्फ सफाई या रंग-रोगन का काम नहीं, बल्कि डेटा, वैज्ञानिक निगरानी और अदालती हस्तक्षेप का विषय बन चुका है।
आने वाले महीनों में IIT दिल्ली की रिपोर्ट के आधार पर प्रवेश नियमों में बदलाव संभव है, जिससे पर्यटकों को शायद कम भीड़ में, लेकिन ज्यादा सुकून के साथ इस अद्भुत इमारत को निहारने का मौका मिलेगा।