मिल जाए घर जाने की राह इस उम्मीद से वाहनों के पीछे भाग रहे बच्चे

-माता-पिता के साथ 600 किमी पैदल चल चुके, 1200 किमी का सफर बाकी
-मजदूरों के दर्द की दास्तान सुनकर पसीज रहे दिल, लेकिन सब मजबूर

खंडवा.
दूध मुंहे बच्चों को संभालतीं माताएं, पिता के कंधों पर सवार नन्हे बच्चे, थक कर चूर हो रहे मजदूर, लेकिन बच्चों को हर तकलीफ से बचाते सैकड़ों किमी के सफर पर निकले मजदूरों की टोलियों को देखकर हर किसी का दिल पसीज रहा है। बच्चे वाहनों को देखकर उनके पीछे इस उम्मीद से दौड़ लगा रहे कि शायद घर जाने के लिए उन्हें सवारी मिल जाए। रोजाना ये नजारे खंडवा से हरसूद की ओर जाने वाले रास्तों पर आम हो गए है। लॉक डाउन में बेरोजगार हुए मजदूर पैदल ही अपने घर की ओर जा रहे है।
सिविल लाइन क्षेत्र में एक ट्रैक्टर के पीछे भागते दो छोटे बच्चे और उन्हें रोकती बड़ी बहन, ये नजारा देखकर साथ चल रहे माता-पिता की आंखों से आंसू आ गए। मुंबई से पत्नी प्रमिला और बच्चों कामिनी, सन्नी और शालू को लेकर निकले आनंद पाल ने बताया कि वे कंपनी में काम करते थे। कंपनी बंद हो गई, रोजगार चला गया, घर का किराया, बच्चों का पालन पोषण मुश्किल हो गया। जिसके बाद जो जमा पूंजी थी वो लेकर अपने घर इलाहबाद के लिए निकल पड़े। 600 किमी से ज्यादा सफर पैदल चल कर चुके हैं। अभी 1280 किमी ओर जाना है। बच्चे बार बार कहते है पापा किसी गाड़ी से ले चलों थक गए, अब चलते नहीं बनता। इस पर रोना आ जाता हैं, लेकिन क्या करुं, मजदूर हूं इसलिए पैदल चलने के लिए मजबूर हूं।

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मनीष अरोड़ा Bureau Incharge
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