script गोरक्षपीठ की 3 पीढ़ियों का राम मंदिर आंदोलन में योगदान | Contribution of 3 generations of Gorakshpeeth in Ram Mandir movement | Patrika News

गोरक्षपीठ की 3 पीढ़ियों का राम मंदिर आंदोलन में योगदान

locationअयोध्याPublished: Jan 22, 2024 05:00:14 pm

Submitted by:

Upendra Singh

12 सितंबर 2014 को ब्रह्मलीन हुए गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ की आत्मा जरूर खुश हुई होगी। वो राम मंदिर आंदोलन के नायकों में से थे। एक ऐसा संत जो आंदोलन से जुड़े सभी के लिए स्वीकार्य था। जिसकी जिंदगी में दो ही इच्छा थी।

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अयोध्या के श्रीराम मंदिर में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो गई है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वि‌धि विधान से प्राण प्रतिष्ठा की। इस दौरान सीएम योगी आदित्यनाथ भी उनके साथ दिखे। मंगल ध्वनि का उद्घोष हुआ। शंखनाद से समारोह की शुरुआत हुई। अयोध्या मेें प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए गोरक्षपीठ की 3 पी‌ढ़ियों का योगदान स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
महंद दिग्विजयनाथ ने मंदिर आंदोलन की क्रांतिकारी नवसंचार किया
महंत दिग्विजयनाथ ने अपने जीवनकाल में मंदिर आंदोलन की क्रांतिकारी नवसंचार किया। उनके बाद इसकी कमान महंत अवेद्यनाथ ने संभाली। नब्बे के दशक में उनके ही नेतृत्व में श्रीराम मंदिर आंदोलन को समग्र, व्यापक और निर्णायक मोड़ लिया।
योगी आदित्यनाथ की देखरेख में राम मंदिर का निर्माण प्रशस्त हुआ
महंत अवेद्यनाथ ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति और श्रीराम जन्मभूमि निर्माण उच्चाधिकार समिति के अध्यक्ष के रूप में आंदोलन में संतों, राजनीतिज्ञों और आमजन को एकसूत्र में पिरोया। यह भी सुखद संयोग है कि पांच सदी के इंतजार के बाद अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण का मार्ग उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ की देखरेख में प्रशस्त हुआ है।
योगी ने सीएम बनते ही फैजाबाद का नाम अयोध्या किया
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने 2 महीने के अंदर ही योगी कैबिनेट ने अयोध्या नाम की पुनर्स्थापना कराने के लिए फैजाबाद जिला और मंडल का नाम बदलकर अयोध्या करने का फैसला किया। योगी सरकार ने पिछले साढ़े छह वर्ष में न सिर्फ रात-दिन एक किया लगभग 80 माह में 49 हजार करोड़ रुपये की विभिन्न परियोजनाओं से पूरी अयोध्या को बदल दिया। यह योगी सरकार की संकल्पना की सफल परिणति ही है कि रामलला के अपने भव्य जन्मभूमि मंदिर में विराजे। इन परियोजनाओं को साकार रूप में लाने के लिए मुख्यमंत्री योगी अब तक 65 बार अयोध्या जा चुके हैं।
गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ की आत्मा होगी खुश
12 सितंबर 2014 को ब्रह्मलीन हुए गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ के पास मंदिर आंदोलन के दौरान दो सबसे अधिक अहम पदों राम जन्म भूमि यज्ञ समिति और राम जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष थ। ये दायित्व इस बात का प्रमाण है कि आजादी के आंदोलन के बाद देश की राजनीति की दशा और दिशा बदलने वाले राम मंदिर आंदोलन में उनका क्या कद था? महंत अवेद्यनाथ के गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ के थे।
उम्र भर जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण ही तमन्ना रही
एक ऐसा संत जो आंदोलन से जुड़े सबके लिए स्वीकार्य था, जिसकी जिंदगी में दो ही इच्छा थी। अयोध्या में रामलला की जन्म भूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण और सामाजिक समरसता। वह चाहते थे कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिस तरह से उस समय समाज के वंचितों के त्राता बने थे, जिस तरह समाज के इस वर्ग को समय- समय पर उचित सम्मान देकर खुद से जोड़ा था।
लोगों को सामाजिक समरसता का दिया संदेश
लोगों को सामाजिक समरसता का संदेश दिया, उसी तरह बहुसंख्यक हिन्दू समाज भी ऊंच नीच, छुआछूत और अस्पृश्यता को छोड़ कर एक जुट हो। इसके लिए अपने हर संबोधन में गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस से अहिल्या का उद्धार, वन गमन के दौरान निषाद राज को गले लगाना, गिद्ध राज जटायू का अपने पिता की तरह अंतिम संस्कार, दलित सबरी के जूठे बेर खाना, कोल, किरात और गिरिजनों से सद्भाव स्थापित करने का उदाहरण अनिवार्य रूप से देते थे। इसके साथ ही इसका कारण भी गिनाते थे। उनके मुताबिक हिंदू समाज की इन कुरीतियों की वजह से समाज का बंटा होना ही हमारी हजारों वर्ष की गुलामी की मूल वजह था। आज जो लोग जाति, पंथ, भाषा के आधार पर समाज को बांट रहे हैं वह समाज और राष्ट्र के दुश्मन हैं। अपने राजनैतिक हित के लिए ऐसा करना पाप है। इतिहास ऐसे लोगों को कभी माफ नहीं करेगा।
मुख्यमंत्री योगी की देखरेख में दिव्य और भव्य राम मंदिर का निर्माण
अब जब उनके ही काबिल शिष्य, गोरक्षपीठ के वर्तमान पीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की देखरेख में अयोध्या में दिव्य और भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है। राम के जीवन से जुड़े उन सभी पात्रों को जो सामाजिक समसरसता के प्रतीक हैं, को उचित जगह दिया जा रहा है, तब उनका खुश होना स्वाभाविक है। उनकी आत्मा की यह खुशी तब और बढ़ जाती होगी जब उनको मंदिर आंदोलन के बुनियाद के रूप में अपने गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ के योगदान की याद आती होगी।

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