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कचरे को बनाया कमाई का साधन: ‘वेस्ट प्लास्टिक’ से संवर रहा महिलाओं का भविष्य, घर बैठे हो रही कमाई

दिल्ली-NCR क्षेत्र में महिलाओं ने 'वेस्ट प्लास्टिक' को अपनी कमाई का जरिया बना लिया है। अपने हुनर और मेहनत की दम पर महिलाएं अपने घर पर रहकर कमाई कर रही हैं।
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Sep 05, 2026
Bags making from polythene packets
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

दिल्ली-NCR क्षेत्र के प्रत्येक घर में पैक्ड मिल्क का इस्तेमाल होता है। रोज सुबह घरों में पहुंचने वाले दूध के पैकेट इस्तेमाल होने के बाद अक्सर कूड़ेदान में पहुंच जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, हर सामान्य परिवार में प्रतिदिन 2 से 3 दूध की प्लास्टिक थैलियां निकलती हैं। देखने में मामूली सी लगने वाली यह थैलियां, जब लाखों घरों के स्तर पर पहुंचती हैं तो प्लास्टिक कचरे की समस्या का आकार काफी विकराल हो जाता है। अब महिलाओं ने इस समस्या का समाधान निकाल लिया है।

गाजियाबाद में महिलाओं की अनोखी पहल

गाजियाबाद में शक्ति फाउंडेशन ने रोजमर्रा के कचरे को उपयोगी उत्पादन में बदलने की दिशा में एक अनोखी पहल की शुरुआत की है। यह संगठन इस्तेमाल हो चुकी दूध की थैलियां, आटे के कट्टे चिप्स के पैकेट और अन्य प्रकार की प्लास्टिक पैकेजिंग सामग्री को इकट्ठा कर उनसे बेहतरीन बैग तैयार कर रहा है। इस अनोखी पहल के माध्यम से संस्था एक साथ दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा करने का प्रयास कर रही है। पहला, प्लास्टिक कचरे को पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाने से रोकना और दूसरा महिलाओं को रोजगार के साथ हुनर उपलब्ध कराना।

गाजियाबाद के वैशाली स्थित नगर निगम के ट्रिपल आर सेंटर पर शक्ति फाउंडेशन द्वारा संचालित केंद्र में वेस्ट प्लास्टिक को नए उत्पादों में बदलने का काम किया जा रहा है। यहां आने वाले प्लास्टिक सामग्री सीधे कूड़ेदान या लैंडफिल में नहीं पहुंचती बल्कि एक पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद एक बेहद शानदार बैग का रूप ले लेती है। प्लास्टिक की सफाई से लेकर कटिंग, बुनाई, सिलाई और डिजाइनिंग तक हर चरण में महिलाएं अहम भूमिका निभाती हैं।

15-20 महिलाएं कर रही है काम

वैशाली स्थित इस केंद्र पर मौजूदा समय में तकरीबन 15 से 20 महिलाएं काम कर रही हैं, इनमें एक सेंटर सुपरवाइजर भी शामिल हैं। करीब 12 से 15 महिलाएं प्लास्टिक की कटिंग और बैग बनाने की प्रक्रिया से जुड़ी है, जबकि 4 से 5 महिलाएं उत्पादों की डिजाइनिंग पर काम करती है। इसके अलावा महिलाएं प्रशिक्षण लेने के लिए केंद्र से जुड़ती रहती हैं।

गार्बेज पीकर से कारीगर बनने का सफर

पर्यावरण संरक्षण कि इस पहल से जुड़ी कई महिलाओं की कहानी बेहद दिलचस्प है। जितना की प्लास्टिक वेस्ट से तैयार होने वाले उत्पाद हैं। इन महिलाओं में से कुछ पहले गार्बेज पिकर और कचरा छटाई का काम करती थीं। आज वह प्रशिक्षण प्राप्त कर बैग तैयार कर रही हैं। पहले उनका काम केवल कचरे को इकट्ठा करना और अलग-अलग करने तक सीमित था, लेकिन अब वह एक उपयोगी उत्पाद तैयार करने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

शक्ति फाउंडेशन द्वारा इस पूरी प्रक्रिया को सीखने के लिए तीन महीने की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग महिलाओं को उपलब्ध कराई जाती है। प्रशिक्षण अवधि के दौरान महिलाओं को स्टाइपेंड संस्था द्वारा दिया जाता है। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद महिलाएं नियमित रूप से केंद्र पर काम करती हैं और महिलाओं को संस्था द्वारा तन्खाह दी जाती है।

घर से शुरू होता है अभियान

शक्ति फाउंडेशन का मानना है कि प्लास्टिक कचरे की समस्या का समाधान केवल केंद्र और मशीनों से नहीं होगा। इसके लिए आम लोगों की भागीदारी भी बेहद आवश्यक है। इसी उद्देश्य से संस्था वैशाली, इंदिरापुरम और आसपास के क्षेत्र में विशेष जागरूकता अभियान संचालित करती है। अभियान के दौरान लोगों को अवगत कराया जाता है कि घरों में इस्तेमाल होने वाली दूध की प्लास्टिक की थैलियां को सीधे कूड़ेदान में डालने के बजाय उन्हें अलग से इक्ट्ठा कर अगर केंद्र में पहुंचाया जाए तो उन्हें दोबारा उपयोगी उत्पाद में बदला जा सकता है। आसपास के लोग अभी अभियान से जुड़ रहे हैं। कुछ लोग प्लास्टिक सामग्री को स्वयं केंद्र तक पहुंचाते हैं, जबकि संस्था विभिन्न क्षेत्रों में कैंप लगाकर इस्तेमाल हो चुके प्लास्टिक सामग्री एकत्र करती है।

Updated on:
05 Sept 2026 08:04 pm
Published on:
05 Sept 2026 08:04 pm