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बिहार में तैयार हुआ गुलाबी मशरूम, 20–25 दिन में फसल! धान-गेहूं के अवशेष से किसान बढ़ा सकते हैं कमाई

Pink Oyster Mushroom Farming : बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने विकसित की पिंक ऑयस्टर मशरूम की नई किस्म। जानिए 20-25 दिन में कृषि अवशेषों से बेहतर उत्पादन और कमाई का तरीका।
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Pink Oyster Mushroom Farming

Pink Oyster Mushroom Farming : कैसे करें मशरूम की खेती, PC- Chatgpt

मशरूम की खेती किसानों के लिए कम जमीन और अपेक्षाकृत कम समय में अतिरिक्त आय का विकल्प बन रही है। अब बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर, भागलपुर के वैज्ञानिकों ने पिंक ऑयस्टर मशरूम की एक ऐसी किस्म विकसित की है, जो गर्म और आर्द्र मौसम में भी खेती के लिए उपयोगी हो सकती है। इसकी खासियत इसका करीब 20–25 दिन का छोटा उत्पादन चक्र, रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोध और कृषि अवशेषों पर उगने की क्षमता बताई गई है।

पिंक ऑयस्टर मशरूम की क्या है खासियत?

BAU के पिंक मशरूम प्रोजेक्ट के तहत विकसित इस किस्म पर वैज्ञानिक स्नेहा शिखा ने काम किया है। परियोजना का मार्गदर्शन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने किया। शोध में इसकी उत्पादकता, वृद्धि, रोग प्रतिरोध, कृषि अवशेषों पर विकास और व्यावसायिक संभावनाओं का अध्ययन किया गया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार यह मशरूम करीब 30 डिग्री सेल्सियस तापमान और 80–90 प्रतिशत आर्द्रता वाले वातावरण में अच्छी तरह विकसित हो सकता है। यही वजह है कि गर्म और आर्द्र मौसम वाले बिहार जैसे क्षेत्रों में इसकी खेती की संभावना देखी जा रही है।

इसकी एक और खासियत यह है कि इसे धान और गेहूं के अवशेष जैसे लिग्नोसेलुलोसिक पदार्थों पर उगाया जा सकता है। यानी खेती से निकलने वाले कुछ अवशेषों को उत्पादन में इस्तेमाल करके अतिरिक्त मूल्य पैदा किया जा सकता है।

20–25 दिन का चक्र क्यों महत्वपूर्ण है?

मशरूम खेती में उत्पादन चक्र जितना छोटा होगा, किसान उतनी जल्दी फसल बाजार में ला सकता है। BAU की पिंक ऑयस्टर किस्म का चक्र करीब 20–25 दिन बताया गया है। इससे नियमित उत्पादन की योजना बनाना आसान हो सकता है और किसान अपेक्षाकृत कम समय में अगला उत्पादन चक्र शुरू कर सकता है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर किसान को 20–25 दिन में निश्चित मुनाफा मिलेगा। वास्तविक उत्पादन पर स्पॉन की गुणवत्ता, तापमान, नमी, स्वच्छता, सब्सट्रेट और बाजार मूल्य का असर पड़ेगा।

रंग और स्वाद बन सकते हैं बाजार की ताकत

पिंक ऑयस्टर का आकर्षक गुलाबी रंग इसे सामान्य सफेद या भूरे ऑयस्टर मशरूम से अलग पहचान देता है। BAU के वैज्ञानिकों ने इसके स्वाद और बाजार आकर्षण को भी इसकी संभावित व्यावसायिक खूबियों में शामिल किया है।

लेकिन किसी नई किस्म की बाजार क्षमता का वास्तविक आकलन स्थानीय मांग, ग्राहक पसंद और बिक्री मूल्य के आधार पर ही किया जा सकता है। इसलिए बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू करने से पहले किसान स्थानीय बाजार में इसकी मांग जरूर जांचें।

मशरूम खेती में कृषि अवशेष बन रहे हैं कमाई का साधन

मशरूम खेती का बड़ा फायदा यह है कि इसमें धान और गेहूं के भूसे जैसे कृषि अवशेषों का उपयोग सब्सट्रेट के रूप में किया जा सकता है। इससे फसल अवशेषों का उपयोग बढ़ता है और खेती के संसाधनों को दोबारा उत्पादन में लगाने का रास्ता मिलता है।

ICAR के एक अध्ययन में भी झारखंड में धान के भूसे का इस्तेमाल कर ऑयस्टर मशरूम उत्पादन को छोटे और सीमांत किसानों के लिए अतिरिक्त आय के विकल्प के रूप में सफल पाया गया। 2019 में 57 किसानों ने प्रशिक्षण के बाद खेती शुरू की और कुल 3,081 किलोग्राम मशरूम उत्पादन से ₹3.97 लाख की आय हासिल की। अध्ययन में औसत लाभ-लागत अनुपात 3.8 रहा।

भारत में बढ़ रहा है मशरूम का दायरा

भारत में मशरूम उत्पादन पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ा है। ICAR के शोध के अनुसार देश में मशरूम उत्पादन 2000-01 के करीब 0.05 मिलियन टन से बढ़कर 2020-21 में 0.23 मिलियन टन हो गया। इस वृद्धि में ICAR-डायरेक्टोरेट ऑफ मशरूम रिसर्च, सोलन और AICRP-मशरूम से जुड़े शोध एवं तकनीकी विकास की भूमिका रही है।

देश में व्यावसायिक स्तर पर मुख्य रूप से बटन, ऑयस्टर, मिल्की, पैडी स्ट्रॉ और शिटाके जैसे मशरूम उगाए जाते हैं। किस्म का चुनाव तापमान, नमी, उपलब्ध सब्सट्रेट और बाजार के हिसाब से करना चाहिए।

मशरूम में सिर्फ उत्पादन नहीं, वैल्यू एडिशन भी जरूरी

ताजा मशरूम जल्दी खराब हो सकता है। इसलिए किसान केवल उत्पादन बढ़ाने के बजाय सूखा मशरूम, पाउडर, अचार, नमकीन और अन्य खाद्य उत्पाद बनाकर बाजार का दायरा बढ़ा सकते हैं।

ICAR की नालंदा की एक सफलता कहानी में महिला उद्यमी मधु पटेल ने मशरूम उत्पादन के साथ मूल्यवर्धित उत्पादों पर काम किया। उन्होंने मशरूम से अचार, नमकीन, सेव, लड्डू और मठरी जैसे उत्पाद तैयार किए। यही मॉडल मशरूम खेती को केवल फसल नहीं, बल्कि छोटे ग्रामीण व्यवसाय में बदल सकता है।

पिंक ऑयस्टर की खेती शुरू करने से पहले इन बातों का ध्यान रखें

नई किस्म देखकर तुरंत बड़े पैमाने पर निवेश करना सही नहीं होगा। किसान पहले प्रशिक्षण लें और छोटे स्तर पर परीक्षण करें।

ध्यान रखें-

  • अच्छी गुणवत्ता वाला प्रमाणित स्पॉन ही लें।
  • कमरे में तापमान और आर्द्रता नियंत्रित रखें।
  • स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें।
  • सब्सट्रेट की सही तैयारी करें।
  • उत्पादन शुरू करने से पहले बाजार और खरीदार तय करें।
  • स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या KVK से प्रशिक्षण लें।
  • बड़े निवेश से पहले छोटी इकाई में उत्पादन का परीक्षण करें।

BAU की ओर से भी इस किस्म की उत्पादन तकनीक विकसित करने, प्रशिक्षण और विस्तार गतिविधियों के जरिए जानकारी किसानों तक पहुंचाने का काम जारी है। विश्वविद्यालय ने स्पॉन उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रयास की बात कही है। साथ ही, दूसरी ऑयस्टर किस्मों के साथ तुलनात्मक परीक्षण जारी रखने पर जोर दिया गया है, ताकि उत्पादकता और लाभप्रदता की अधिक विश्वसनीय जानकारी मिल सके।

किसानों के लिए नई संभावना

पिंक ऑयस्टर मशरूम की नई किस्म बिहार के गर्म मौसम में मशरूम उत्पादन का दायरा बढ़ाने की संभावना दिखाती है। 20–25 दिन का छोटा चक्र, गर्म-आर्द्र वातावरण में अनुकूलता और कृषि अवशेषों का इस्तेमाल इसे दिलचस्प विकल्प बनाते हैं।

लेकिन असली सफलता केवल उत्पादन से नहीं आएगी। स्पॉन की गुणवत्ता, स्वच्छ उत्पादन, लागत नियंत्रण, स्थानीय बाजार और बिक्री मूल्य मिलकर तय करेंगे कि किसान को कितना मुनाफा मिलेगा।