बेटियों की रक्षा के लिए समाज से लेकर सरकार तक बातें खूब होती है लेकिन हकीकत कुछ और है।
बेटियों की रक्षा के लिए समाज से लेकर सरकार तक बातें खूब होती है लेकिन हकीकत कुछ और है। जी हाॅं ! ये वही भारत देश है जहां हर शुभ कार्य के पहले कन्या की पूजा देवी के रूप में की जाती है। आज हमारे समाज में जिस तरीके से महिलाओं के साथ बर्ताव हो रहा है उसे देख कर ऐसा लगता है कि चारों ओर जंगल राज कायम है. इंसानियत, मानवता, संस्कार, संस्कृति, सौहार्द, भाईचारा सभी कुछ समाप्त हो गया है। इंसान अपना चोला छोड़कर पशुता पर उतर आया है। और ये अबोध बालिकायंे जिनके खेलने खाने के दिन हैं, जो रेप का मतलब भी नहीं जानती उनके दिमाग में जबरजस्ती रेप का अर्थ घुसाया जा रहा है। उन्हें बार बार इस जघन्य अपराध के बारे में समझाया जा रहा है।
वह जब भी घर से बाहर निकलती हैं, तो सहमी हिरणी की भांति चारों ओर सतर्क निगाहों से देखती हैं। उनके घर से बाहर जाते ही मां उनके सही सलामत वापस आने की दुआ मांगती है। जब तक बेटी घर नहीं आ जाती मां की सांस उसी में अटकी रहती है। जबकि हम सभी बेटी वाले हैं, परन्तु किसी पराई लड़की को देख कर हम ये क्यों भूल जाते हैं कि मेरी बेटी भी तो ऐसी ही भोली मासूम और परेशान होगी। ये अपराधी मासूम बेटी की उस पीड़ा को क्यों नहीं समझ पाते हैं, जो वह झेलती है।
वह आपको अंकल अंकल कहती है और आप दानव बन कर उसके साथ अत्याचार करते हो। उफ! ऐसा तो दानव भी नहीं करते थे। तो क्या आज मानव का इतना पतन हो गया है कि वह उस दानव से भी नीचे गिर गया है। आज हर रिश्ता शक के घेरे में खड़ा है ये मासूम किस पर विश्वास करें। यहां तक जिस गुरू को गोविन्द का दर्जा दिया जाता है वही आज मुखौटा लगा कर खड़ा है। खेत की बाड़ ही फसल को खाने में लगी है, तो उसकी रखवाली अब कौन करेगा। जिस पेपर को उठा कर देखो यही समाचर मुख्य पृष्ठ पर होता है। एक तरफ बेटी बचाओं के नारे दिये जाते हैं, भ्रूण हत्या पर पावंदी लगाई जा रही है।
परन्तु ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश की मातायें स्वंय ही यह कहेगी कि मुझे बांझपन मंजूर है, जिसकी रक्षा नहीं कर सकते वह बेटी नहीं चाहिए और बेटियों की अस्मत लूटने वाले बेटे भी नहीं चाहिए। इससे तो वह बांझपन ही अच्छा है। केंद्र सरकार द्वारा बलात्कार के कानूनों में बदलाव के बावजूद बच्चो और महिलाओ के साथ बलात्कार की घटनाओ में कमी नहीं आयी है क्योकि कानून बनाने मात्र से आपराधिक घटनाओ में कमी नहीं आएगी। भारत में न्यायपालिका में देरी के कारन हजारो लाखो व्यक्ति न्याय की आश छोड़ देते है अनेक बार वर्षो तक न्याय पालिका के चक्कर लगाने और लाखो रुपये वकीलों पर खर्च करने के बावजूद यदि न्याय नहीं मिल पाता है तो अपराधी वर्ग समाज पर हावी हो जाता है। महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध का मुख्य कारण कानून का डर न होना और लम्बी न्याय प्रकिर्या का होना आम बात है / राजनैतिक रसूल और बाहुबली धन का सहारा ले कर न्यायपरकीया में बाधा पहुंचाते है / यदि किसी कारन वश लम्बी न्याय प्रकिया के बाद किसी मशहूर व्यक्ति विशेष को सजा का एलान होता है तो उनके समर्थको द्वारा कानून का मजाक और न्याय पालिका के आदेश की अवमानना होती है जो लोकत्रंत के लिए घातक साबित होगी
सुधा चौहान