
China Overseas Military Base: लाओस में हवाई अड्डे से दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं। चीन के रक्षा मंत्रालय ने 29 सितंबर को घोषणा की कि लाओस के 'बान केउन' (Ban Keun) स्थित एक हवाई अड्डे पर "संयुक्त सहायता और प्रशिक्षण केंद्र" (joint support and training center) स्थापित किया जाएगा। इस खबर ने क्षेत्र में चीनी सेना की बढ़ती मौजूदगी की ओर फिर ध्यान खींचा है।
अमेरिकी न्यूज वेबसाइट 'वॉर ऑन द रॉक्स' (War on the Rocks) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, हालाँकि बीजिंग ने इस जगह को "बेस" (सैन्य अड्डा) कहने से परहेज किया है और कहा है कि "इसका निशाना कोई तीसरा पक्ष नहीं है", लेकिन यह चीन की पहली ऐसी विदेशी सैन्य सुविधा है जिसे उसने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है और जो मुख्य रूप से वायु शक्ति (airpower) पर केंद्रित है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिबूती और कंबोडिया के 'रीम नौसैनिक अड्डे' (Ream Naval Base) की तरह ही, 'बान केउन' में बनी यह सुविधा भी चीन के उस बढ़ते नेटवर्क का हिस्सा है, जिसके जरिए वह विदेशों में अपनी सैन्य और सुरक्षा बुनियादी ढांचा तैयार कर रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, "चिंता होना स्वाभाविक है।" यह जिबूती के बेस से छोटा है, लेकिन सैटेलाइट तस्वीरों में 2,000 मीटर लंबे रनवे पर आठ हल्के लड़ाकू विमान और कुछ सहायक वाहन दिखते हैं, और निर्माण कार्य जारी है। यह लंबी दूरी के बमवर्षक विमानों (long-range bombers) के लिए पर्याप्त न हो, पर इससे चीन की लॉजिस्टिक्स और खुफिया क्षमताओं को फायदा मिलेगा। इससे कंबोडिया के अलावा चीन को एक और जगह तक पहुँच मिलेगी और लाओस उसके हथियार-बिक्री नेटवर्क से भी जुड़ जाएगा।
चीन का यह सैन्य केंद्र आगे चलकर मुख्य भूमि दक्षिण-पूर्व एशिया में चीनी वायु सेना की ताकत दिखाने की क्षमता को मजबूत कर सकता है। इसका असर पूर्वी हिंद महासागर में काम कर रहे अमेरिकी बलों पर भी पड़ सकता है। वियतनाम को इससे और अधिक 'घिरे हुए' होने का एहसास हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशियाई देश अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा न करते हों, पर कोई सरकार नहीं चाहती कि वाशिंगटन यहा से जाए। अमेरिका को क्षेत्र की जटिल सुरक्षा स्थिति पर अधिक संसाधन और संस्थागत ध्यान देना होगा।