
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
अक्सर लैपटॉप पर काम करते समय उसकी निचली सतह गर्म हो जाती है। गाड़ियों के इंजन से तपिश निकलती है और कारखानों की चिमनियों से बेहिसाब गर्मी हवा में उड़ जाती है। वैज्ञानिक लंबे समय से इस बेकार जाती ऊष्मा को सीधे बिजली में बदलने की कोशिशों में जुटे थे। अब बेंगलूरु के जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) ने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय के साथ मिलकर एक ऐसी उपलब्धि हासिल करने का दावा किया है, जो एक सदी से मानी जा रही सैद्धांतिक सीमा को तोड़ती है। प्रोफेसर बिवास साहा के नेतृत्व में हुई यह खोज प्रतिष्ठित जर्नल साइंस में प्रकाशित हुई है। इस खोज की असली अहमियत यही है कि भविष्य में बिजली पैदा करने के लिए हमेशा नया ईंधन जलाना जरूरी नहीं होगा और बेकार होने वाली इस गर्मी से सीधे बिजली मिल सकेगी।
इस तकनीक की बुनियाद करीब दो सदी पहले खोजे गए सीबेक प्रभाव पर टिकी है। जब किसी पदार्थ के एक सिरे को गर्म और दूसरे को ठंडा रखा जाता है तो उसके भीतर के आवेशित कण (चार्ज कैरियर) ठंडे सिरे की ओर बहने लगते हैं। इसी बहाव से वोल्टेज पैदा होता है। यही सिद्धांत आज तापमान सेंसर और थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर जैसे उपकरणों में इस्तेमाल होता है।
दशकों से मानी जाने वाली परंपरागत भौतिकी के अनुसार धातुओं में यह प्रभाव प्रति डिग्री तापमान अंतर पर मात्र कुछ माइक्रोवोल्ट पैदा करता है, जबकि अच्छे सेमीकंडक्टर भी आमतौर पर कुछ सौ माइक्रोवोल्ट प्रति केल्विन तक ही सीमित रहते हैं। ठोस क्रिस्टल पदार्थों के लिए एक और सैद्धांतिक ऊपरी सीमा भी मानी जाती थी। जिसे "बोल्ट्जमान थर्मोपावर लिमिट" कहा जाता है। यह सीमा कुछ मिलीवोल्ट प्रति केल्विन के आसपास मानी जाती थी। ज्यादा वोल्टेज के लिए तरल इलेक्ट्रोलाइट जैसे रसायनों का सहारा लेना पड़ता था, लेकिन उनमें रिसाव और जल्दी खराब होने का खतरा बना रहता है।
शोधकर्ताओं ने स्कैंडियम नाइट्राइड (ScN) नाम के अर्धचालक (सेमीकंडक्टर) पदार्थ की मैग्नीशियम ऑक्साइड (MgO) की सतह पर बेहद पतली परत तैयार की। इसमें नियंत्रित मात्रा में मैग्नीशियम मिलाकर पदार्थ को इतना "भारी-डोप्ड और अत्यधिक क्षतिपूरित" (heavily doped, highly compensated) बना दिया गया कि उसमें इलेक्ट्रॉन और होल (धन आवेश) दोनों बड़ी संख्या में मौजूद रहें और एक-दूसरे को काटते रहें। इससे पदार्थ के भीतर बेतरतीब ढंग से बिजली के छोटे-छोटे उतार-चढ़ाव (पोटेंशियल फ्लक्चुएशन) बन गए, जिसके चलते आवेशित कण एक सीधी रेखा में नहीं, बल्कि छन-छनकर (पर्कोलेटिव ट्रांसपोर्ट) गुजरते हैं।
कुछ हद तक वैसे ही जैसे तरल इलेक्ट्रोलाइट में आयन चलते हैं। साइंस जर्नल में प्रकाशित नतीजों के अनुसार, इस पदार्थ ने कमरे के तापमान के आसपास -124 मिलीवोल्ट प्रति केल्विन (mV/K) से भी अधिक का सीबेक गुणांक (थर्मोपावर) दिखाया जो परंपरागत "बोल्ट्जमान सीमा" से करीब 30-40 गुना और आम अकार्बनिक सेमीकंडक्टरों में मिलने वाले मान से सैकड़ों से लेकर हजार गुना तक अधिक है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस खोज से भविष्य में बेहद संवेदनशील तापमान सेंसर, बेहतर थर्मल इमेजिंग उपकरण और बेहद कम मात्रा में गर्मी या रोशनी का भी पता लगा सकने वाले यंत्र बनाए जा सकते हैं। इसके अलावा लैपटॉप, वाहनों के इंजन, कारखानों की चिमनियों और बिजली संयंत्रों से बेकार जाने वाली गर्मी को पकड़कर उसे उपयोगी बिजली में बदलने वाले ठोस-अवस्था (सॉलिड-स्टेट) उपकरण भी संभव हो सकते हैं। यह प्रक्रिया बिना किसी तरल रसायन, बिना शोर और बिना अतिरिक्त ईंधन खर्च किए बिना ही होगी।
Updated on:
05 Sept 2026 07:37 pm
Published on:
05 Sept 2026 07:37 pm
