
UPSC सिविल सेवा परीक्षा को आमतौर पर योग्यता, मेहनत और रणनीति की परीक्षा माना जाता है। लेकिन हर उम्मीदवार एक जैसी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से तैयारी शुरू नहीं करता। परिवार की आर्थिक स्थिति, स्कूल-कॉलेज की गुणवत्ता, शहर या गांव में रहने की स्थिति, डिजिटल संसाधनों तक पहुंच और सामाजिक नेटवर्क जैसे कई कारक तैयारी के अवसरों को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें जाति भी भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण सामाजिक संरचना है।
इसका मतलब यह नहीं कि किसी जाति का उम्मीदवार अपने आप सफल या असफल हो जाता है। बल्कि सवाल यह है कि तैयारी शुरू करने से पहले अलग-अलग उम्मीदवारों के पास अवसर और संसाधनों की स्थिति कितनी समान है।
UPSC की तैयारी आमतौर पर उच्च शिक्षा के बाद शुरू होती है। इसलिए उच्च शिक्षा तक पहुंच और उसकी गुणवत्ता महत्वपूर्ण हो जाती है। AISHE के आंकड़े सामाजिक समूहों के बीच उच्च शिक्षा में नामांकन के अंतर को समझने का एक आधार देते हैं। हालांकि, केवल GER के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी समुदाय की UPSC तैयारी कमजोर है। इसके पीछे आर्थिक स्थिति, क्षेत्र, स्कूल शिक्षा, लिंग और अन्य सामाजिक कारक भी काम करते हैं।
यानी UPSC में असमानता को समझने के लिए केवल परीक्षा के दिन को देखना पर्याप्त नहीं है। तैयारी की शुरुआती रेखा तक पहुंचने का रास्ता भी देखना होगा।
UPSC में आरक्षण व्यवस्था SC, ST, OBC और EWS समेत निर्धारित श्रेणियों के उम्मीदवारों को अवसर देती है। सिविल सेवा परीक्षा के 2026 के नियमों में आरक्षण और संबंधित छूटों का स्पष्ट प्रावधान है।
लेकिन आरक्षण का संबंध मुख्य रूप से चयन प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व और अवसर से है। यह अपने आप महंगी कोचिंग, दिल्ली में रहने का खर्च, अध्ययन सामग्री, इंटरनेट, शांत अध्ययन स्थल या लंबे समय तक तैयारी करने की आर्थिक क्षमता उपलब्ध नहीं कराता। इसलिए सामाजिक असमानता का सवाल केवल 'आरक्षण किसे मिला?' तक सीमित करना अधूरा होगा।
समाजशास्त्री पियरे बोरदियू के “सांस्कृतिक पूंजी” के सिद्धांत के जरिए इसे समझा जा सकता है। किसी उम्मीदवार के पास किताबें होना ही पर्याप्त नहीं है। उसे यह भी पता होना चाहिए कि कौन-सी किताब पढ़नी है, उत्तर कैसे लिखना है, परीक्षा की रणनीति क्या होनी चाहिए और अनुभवी लोगों से सलाह कहां मिलेगी।
जिस परिवार या सामाजिक वातावरण में पहले से उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का अनुभव मौजूद है, वहां उम्मीदवार को मार्गदर्शन जल्दी मिल सकता है।
इसके विपरीत, पहली पीढ़ी के अभ्यर्थी को कई चीजें खुद सीखनी पड़ सकती हैं। यही अंतर तैयारी के समय और लागत दोनों को प्रभावित कर सकता है।
उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठित संस्थानों में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। उदाहरण के लिए, IIT दिल्ली के 2025 के आंकड़ों में 642 फैकल्टी सदस्यों में केवल 20 SC और 8 ST सदस्य थे। संस्थान के छात्रों और शिक्षकों ने प्रतिनिधित्व तथा संस्थागत समर्थन से जुड़े मुद्दे भी उठाए थे।
इस तरह के आंकड़े सीधे यह साबित नहीं करते कि UPSC की तैयारी में जातिगत भेदभाव होता है। लेकिन वे यह जरूर दिखाते हैं कि प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है।
UPSC कोचिंग केंद्रों में अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार एक साथ आते हैं। यहां जाति, क्षेत्र, भाषा और आर्थिक स्थिति जैसे अंतर मौजूद हो सकते हैं।
लेकिन यह कहना कि कोचिंग संस्थानों में जातिगत टकराव “आम बात” है, व्यापक प्रमाण के बिना सही नहीं होगा। हां, यदि किसी उम्मीदवार को उसकी जाति या सामाजिक पहचान के कारण भेदभाव या अलगाव का सामना करना पड़ता है, तो यह उसकी पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए कोचिंग संस्थानों में समान व्यवहार और शिकायत निवारण की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
UPSC की तैयारी स्वयं अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। असफल प्रयास, आर्थिक दबाव, परिवार की अपेक्षाएं और लंबी तैयारी मानसिक तनाव बढ़ा सकते हैं। यदि इसके साथ सामाजिक भेदभाव या अपनी पहचान को लेकर असुरक्षा भी जुड़ जाए, तो दबाव और बढ़ सकता है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में SC/ST छात्रों ने भेदभाव, मानसिक स्वास्थ्य और संस्थागत समर्थन से जुड़ी चिंताएं उठाई हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि सामाजिक पहचान और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, इसे हर UPSC उम्मीदवार के अनुभव के रूप में देखना सही नहीं होगा।
आज UPSC की तैयारी में ऑनलाइन कक्षाएं, टेस्ट सीरीज, डिजिटल पुस्तकालय और वीडियो व्याख्यान महत्वपूर्ण संसाधन बन चुके हैं। इसलिए इंटरनेट और उपकरणों तक पहुंच भी तैयारी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।
ग्रामीण या कम आय वाले परिवारों के उम्मीदवारों के लिए महंगा स्मार्टफोन, लैपटॉप, तेज इंटरनेट और शांत अध्ययन स्थान हमेशा आसानी से उपलब्ध नहीं होते। यह समस्या केवल जाति की नहीं है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानताएं कई बार एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।
नहीं। UPSC की सफलता को जाति के आधार पर समझना एकतरफा दृष्टिकोण होगा। परीक्षा में व्यक्तिगत मेहनत, अध्ययन रणनीति, शिक्षा, आर्थिक स्थिति, परिवार का समर्थन, प्रयासों की संख्या और मानसिक दृढ़ता जैसे अनेक कारक काम करते हैं।
UPSC के 2025 के अंतिम परिणाम में 958 उम्मीदवारों की सिफारिश हुई। इनमें 317 सामान्य, 104 EWS, 306 OBC, 158 SC और 73 ST उम्मीदवार शामिल थे। यह चयन में सामाजिक श्रेणियों की मौजूदगी दिखाता है, लेकिन केवल परिणामों से तैयारी के दौरान मौजूद सभी सामाजिक और आर्थिक अंतर नहीं समझे जा सकते।
सबसे जरूरी है कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी को केवल महंगी कोचिंग तक सीमित न रखा जाए।