
चुनाव में कई बार मतदाता के सामने सवाल होता है, अगर कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो क्या करें? इसी सवाल का जवाब है NOTA यानी None of the Above। ईवीएम में यह विकल्प उस मतदाता को मिलता है जो चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं करना चाहता।
भारत में NOTA की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के 27 सितंबर 2013 के फैसले के बाद हुई। इसके बाद 2013 के विधानसभा चुनावों से इसका इस्तेमाल शुरू हुआ और 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार पूरे देश में मतदाताओं को यह विकल्प मिला।
लेकिन NOTA को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी आज भी यही है। अगर NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिल जाएं तो क्या चुनाव रद्द हो जाएगा? जवाब है- नहीं।
NOTA का इस्तेमाल करने वाला मतदाता यह दर्ज करता है कि उसे किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना है। लेकिन भारत में NOTA को अभी ‘Right to Reject’ यानी उम्मीदवारों को खारिज करने का कानूनी अधिकार नहीं मिला है।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि अगर NOTA को किसी सीट पर सबसे ज्यादा वोट भी मिल जाएं, तब भी सबसे ज्यादा वोट पाने वाला वास्तविक उम्मीदवार ही विजेता घोषित होगा।
इसे एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी सीट पर उम्मीदवार A को 40,000 वोट मिले, उम्मीदवार B को 35,000, उम्मीदवार C को 20,000 और NOTA को 50,000 वोट मिले।
यहां NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिले। फिर भी उम्मीदवार A नहीं, बल्कि उम्मीदवार B? नहीं- सही नियम के मुताबिक वास्तविक उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार A ही विजेता होगा। यानी NOTA चुनाव का परिणाम पलटता नहीं है।
NOTA का सबसे बड़ा फायदा राजनीतिक संदेश है। 2013 से पहले मतदाता अगर किसी उम्मीदवार को पसंद नहीं करता था तो उसके पास चुनावी प्रक्रिया के भीतर अपनी असहमति दर्ज करने का आज जैसा गोपनीय विकल्प नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने NOTA के जरिए मतदाता को यह अधिकार दिया कि वह किसी भी उम्मीदवार को वोट दिए बिना अपनी पसंद सार्वजनिक किए बगैर अपनी असहमति दर्ज कर सके।
यानी NOTA का असर फिलहाल कानूनी से ज्यादा राजनीतिक है। अगर किसी सीट पर लगातार बड़ी संख्या में लोग NOTA दबाते हैं तो राजनीतिक दलों के लिए यह संकेत हो सकता है कि मतदाताओं को उनके उम्मीदवार पसंद नहीं आ रहे।
लोकसभा चुनावों में NOTA का वोट प्रतिशत आम तौर पर करीब 1 प्रतिशत के आसपास रहा है। 2024 लोकसभा चुनाव में 63,71,839 वोट NOTA को मिले, जो कुल वोटों का लगभग 0.99% था। 2019 में NOTA का हिस्सा 1.06% और 2014 में 1.12% था। यानी राष्ट्रीय स्तर पर NOTA का प्रतिशत धीरे-धीरे कम हुआ है। लेकिन राष्ट्रीय औसत पूरी कहानी नहीं बताता। कुछ सीटों पर NOTA का आंकड़ा काफी बड़ा रहा है।
2024 में इंदौर लोकसभा सीट इसका सबसे बड़ा उदाहरण रही। यहां NOTA को 2,18,674 वोट, यानी लगभग 14% वोट मिले। इसका बड़ा कारण यह था कि कांग्रेस उम्मीदवार के नामांकन वापस लेने के बाद भाजपा के सामने कोई प्रमुख विपक्षी उम्मीदवार नहीं बचा था। फिर भी NOTA जीत नहीं पाया। भाजपा उम्मीदवार ही निर्वाचित हुए।
हां, कई चुनावों में NOTA ने कुछ उम्मीदवारों से ज्यादा वोट हासिल किए हैं। 2013 के विधानसभा चुनावों के बाद से ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां NOTA तीसरे या चौथे स्थान पर रहा और कुछ उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिले। शुरुआती चुनावों में छत्तीसगढ़ में NOTA का वोट शेयर विशेष रूप से ज्यादा रहा था।
लेकिन आज तक ऐसा होने पर भी सीट खाली नहीं हुई और दोबारा चुनाव नहीं कराया गया। यही भारत के NOTA मॉडल और ‘Right to Reject’ मॉडल के बीच सबसे बड़ा अंतर है।
यह सवाल सीधे-सीधे याद रखने लायक है: NOTA सबसे ज्यादा वोट पाए → चुनाव रद्द नहीं होगा → दोबारा चुनाव जरूरी नहीं → सबसे ज्यादा वोट पाने वाला वास्तविक उम्मीदवार जीतेगा। यानी NOTA को एक नकारात्मक वोट समझना ज्यादा सही है, न कि स्वतंत्र उम्मीदवार।
इसी कारण NOTA का वोट किसी उम्मीदवार के वोटों में नहीं जुड़ता और वह किसी दूसरे उम्मीदवार को ट्रांसफर भी नहीं होता।
यह सवाल राजनीतिक रूप से सबसे दिलचस्प है। NOTA का वोट सीधे किसी उम्मीदवार के खाते से नहीं कटता। लेकिन कम अंतर वाले मुकाबले में NOTA अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
मान लीजिए कोई उम्मीदवार A, 4 लाख वोट, उम्मीदवार B को 3.98 लाख, वहीं नोटा को 20 हजार वोट मिले। यहां NOTA ने किसी उम्मीदवार के वोट नहीं छीने। लेकिन अगर NOTA दबाने वाले मतदाताओं का एक हिस्सा किसी उम्मीदवार को वोट देता तो चुनाव का परिणाम बदल सकता था।
इसलिए यह कहना कि 'NOTA ने फलां पार्टी को हरा दिया' सीधे तौर पर सही नहीं है। NOTA के मतदाता किस उम्मीदवार को वोट देते, यह पता नहीं लगाया जा सकता। लेकिन राजनीतिक रणनीति के लिहाज से NOTA को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
कई मामलों में NOTA ऐसे मतदाताओं का विकल्प हो सकता है जो उम्मीदवार, पार्टी या पूरी चुनावी पेशकश से असंतुष्ट हैं। यह असंतोष कई कारणों से हो सकता है:
उम्मीदवार की छवि
आपराधिक पृष्ठभूमि
भ्रष्टाचार के आरोप
स्थानीय समस्याओं की अनदेखी
पार्टी से नाराजगी
सभी प्रमुख दलों से असहमति
विरोध दर्ज करने की इच्छा
लेकिन यह मान लेना भी गलत होगा कि हर NOTA वोट राजनीतिक व्यवस्था से पूरी तरह निराश मतदाता का वोट है। किसी सीट पर NOTA बढ़ने के पीछे स्थानीय उम्मीदवार, चुनावी बहिष्कार अभियान या खास राजनीतिक परिस्थितियां भी हो सकती हैं।
दुनिया में NOTA जैसी व्यवस्था कहां है?
भारत अकेला देश नहीं है जहां मतदाता को किसी भी उम्मीदवार के प्रति असहमति दर्ज करने का विकल्प मिलता है। हालांकि हर देश में इसका स्वरूप और कानूनी असर अलग है।
भारत सरकार की एक देश-एक चुनाव पर बनी रिपोर्ट में फ्रांस, बेल्जियम, ब्राजील, ग्रीस, यूक्रेन, चिली, बांग्लादेश और अमेरिका के नेवादा राज्य समेत कई जगहों पर नकारात्मक/तटस्थ मतदान के विकल्पों का उल्लेख किया गया है। फिनलैंड, स्वीडन, अमेरिका और कोलंबिया में खाली मत या समान विकल्पों की व्यवस्था भी बताई गई है।
इसलिए दुनिया में ‘NOTA’ नाम या उसके समान विकल्प मौजूद हैं, लेकिन हर जगह उसका परिणाम भारत जैसा नहीं है।
क्या NOTA राजनीतिक दबाव बना सकता है?
हां, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से। मान लीजिए किसी पार्टी के उम्मीदवार को 45% वोट मिलते हैं, लेकिन NOTA लगातार 5-6% तक पहुंच जाता है। राजनीतिक दल यह सवाल पूछ सकते हैं कि इतने मतदाता किसी भी उम्मीदवार को क्यों नहीं चुनना चाहते। इसीलिए NOTA को एक तरह का ‘प्रोटेस्ट सिग्नल’ माना जा सकता है।
हालांकि अभी भारत में कोई ऐसा कानूनी प्रावधान नहीं है कि NOTA एक निश्चित सीमा पार कर जाए तो राजनीतिक दल को नया उम्मीदवार उतारना ही पड़ेगा। यही वह जगह है जहां ‘NOTA’ और ‘Right to Reject’ अलग हो जाते हैं।
क्या NOTA को ‘राइट टू रिजेक्ट’ बनाया जा सकता है?
यह मांग समय-समय पर उठती रही है। इसका मतलब होगा कि अगर NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिले तो मौजूदा उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करके फिर से चुनाव कराया जाए और संभवतः पुराने उम्मीदवारों को दोबारा चुनाव लड़ने से भी रोका जाए।
Association for Democratic Reforms ने भी ऐसी व्यवस्था की सिफारिश की है- अगर NOTA सभी उम्मीदवारों से ज्यादा वोट पाए तो कोई उम्मीदवार निर्वाचित न घोषित हो और नए उम्मीदवारों के साथ दोबारा चुनाव कराया जाए। लेकिन, भारत में अभी ऐसा कोई कानून नहीं है।
NOTA कहां लागू नहीं होता?
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि NOTA हर चुनाव में उपलब्ध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के बाद निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया कि NOTA का प्रावधान प्रत्यक्ष चुनावों, जैसे लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लागू है। राज्यसभा और विधान परिषद जैसे अप्रत्यक्ष चुनावों में NOTA लागू नहीं होता।
आखिर NOTA का ‘असली खेल’ क्या है?
NOTA को लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि इसका कानूनी असर छोटा, लेकिन राजनीतिक संदेश बड़ा हो सकता है। आज अगर किसी सीट पर NOTA को 10 हजार या 20 हजार वोट मिलते हैं, तो वह चुनाव नहीं पलटता। लेकिन अगर यही संख्या लगातार बढ़ती है, तो राजनीतिक दलों के लिए यह संकेत बन सकती है कि मतदाताओं का एक हिस्सा उपलब्ध विकल्पों से संतुष्ट नहीं है।
2024 में करीब 63.7 लाख लोगों ने लोकसभा चुनाव में NOTA दबाया। राष्ट्रीय स्तर पर यह सिर्फ 0.99% है, लेकिन करोड़ों मतों के चुनाव में यह संख्या छोटी भी नहीं है।
इसलिए NOTA को न तो ‘बेकार वोट’ कहना सही है और न ही इसे ‘चुनाव रद्द कराने वाला बटन’ समझना। भारत में NOTA फिलहाल जीतता नहीं है, सरकार नहीं बनाता और चुनाव रद्द नहीं कराता। लेकिन यह मतदाता की असहमति को दर्ज करता है
और लोकतंत्र में कभी-कभी सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यही होता है कि मतदाता ने वोट तो दिया, लेकिन किसी को अपना प्रतिनिधि मानने से इनकार कर दिया।